हाय नी...मैँ लेट हो गई

***राजीव तनेजा***

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"रुकिए!...रुकिए तनेजा जी...एक मिनट ज़रा रुकिए तो"…

"क्या हुआ?"...

"पहले तनिक ज़रा स्कूटर तो रोकिए"...

"हाँ!...अब कहिए...क्या बात है?"मैँ साईड पे स्कूटर रोक कर पूछता हूँ...

"आप मुझे ज़रा बाईपास तक छोड़ देंगे?"...

"यू मीन लिफ्ट?"...

"जी"...

"बस!...इतना सा?...ज़रा सा काम था?"...

"जी!...फिलहाल तो बस इतना सा ही काम था"...

"इसी के लिए आपने मुझे टोक दिया?"...

"जी"...

"क्या मैँ तुम्हें वेल्ला नज़र आता हूँ?"...

"क्या मतलब?".…

"कितनी बार टोक चुका हूँ मैँ आपको कि ऐसे पीठ पीछे आवाज़ें  ना लगाया करें...अपशकुन होता है"...

"जी!...अपशकुन तो ये हमारे में भी होता है तनेजा जी!...बहुत बड़ा अपशकुन होता है लेकिन आप ही बताएँ कि मैँ अपना दुखड़ा गा-गा के आपको ना सुनाऊँ तो क्या उस निर्मोही जमनादास के पास जा के अपना अश्रु भरा आलाप लगाऊँ?...जो ठीक से मेरे चेहरे पे थूकता भी नहीं है"...

"क्या मतलब?"...

"म्म...मेरा मतलब कि वो मुझे ठीक से पूछता भी नहीं है"...

"और कर लो उसके आगे-पीछे पुच्च-पुच्च...मैँ ना कहता था कि ये जमनादास एक नम्बर का मतलबी इनसान है ...किसी के काम नहीं आएगा लेकिन कोई मेरी सुने तब ना"...

"लेकिन तुम लोगों को भी तो उसके घर जा-जा के डेरा जमाए बिना चैन कहाँ आता था?...ये सब सिर्फ इसलिए ना कि उसकी बीवी पच्चीस की और मेरी बीवी पैंतालिस की?"...

"जी!..लेकिन...

"गुप्ता जी!...सिर्फ कमसिन...स्मार्ट और मीठी-मीठी बातें करने से कुछ नहीं होता"..

"लेकिन उसका गोरा रंग....

"गोरे रंग को क्या चाटना है?...वो तो 'सूअर' का भी होता है"...

"ओह!...

"ये गोरा रंग...ये कमसिन उम्र...ये चासनी जैसे मीठी-मीठी...चिकनी-चुपड़ी बातें सब बेकार की...क्षणभंगुर...नष्ट होने वाली चीज़ें हैँ"..

"जी"...

"असल चीज़ होती है तजुर्बा...और वो ज़्यादा उम्र वालों के पास ही पाया जा सकता है"...

"जैसे आपकी बीवी के पास?"...

"बिलकुल!...उसके अलावा पूरे मोहल्ले में है ही कौन जो उसकी टक्कर थाम सके?"..

"जी!..है तो नहीं लेकिन...

"मैँ तो कहता हूँ कि हर इनसान को तजुर्बा हासिल करना चाहिए...खूब हासिल करना चाहिए...जी भर हासिल करना चाहिए "...

"जी"...

"तजुर्बा तो इनसान को अल्लाह ताला के द्वारा की गई दुनिया की सबसे बड़ी नेमत होता है"...

"जी!...आपकी बात तो सही है लेकिन वो...जमनादास की घरवाली तो हर जगह  कहती फिरती है कि कलकत्ता में उसने बड़े-बड़े लोगों के...

"जुम्मा-जुम्मा चार दिन हुए नहीं हैँ उस बावली को पैदा हुए और मेरी...इस...इस तनेजा की बीवी का मुकाबला करने चली है?"मैँ हाँफता हुआ बोल पड़ा...

"हुँह!...बड़ी आई कलकत्ते वाली..एक-दो कच्चे-पक्के अचार क्या बना लिए होंगे वहाँ उसने ...खुद को पाक-कला की विशेषज्ञा समझने लगी?"...

"उस कल की लौडी को क्या पता कि कच्ची कैरी का खट्टा-मीठा अचार कैसे बनाया जाता है?"...

"जी!..इस बार तो गलती हो चुकी है..अगली बार से आप ही....

"मैँ ना कहता था कि ये अड़ोसी-पड़ोसी...ये रिश्तेदार...ये भाई-बन्ध..कोई काम नहीं आएगा...आएगा तो सिर्फ ये तनेजा खुद या फिर उसकी पैँतालिस वर्षीया बीवी ही तुम्हारे काम आएगी"...

"हें...हें...हें...तनेजा जी!..आप तो बिलावजह शर्मिन्दा कर रहे हैँ मुझे"...

"बिला वजह?...ये तो काम है मेरा"...

"क्या मतलब?"...

"दूसरों को बात-बात में बेईज़्ज़त करना ही तो अपुन का स्टाईल है बिड्डू"..

"ओह!...

"हाँ!..तो आप कहाँ?...कहाँ चलने के लिए कह रहे थे?"..

"कहीं नहीं"...

"क्या मतलब?...अभी तो आप कह रहे थे कि...

"आप जाईए!...मैँ अपने आप चला जाऊँगा"...

"कमाल करते हो तुम भी....अगर ऐसे ही करना था तो मुझे रोका किसलिए था?"..

"आप रहने दीजिए...मैँ अपना आराम से बस में चला जाऊँगा"...

"देख रहे हो भीड़ कितनी है बसों में?...कहीं पिस-पिसा गए बेकार में पंचर लगवाते फिरोगे"मैँ शर्मा जी की तोन्द की तरफ इशारा करता हुआ बोला..

"कोई बात नहीं...मैँ पंचर लगवा लूँगा...आपके साथ जाने के बजाय पंचर लगवाना ज़्यादा बेहतर रहेगा"शर्मा जी मन ही मन बुड़बुड़ाते हुए बोले..

"हा...हा...हा...तो इसका मतलब आप डर गए"...

"क्क्या मतलब?"...

"आ गए ना बच्चू मेरे झाँसे में?"..

"क्या मतलब?"...

"मैँने ज़रा सा मज़ाक क्या कर लिया?...आप तो उसे सच समझ...बुरा मान बैठे"...

"मज़ाक?"...

"और नहीं तो क्या मैँ सच में तुम्हारी वाट लगाने वाला था?"...

"ओह!...मैँ तो इसे सीरियसली ही समझ बैठा था"...

"पागल हो गए हो क्या?...दोस्त हूँ तुम्हारा...बताओ!...कहाँ छोड़ दूँ?"...

"बाईपास"...

"कहाँ जाना है?"...

"पानीपत"...

"अभी पिछले हफ्ते भी तो आप वहीं गए हुए थे ना?"...

"जी"...

"तो फिर अब दोबारा...इतनी जल्दी किसलिए?"...

"वोही...हर बार का रुटीन"...

"ओह!...तो क्या फिर कोई लुढक गया?"...

"जी!...अभी परसों ही...पता नहीं कैसे?...मेरी मौसी के फूफा थे...अचानक बिना किसी नोटिस के ऊपर से बुलावा आ गया"..

"ओह!...

"पिछले आठ महीनों से पता नहीं क्या अजब का संयोग बन रहा है मेरे साथ कि हर महीने दो-चार...दो-चार कर के  सभी जान-पहचान वाले अल्लाह को प्यारे होते जा रहे हैँ"...

"अल्लाह को प्यारे होते जा रहे हैँ?"...

"जी"...

"लेकिन आप तो हिन्दू हैँ"...

"तो क्या हिन्दुओं में मरना मना है?"...

"नहीं-नहीं!...उनके मरने या जीने पर तो किसी किस्म की कोई बन्दिश...पाबन्दी या रुकावट नहीं है लेकिन...

"लेकिन क्या?"...

"आपने अभी कहा कि अल्लाह को प्यारे हो रहे हैँ तो मैँने सोचा कि शायद किसी 'उलेमा'...'मौलवी'...

'शंक्राचार्य' या फिर किसी 'ब्लॉगर' के कहने में आ कर आप अपना वजूद ही खोने जा रहे हैँ"....

"क्या बात करते हैँ तनेजा जी आप भी?...ऐसा भला कैसे हो सकता है कि मैँ अपना...माँ-बाप का दिया हुआ...खुद का  धर्म छोड़ कर...'खुदा' के धर्म को कैसे अपना सकता हूँ?"..

"तो फिर आपने कैसे कह दिया कि....

"ओह!...दरअसल क्या है कि ...'अल्लाह को प्यारा होना' एक मुहावरा है...जिसका मतलब होता है मृत्यू को प्राप्त कर लेना"...

"ओह!...आई एम सॉरी...मुझे इस बारे में बिलकुल भी पता नहीं था"...

"एक्चुअली!..क्या है कि मेरी हिन्दी शुरू से ही थोड़ी वीक किस्म की रही है..इस नाते कई बार मुझे...

"इट्स ओ.के...इट्स ओ.के...इसमें शर्मिन्दा होने की कोई बात नहीं है...हिन्दी बाहुल्य क्षेत्र में रहते हुए भी हम में से कितनों को शुद्ध हिन्दी लिखनी आती है?"...

"जी"...

"किसी को मात्राओं का पता नहीं चलता तो किसी को पूर्णविराम का ज्ञान नहीं और कोई-कोई तो...

"कोई-कोई तो?"..

"खैर छोड़ो!...मुझे भी कौन सा ढंग से पूरी हिन्दी आती है?"...

"तो फिर चलें?"...

"जी"...

"ओ.के...लैट मी स्टार्ट इट"..

"आपका ये एहसान मैँ ज़िन्दगी भर नहीं भूलूँगा"...

"इसमें एहसान की क्या बात है?...दोस्त हैँ आप मेरे...इस नाते इतना तो फर्ज़ बनता ही है मेरा"...

"जी!...तनेजा जी लेकिन आप जैसे चन्द पुराने ख्यालात वाले मित्रों की दकियानूसी सोच को अगर किनारे कर के देखें तो ये फर्ज़...कर्तव्य...ड्यूटी वगैरा की चिंता करता ही कौन है?"...

"जी!..ये सब तो पैदाईशी गुण होते हैँ जो हमें जीन में अपने माँ-बाप और पूर्वजों से मिले होते हैँ"...

"पूर्वजों से?"...

"जी"...

"तो क्या उनके वक्त में भी जीन्स  का रिवाज़ था?"...

"क्या मतलब?"..

"अभी आपने कहा ना कि हमें अपने पूर्वजों से जीन्स मिलती थी"..

"ओह!..आप मेरी बात का गलत मतलब लगा बैठे..मेरा मतलब था कि हमें हमारे पूर्वजों के वंशानुगत गुण अपने आप ऐज़ ए गिफ्ट मिलते हैँ"...

"यू मीन उनका अपने आप हमारे अन्दर संचार होता रहता है?"..

"जी"..

"ओह!...मैँ भी कितना मूर्ख हूँ..किस बात का क्या मतलब लगा बैठा?"..

"इट्स ओ.के..इट्स ओ.के...जैसे ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती ...ठीक वैसे ही अज्ञानता की भी कोई सीमा नहीं होती...जितनी मर्ज़ी हो सकती है"..

"क्या सच?"..

"बिलकुल सच"..

"थैंक गॉड!...आपने तो मेरे सिर से बहुत बड़ा बोझ हल्का कर दिया...मैँ तो ऐसे ही खुद को पागल..

"अरे वाह!...बोझ तो आपका मैँ हलका कर रहा हूँ और आप शुक्रिया उस नीली छतरी वाले खुदा का कर रहे हैँ"...

"ओह!..सॉरी...आई एम रियली सॉरी...मुझे लगा कि"...शर्मा जी सर झुका शर्मिन्दा से होते हुए बोले

"प्लीज़!...डोंट फील गिल्टी...आप अपने को इस सब के लिए तनिक भी कसूरवार मत समझें..आजकल तो वैसे भी एहसान फरामोशों का ज़माना चल रहा है"...

"रियली?"..

"जी"...

"तो फिर ठीक है"शर्मा जी खुश होते हुए बोले...

"अब चलें?"...

"जी"..

"लाईए!...अपना ये झोला मुझे दे दीजिए...मैँ इसे आगे टाँग लेता हूँ"..

"नहीं!...रहने दीजिए...आपको मुश्किल होगी...मैँ हाथ में ही पकड़ लूँगा"...

"कमाल करते हैँ आप भी...एक तरफ दोस्त कहते हैँ और दूसरी तरफ दोस्ती का फर्ज़ भी ठीक से पूरा नहीं करने देते हैँ"....

"आपको कहीं मुश्किल ना हो जाए...मैँ तो इसलिए मना कर रहा था"...

"अजी छोड़िए!...काहे की मुश्किल?...जब स्कूटर ने वज़न उठाना ही है तो दो-चार किलो ज़्यादा सही या दो-चार किलो कम सही...क्या फर्क पड़ता है?"...

"जी!...ये बात तो है"...

"तो फिर चलें?"...

"जी"...

"ओ.के!..दैन लैट मी स्टार्ट इट"कहते हुए मैँ अपने स्कूटर को किक मार स्टार्ट कर आगे बढ लेता हूँ

"आप आराम से बैठे हैँ ना?"...

"जी"...

"कोई दिक्कत या परेशानी हो तो आप पहले बता दीजिएगा...मैँ बाद में थोड़ा आगे हो जाऊँगा"...

"बाद में क्यों?...पहले क्यों नहीं?"..

"बैलैंस नहीं बिगड़ जाएगा हमारा?"..

"ओह!..इस ओर तो मैँने ध्यान ही नहीं दिया"...

"तो फिर दीजिए ना"...

"जी!..ज़रूर..अभी फिलहाल तो कोई दिक्कत नहीं है..अपना आराम से....फर्स्ट क्लास बैठा हूँ..और फिर वैसे मैँ हूँ भी कितना?..कुल जमा अढाई छंटाक ही तो मेरा वज़न है"...

"हा...हा...हा...मातमपुर्सियों पे मुफ्त का खा-खा के पूरे ठुस्स पे ठुस्स हुए जा रहे हैँ आप लेकिन गुमान अभी भी वोही उन्नीस साल पुराना कि आप 'गुलशन बावरा' की तरह किंगड़ पहलवान दिखते हैँ"..

"जी!...अब बार-बार कौन अपना स्टेटस बदल-बदल के उसे अपडेट करता फिरे?...एक बार जो सोच लिया ..सो सोच लिया"..

"ओ.के"....

"अंत्येष्टी कितने बजे की है?"...

"चार बजे की"...

"लेकिन दो तो तुम्हें यहीं बजने वाले हैँ"...

"जी!..बस ऐसे ही...सुबह नल में पानी नहीं आ रहा था तो नहाने-धोने में देर हो गई...और बाद में घर से निकला तो रस्ते में अपने डॉक्टर साहब मिल गए"...

"कौन?...वो झोलाछाप?"...

"जी"...

"उसी के चक्कर में देर हो गई होगी?"...

"जी"..

"स्साला!...है ही इतना बातुनी कि अगर सुबह किसी को पकड़ ले तो समझों वो बन्दा गया काम से...शाम तक का उसका दानी-पानी वहीं...उसी डॉक्टर के साथ ही लिखा गया"..

"जी"...

"तो फिर तुम कैसे जल्दी छूट गए?"...

"डॉक्टर वो है लेकिन आज तो मैँने उलटा उसे ही गोली दे दी"...

"क्या मतलब?"...

"मैँने उसे गोली दे दी कि वापसी में उसके लिए पानीपत से ठर्रे की दो बोतल लेता आऊँगा"...

"तो क्या सचमुच में?"...

"अरे यार!...टाईम मिलेगा तो ले आऊँगा"..

"और नहीं मिला तो?"...

"नहीं मिला तो कह दूँगा कि ला रहा था...रस्ते में गिर के फूट गई"...

"गुड!...वैरी गुड"..

"वो तो यार...मुझे भी चाहिए थी लेकिन देसी नहीं...इंगलिश"...

"तो क्या दिक्कत है?...जहाँ उसके लिए दो लाऊँगा...वहाँ आपके लिए भी एक लेता आऊँगा"...

"नहीं!...मुझे भी दो चाहिए"...

"ठीक है बाबा!...दो लेता आऊँगा...क्यों निराश होते हो?"...

"थैंक्स"...

"इसमें थैंक्स की क्या बात है?...दोस्त हैँ आप मेरे"...

"जी"...

"तो फिर चलें?"..

"जी!..बिलकुल"...

"लेकिन मुझे लग रहा है कि आप टाईम पे पहुँच नहीं पाएँगे"...

"वो क्यों?"..

"सवा दो तो यहीं बज चुके हैँ"..

"ओह!..फिर तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी"गुप्ता जी घड़ी देख हड़बड़ाते हुए बोले...

"चिंता मत करो!...यहाँ से बाईपास है ही कितना दूर?..दस मिनट में पहुँच जाएँगे...और फिर कल पानीपत में बारिश भी तो हुई है"..

"जी!...हुई तो है लेकिन उससे क्या होता है?"...

"शमशान घाट की लकड़ियाँ भी तो भीग गई होंगी"...

"तो?"..

"मुर्दा फूंकने में दस-बीस मिनट तो फालतू के लग ही जाएँगे"...

"ओह!...इस ओर तो मेरा ध्यान ही नहीं गया"....

"अब तो काम बन जाएगा ना?"...

"जी!...बिलकुल"...

"तो फिर चलें?"..

"जी"...

"बाईपास आते ही जो पहली बस नज़र आए..छलांग लगा...उसी में लपक के चढ जाना...अपना आराम से पहुँच जाओगे"...

"जी"...

"ओह!...ये क्या?"...

"क्या हुआ?"...

"देख नहीं रहे कि सामने स्साले...लट्ठ लिए खड़े हैँ"...

"कौन?"...

"ठुल्ले...और कौन?"...

ओह!...

"लो!...ये हैलमेट पहन लो फटाफट"...

"जी"...

"शुक्र है!...स्सालों की नज़र नहीं पड़ी"...

"पड़ती भी कैसे?..मैँने अपना मुँह जो दूसरी तरफ घुमा लिया था"...

"गुड!...ये आपने बहुत अच्छा किया...वर्ना अभी ठुक जाने थे पाँच-सात सौ"...

"पाँच-सात सौ?"..

"जी!...

"लेकिन इनकी औकात तो सौ-पचास से ज़्यादा की होती ही नहीं है...तो फिर पाँच-सात सौ कैसे?"...

"अरे भाई!...दिवाली का सीज़न चल रहा है...इस से कम में तो उन्होंने अपनी नाड़(गर्दन) भी सीधी नहीं करनी थी"...

"ओह!...

"अब इस टोप्पे को बाईपास से पहले ना उतारना...क्या पता?..स्साले..वहाँ भी खड़े हों"...

"जी"...

"बस!..पहुँच ही गए समझो...दो मिनट और लगेंगे"...

"जी"...

"धत्त तेरे की...ये क्या?..यहाँ तो जाम लगा पड़ा है"...

Traffic jam New Delhi

"ओह!...लगता है कि लाल बत्ती खराब हो गई है...तभी इतना जाम लगा हुआ है...वर्ना नए वाले फ्लाईओवर के बनने के बाद तो इस ऐरिया में तकरीबन जाम लगना बन्द ही हो गया है"...

"हम्म!...यही लग रहा है"...

"ये अपनी शीला सरकार काम तो वैसे काफी करवा रही है लेकिन भीड़ इतनी है यहाँ दिल्ली में कि तमाम तरह की सुविधाएँ मिलने के बाद भी पूरा नहीं पड़ रहा है"...

"पूरा पड़े भी कैसे?...1000 नई कारें रोज़ बिकती हैँ यहाँ दिल्ली में और स्कूटर और मोटर साईकिलों की तो कोई गिनती ही नहीं"...

"जी"...

"मेरे हिसाब से तो जब तक कोई एक समान पब्लिक ट्रासपोर्ट सिस्टम लागू नहीं होता पूरी दिल्ली में..इन समस्यायों से निजात पाना बहुत मुश्किल है"...

"मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन है"...

"पहली बात तो गांठ बाँध के लिख लो अपनी डिक्शनरी के पहले सफे पे कि नामुमकिन नाम की कोई चीज़ होती ही नहीं है ज़िन्दगी में"...

"लेकिन इतनी भीड़...कैसे कंट्रोल होगा ये सब?"...

"जहाँ भीड़ भरा अंबार देखो..दो-चार बम गिरा दो स्सालों पर..अपने आप पब्लिक स्वाहा हो जाएगी...फिर आराम से करते रहो मौजां ही मौजां...सिम्पल"..

"लेकिन इन बमों या धमाकों की लपेट में हम और आप भी आ गए तो?"...

"पागल हो क्या तुम?"...

"क्या मतलब?"...

"कभी शिकारी को खुद अपने ही तीर से शिकार होते देखा है?"...

"नहीं"...

"तो फिर?"...

"तनेजा जी!...ये जाम तो लगता है कि शाम से पहले खुलने वाला नहीं...कब तक यूँ ही हम बेकार की बातों में टाईम खोटी करते रहेंगे?"...

"जी!...मैँ भी यहीं सोच रहा हूँ कि अगर आप अपनी मंज़िल पे समय से नहीं पहुँच पाए तो मेरा भी आपको लिफ्ट देना बेकार हो जाएगा"...

"आप एक काम करें"...

"क्या?"...

"आप यहीं से वापिस लौट जाएँ...मैँ अपना आगे पैदल-पैदल ही निकल लेता हूँ"...

"जाम देखा है...कितना है?...सबने आड़ी-तिरछी अपनी गाड़ियाँ फँसा रखी होंगी...ना घर के रहोगे ना घाट के"...

"क्या मतलब?"...

"बीच रस्ते में ही फँस के ना इधर के रहोगे और ना ही उधर के...अभी कम से कम एक जगह टिक के तो खड़े हो"...

"ठीक है!..तो फिर एक काम करते हैँ"...

"क्या?"...

"मैँ धक्का देता हूँ...

"किसे?"...

"स्कूटर को"...

"बाप का माल समझ रखा है क्या?...हाथ लगा के तो दिखाओ"...

"नहीं-नहीं!...आप गलत समझ रहे हैँ...मेरा ये मतलब नहीं था"...

"तो क्या मतलब था?"..

"म्मेरा मतलब तो था कि मैँ आपके स्कूटर को धक्का लगाता हूँ और आप इसे  यहाँ से ऊपर...फुटपाथ पे चढा लें"...

"उससे क्या होगा?"...

"कुछ दूर तक तो पहुँच जाएँगे"..

"क्या फायदा?...आगे जा कर फिर कहीं फँस जाएँगे"...

"सभी तो निकाल रहे हैँ...हम भी निकाल लेते हैँ"...

"सभी अगर कुएँ में छलांग लगा रहे हैँ तो क्या हम भी लगा दें?"...

"यहाँ भीड़ के बीच फँसे रहने से तो अच्छा ही है कि हम आहिस्ता-आहिस्ता मूव होते रहें"...

"ताकि बाद में घर जा के जनानी से 'मूव' की मालिश करवाते फिरें?"..

"क्या मतलब?"...

"पत्थर देखें हैँ कि कैसे ऊबड़-खाबड़ फैले पड़े हैँ फुटपाथ पे?...एक मिनट में स्कूटर पलट जाएगा..चोट-चाट लगेगी...सो अलग"...

"तो क्या हुआ?...आप तो फुल्ली इंश्योर्ड हैँ ना?"...

"तो?"...

"फिर दिक्कत क्या है?"..

"मुझे अपनी नहीं...तुम्हारी फिक्र है"...

"किस मुगालते में बैठे हैँ जनाब?...किस मुगालते में?....अभी परसों ही तो मैँ भी अपने बीमे का प्रीमियम भर के आ रहा हूँ"...

"ओह!...दैट्स नाईस लेकिन फिर भी...मुझे डर लगता है"...

"क्या तनेजा जी...आप भी....मेरे होते हुए आप डरते क्यूँ हैँ?...बेधड़क हो के आँखें बन्द कीजिए और राम का नाम लेकर कुदा दीजिए"...

"ना बाबा..ना!..अपने बस का नहीं है"..

"कमाल करते हैँ आप भी..शेरदिल इनसान हो के चूहे जैसी बात करते हैँ...लगता है कि डर गए?"..

"मैँ भला क्यों डरने लगा?...डरें मेरे दुश्मन"...

"तो फिर निकालिए ना"...

"नहीं...बिलकुल नहीं"...

"लेकिन क्यों?"...

"क्या पता कि कहाँ तक जाम लगा है?...निकल पाएँगे...नहीं निकल पाएँगे...कोई गारैंटी नहीं"....

"गारैंटी तो जाम खुलने की भी नहीं लग रही"...

"चलिए!...चल निकलते हैँ"..

"क्या फायदा?...बेकार में ऊबड़-खाबड़ रस्ते पे स्कूटर कुदा अपना हाजमा खराब करते फिरेंगे?"...

"आपके बस का नहीं है ये सब तो लाईए...हैंडिल मुझे थमाईए...मैँ ही आपको अपनी जांबाज़ी का कुछ नमूना दिखा देता हूँ..आप तो ऐसे ही...बेकार में...खामख्वाह डर रहे हैँ"...

"लाईसैंस है आपके पास?"...

"नहीं!...लाईसैंस तो नहीं है"...

"फिर तो बिलकुल नहीं"...

"लेकिन क्यों?"...

"बिना लाईसैंस के गाड़ी चलाना तो सरासर कानून का उलंघन होगा"...

"तो फिर होने दीजिए ना लंघन-उलंघन...क्या फर्क पड़ता है?"...

"अरे वाह!..फर्क क्यों नहीं पड़ता?...बहुत पड़ता है"...

"लेकिन सभी तो ऐसे ही निकले जा रहे हैँ...हम भी निकल जाते हैँ"...

"कतई नहीं!..देश का ज़िम्मेदार नागरिक होने के नाते हमारा पहला फर्ज़ बनता है कि हम देश हित के लिए बनाए गए सभी कानूनों का अक्षरश पालन करें"...

"आपकी इस जिम्मेदारी भरी नागरिकता के चक्कर में मेरी बस निकल जाएगी"...

"तो दूसरी आ जाएगी...उस पे चले जाना...क्या फर्क पड़ता है?...लेट तो तुम वैसे भी हो ही चुके हो"...

"लेकिन दूसरी वाली अगर दो घंटे बाद आएगी तो क्या मैँ दो घंटे वहीं..चौक पर सड़ता रहूँ?"...

"तो?...क्या दिक्कत है?"...

"नहीं!...बिलकुल नहीं..और वैसे भी चुन्नू की मम्मी बता रही थी कि शाम के वक्त रोडवेज़ की बसों में रश बहुत बढ जाता है"....

"लेकिन आपके बेटे का नाम तो पुन्नू है ना?"...

"जी!...पुन्नू शर्मा"...

"तो फिर ये 'चुन्नू' कौन?"...

"अपनी पड़ोसन का बेटा है..नैन-नक्श और शक्ल-सूरत में....

"बिलकुल अपनी माँ पे गया है?"...

"नहीं!...बाप पे"...

"ओ.के"...

"तभी तो हूबहू मुझ से शक्ल मिलती है"...

"क्या?"..

"जी"..

"ओ.के...ओ.के...ये सब तो खैर आजकल की भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में चलता ही रहता है"...

"जी"...

"हाँ!...तो आपके 'मन्नू' की मम्मी क्या बता रही थी?"...

"मन्नू...नहीं....'चुन्नू'...'मन्नू' की मम्मी तो गली नम्बर बारह में रहती है"...

"और उसकी शक्ल भी हूबहू आपसे मिलती है?"...

"मन्नू की?"...

"नहीं!...उसकी मम्मी की"मुझे गुस्सा आ गया..

"आपको कैसे पता?"...

"क्या?"..

"यही कि मेरे पिताजी का 'मन्नू' की नानी के घर खूब आना-जाना था?"....

"व्वो...वो तो मैँने बस ऐसे ही आईडिया लगा लिया था"...

"व्हाट ए परफैक्ट आईडिया...सर जी...व्हाट ए परफैक्ट आईडिया"...

"थैंक्स फॉर दा कॉम्प्लीमैंट"...

"हाँ! तो फिर आपकी ये सो कॉल्ड 'मन्नू' की मम्मी क्या कह रही थी?"..

"उसकी नहीं...मम्मी तो 'चुन्नू' की कह रही थी"...

"ओफ्फो!..वही तो पूछ रहा हू कि 'चुन्नू' की मम्मी क्या कह रही थी?"..

"यही कि शाम के वक्त रोडवेज़ की बसों में रश बहुत बढ जाता है?"....

"तो फिर घर से देर से निकलने की गलती की ही क्यों?"मैँ तैश में आ गुस्से से बोल पड़ा...

"जी हाँ!...सब मेरी ही गलती है...सब मेरी ही गलती है...नल में पानी नहीं आया...वो भी मेरी गलती है...रस्ते में डॉक्टर ने रोक लिया...वो भी मेरी ही गलती है और अब यहाँ मैँने आपको लिफ्ट देने के लिए कह दिया तो ये भी मेरी ही गलती है"...शर्मा जी रुआँसे हो फूट-फूट के रोते हुए बोले

"क्या मतलब?...तुमने मुझ से लिफ्ट माँग के कोई गलती की है?"...

"जी!..बहुत बड़ी गलती की है"..

"क्या मतलब?"...

"आपकी जगह कोई और ड्राईवर होता तो मैँ इस समय यहाँ आपके साथ झक मारने के बजाय आराम से हिचकोले खाती हुई बस में पानीपत का सफर कर रहा होता"...

"तो क्या डॉक्टर ने कहा था कि मुझ से लिफ्ट माँगो?"..

"जी!...उसी ने तो मेरी मति भ्रष्ट की थी"...

"क्या मतलब?"..

"उसी पागल के कहने पर तो मैँ स्कूटर रोकने के लिए आपको हाथ दिया था"..

"क्या मतलब?"...

"पहले मैँने डाक्टर गुप्ता से ही रिकवैस्ट की थी बाईपास तक छोड़ने के लिए तो उन्होंने आपका नाम रैफर कर दिया कि पीछे वो बावला तनेजा आ रहा है...शायद उसी तरफ जाएगा...उसी से लिफ्ट ले लो..मुझे ज़रा किसी पेशेंट को अरजैंट देखने जाना है"...

"ओह!...तो इसका मतलब आपने अपने विवेक के आधार पर नहीं बल्कि उस कमीने गुप्ता के कहने पर मुझ से लिफ्ट ली थी?"...

"जी"...

"इस स्साले!...गुप्ता के बच्चे को तो मैँ ज़िन्दा नहीं छोड़ूँगा...हमेशा मैँ ही इसे मिलता हूँ पंगे लेने के लिए"...

"क्या मतलब?"..

"ये जो आप मेरे अन्दर देशभक्ति और कानून का पालन करने वाले सरफिरे कीड़े को जो सट्ट मारते हुए देख रहे हैँ ना"..

"जी"...

"ये सब उसी का किया धरा है"...

"क्या मतलब?"..

"उस हरामखोर ने ही मुझे ये कानून का पालन करने की लत लगवाई है"..

"ओह मॉय गॉड!...इसका मतलब तो वो बड़ा ही कमीना किस्म का इनसान है"...

"जी!..निहायत ही घटिया दर्ज़े का आदमी है..अब तो मुझे उसे आदमी कहते हुए भी शर्म आती है"..

"वो किसलिए?"...

"आदमियों का काम होता है दूसरे की मुसीबत में काम आना"...

"जी"...

"लेकिन ये कमीना तो पहले आग लगाता है और फिर उसी आग में दूसरों को जलते देख प्रसन्न होता है"...

"ओह!...लेकिन हुआ क्या?...आप मुझे सारी बात खुल के बताएँ"...

"इसी कमीने के चक्कर में सब मेरा मज़ाक उड़ाने लगे हैँ आजकल".. 

"लड़कियों से लेकर छोटे-छोटे अबोध बच्चे तक...सब की हँसी का पात्र बन गया हूँ मैँ"..

"लेकिन कैसे?"... 

"तुम तो जानते ही हो कि पहले मेरा और डॉक्टर का खूब याराना हुआ करता था"....

"और अब छतीस का आंकड़ा?"..

"जी"..

"लेकिन कैसे?...पहले तो पूरा मोहल्ला मिसालें दिया करता था आप दोनों की दोस्ती की"...

"अब कसमें खाया करते हैँ हमारी दुश्मनी की"..

"जी!..लेकिन ये सब हुआ कैसे?...

"बात ही कुछ ऐसी हुई हम दोनों के बीच कि हमारे रास्ते...हमारी मंज़िलें जुदा-जुदा हो गई"..

"आखिर ये सब हुआ कैसे"...

"बात ज़्यादा पुरानी नहीं है...एक दिन ऐसे ही सड़क किनारे खड़े हो कर हम दोनों अपनी पिछली माशूकाओं के किस्से और उन से सम्बन्धित अपने अनुभवों को एक दूसरे के साथ सांझा कर रहे थे कि...अचानक मुझे इशारा करते हुए वो ज़ोर से चिल्लाया..ओए तनेजा!...देख माल जा रहा है"...

"ओ.के...फिर क्या हुआ?"...

"मैँने पलट के देखा तो एक कसे हुए बदन की स्वामिनी स्कूटर सवार कन्या...हाथ हिला...हमें वेव करती हुई फटाक से हमारी बगल से सांय-सांय करती हुई निकल कर सामने लाल बत्ती पर खड़ी हो गई"..

"ओ.के"...

"जैसे ही मैँ उसके पीछे जाने के लिए लपका तो तुरंत ही डॉक्टर ने पीछे से मेरा कॉलर खींच के कहा कि..." पहले मैँने इसे देखा था इसलिए पहले मैँ ही जाऊँगा इसके पीछे"...

"ओह!...फिर क्या हुआ?"...

"मैँ कौन सा कम था मैँने साफ-साफ कह दिया कि अगर यही सब करना था तो मुझे आवाज़ दे के चेताया क्यों था?"...

"इस हिसाब से तो पहला हक आप ही का बनता था उस पर"...

"वोही तो...लेकिन वो कमीना इतनी आसानी से कहाँ मानने वाला था..उल्लू का पट्ठा मेरा कॉलर छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था"..

"ओह!...फिर क्या हुआ?"...

"मैँ कौन सा कम था?..मैँने अपने कॉलर की परवाह किए बिना उसे इतनी ज़ोर से झटका दिया कि ये जा..और वो जा"...

"डॉक़्टर?"...

"नहीं!...मेरा कॉलर"...

"ओह!...

"मैँ सीधा लाल बत्ती की तरफ लपका कि इतने में अचानक हरी बत्ती हो गई और वो ये जा..और वो जा"...

"ओह!...उसका कोई क्लू या पहचान वगैरा?"..

"पतली कमर...लम्बे बाल"..

"ऐसी लड़कियाँ तो हमारे शहर में ना जाने कितनी होंगी"..

"जी!...सेम टू सेम यही तो दुविधा हो रही थी मुझे कि उसे कहाँ ढूँढू?..कैसे ढूँढू?...ना नाम का पता...और ठिकाना लापता"..

"फिर क्या हुआ?"..

"होना क्या था?..चुपचाप मायूस हो के बैठने के अलावा और चारा भी क्या था मेरे पास?"...

"ओ जाने जाँ...ढूँढता फिर रहा...मैँ तुम्हें रात-दिन..मैँ यहाँ से वहाँ...

मुझको आवाज़ दो...छिप गए हो सनम...तुम कहाँ"...

"क्या मतलब?"...

ये गीत गुनगुनाने के अलावा मेरे पास कोई और चारा ही नहीं बचा था"...

"ओ.के"...

"फिर एक दिन ऐसा लगा जैसे भगवान ने मेरी सुन ली"...

"वो लड़की मिल गई?"...

"नहीं!...वो ज़ालिम भला इतनी आसानी से कहाँ मिलने वाली थी?...लेकिन जैसे साक्षात चमत्कार हो गया हो मेरे सामने"...

"क्या मतलब?"...

"अचानक सोते वक्त सपने में मेरी यादाश्त ने ज़ोर मारा और...

"और उसका मासूम चेहरा अचानक आपकी आँखों के सामने आ गया?"..

"कमाल करते हैँ शर्मा जी..आप भी..जब एक बार बता दिया कि वो हमारे पीछे की तरफ से आई थी और आगे की तरफ गई थी तो इसमें उसके चेहरे के दिखने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता ना"...

"ओह!..तो इसका मतलब ज़रूर आपको उसकी लचकती..बल खाती कमर दिख गई होगी?"...

"तो क्या तुम भी उससे मिल चुके हो?"..

"नहीं-नहीं!..मैँ भला उसे कैसे मिल सकता हूँ...वो तो आपके सपने में आई थी ना"..

"तो फिर आपने उसका जुग्राफिया एकदम एगज़ैक्ट याने के सेम टू सेम कैसे बता दिया?"...

"बस ऐसे ही..आईडिए से"...

"कुर्बान जाऊँ तुम्हारे नेक आईडिए पे..क्या सटीक आईडिया है"...

"थैंक्स फॉर दा काम्प्लीमैंट...फिर क्या हुआ?"...

"अचानक सपने वो दिख गया जिसे बहुत पहले दिख जाना चाहिए था"...

"क्या दिख जाना चाहिए था?"...

"स्कूटर की स्टैपनी पे लिखा हुआ 'ब्रह्म' वाक्य..."हाय नी!...मैँ लेट हो गई"...

"ये उसकी स्टैपनी पे लिखा हुआ था?"...

"नहीं!..उसके कवर पे"...

"ओ.के!...फिर क्या हुआ?"...

"फिर क्या होना था?...जैसे ही मुझे वो 'ब्रह्म' वाक्य दिखाई दिया मैँ तो बल्लियों उछल कर पलंग से सीधा ज़मीन पे आ गिरा"...

"ओह!...चोट वगैरा तो नहीं आई ना?"...

"आई ना!...लेकिन मुझे नहीं...मेरे मुण्डू को"..

"पलंग से आप गिरे थे?"...

"जी"...

"और चोट मुण्डू को आई?"..

"जी!...अभी भी अस्पताल में भरती है...तीन-चार दिन में रिलीव हो जाएगा"...

"लेकिन कैसे?...गिरे तो आप थे"...

"ओह!..सबसे अहम बात तो मैँ आपको बताना भूल ही गया कि नीचे फर्श पे मेरी बगल में मेरा मुण्डू सो रहा था"...

"बेचारा!...फिर क्या हुआ?"...

"होना क्या था?..अगले दिन से मैँ उस नामुराद की खोज में दिन-रात एक कर के लग गया"..

"मुण्डू की?"....

"कमाल करते हैँ आप..मैँ भला उसे क्यों खोजने लगा?...और वैसे भी वो तो अस्पताल में ही था"...

"तो फिर?"..

"उसी बृह्म वाक्य वाली लड़की को खोज रहा था मैँ"...

"ओ.के!...फिर क्या हुआ?"...

"बस ऐसे ही एक दिन मैँ भरी दोपहरी में...लाल बत्ती पे खड़ा...पसीने में तरबतर हो उसी के बारे में  सोच रहा था कि अचानक पीछे सांय की आवाज़ के साथ एक टू-व्हीलर उसी ब्रह्म वाक्य(हाय नी!...मैँ लेट हो गई)को अपने स्टैपनी कवर पे चिपकाए  लालबत्ती जम्प कर आगे की तरफ लपका और...

"और उसके पीछे-पीछे आप भी लपक लिए?"...

"जी!...लेकिन वो तो साफ बच के निकल गई और मैँ पुलिस वालों द्वारा लपक लिया गया"...

"ओह!...

"स्सालों ने वो ठुकाई की...वो ठुकाई की कि बस पूछो मत"...

"अन्दरली जेब तक खंगाल खंगाल मारी"...

"ओह"...

"पूरे बारह सौ पच्चीस रुपए थे मेरी उस जेब में...उन्हें लेने के बाद भी स्साले...हरामखोर बार-बार यही कहे जाएँ कि और निकाल..और निकाल"...

"तो आपको बाकी के पैसे भी निकाल के मुँह पे मारने थे हरामखोरों के"...

"वोही तो किया....जितनी भी रेज़गारी पड़ी थी जेब में...सारी की सारी निकाल के उनके मुँह पर दे मारी"...

"ओह!...फिर क्या हुआ?"...

"फिर क्या?...उसके बाद तो उन्होंने मेरी वो धुनाई की...वो धुनाई की कि बस पूछो मत"...2afda890-baa8-f294-59cc-b009a15eab53-news_fb_IndianPoliceOfficer_Fuel

"ओह!..ये तो बहुत बुरा हुआ आपके साथ"...

"अजी अभी कहाँ?...बुरा होना तो मेरे साथ अभी बाकी था"...

"क्या मतलब?"...

"इतनी ठुकाई और लुट-पिट जाने के बाद एक बेचारे पुलिस वाले को मुझ पर तरस आ गया"..

"ओ.के"...

"वो मेरे पास आ...मुझ से हमदर्दी जताते हुए बोला कि...भईय्ये!...के बात?..घणा जलदी में था?"..

"जी"...

"तो फिर भईय्ये ...अगर थमने  घणी जलदी होवे सै ओर थम्म  सबर बी कोणी कर सकदे तो फेर टैम पे निकल्या करो ना घर से"...

"बिलकुल सही कहा उसने...फिर क्या हुआ?"..

"उसकी हमदर्दी भरी बातें सुन मैँने उससे झूठ बोलना उचित नहीं समझा और उसे सब कुछ सच-सच बता दिया"...

"गुड!..ये आपने अच्छा किया...फिर क्या हुआ?"..

"फिर क्या होना था?..मेरी पूरी बात सुनने के बाद वो तो जैसे पागल हो गया...अपनी टोपी उतार...अपने बाल नोचता झूम-झूम कर नाचते-गाते हुए ठुमकने लगा"..

"ओह!...लगता है कि उसे अचानक कोई दौरा वगैरा पड़ा होगा"...

"शायद...उसे ऐसे हँसता हुआ देख उसके बाकी साथी भी उसके पास दौड़े चले आए और उससे उसके ऐसे हँसने की वजह पूछने लगे और वजह बताने पर वे सभी भी अपना पेट पकड़ कर हँसते हुए वहीं सड़क पर लोट-पोट होने लगे".....

"आखिर ऐसा क्या अनोखा बता दिया था उसने कि उन सभी की ऐसी दयनीय हालत हो गई"...

"उनकी कहाँ?...सबसे दयनीय हालत तो मेरी हुई थी"....

"क्या मतलब?"...

"उसने जो बताया..उसे सुन कर तो एक बार को मैँ भी हक्का-बक्का हो चक्कर खा के गिरने ही वाला था कि भगवान ने जाने कैसे मुझे इतनी हिम्मत और ताकत दी कि मैँ इतने बड़े आघात को दिल से लगाने के बजाय उन सभी को टुकुर-टुकुर बस देखता रहा...बस देखता रहा"..

"ओह!...आखिर उसने बताया क्या था?"...

"यही कि वो "हाय नी!..मैँ लेट हो गई" वाले ब्रह्म वाक्य वाली कोई कमसिन कन्या नहीं बल्कि....

"बल्कि कोई लड़का था?"..

"शर्मा जी!...लड़का होता तो भी मैँ सुप्रीमकोर्ट के आदेश के चलते कुछ सब्र कर लेता...लेकिन वो तो.....वो तो..

"वो तो?"...

"वो तो ना लड़का...ना लड़की....

"क्या मतलब?"..

"वो तो  एक 'छक्का'  था"..

"यू मीन..हिजड़ा?"...hijras01

"जी"...

"ओह!..माई गॉड...इसका मतलब तो आपके साथ बहुत बुरी बीती"..

"जी!...बहुत बुरी"....

"लो शर्मा जी!...बातों-बातों में ध्यान ही नहीं रहा कि जाम तो कब का खुल चुका है"...

"जी"...

"तो फिर चलें?"...

"नहीं"...

"क्यों?...क्या हुआ?"...

"हाय!...नी मैँ लेट हो गई"... 

***राजीव तनेजा***

Rajiv Taneja

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गई मेरी भैंस पानी में

***राजीव तनेजा***

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"हैलो!...तनेजा जी बोल रहे हैँ?"...

"जी!...बोल रहा हूँ..आप कौन?"...

"मैँ चमनलाल ढींगरा!...कलानौर(रोहतक के पास का एक जिला) से"...

"ओह!..चमनलाल जी आप"...

"जी"...

"कहिए!...कैसे याद किया?"..

"आजकल मैँ दिल्ली आया हुआ हूँ...किसी ज़रूरी काम से"..

"कहाँ ठहरे हैँ?"..

"ब्लू मून होटल की बगल वाले 'सनलाईट' होटल में"...

"लेकिन वहाँ क्यों?"...

"वहाँ क्यों से क्या मतलब?..कहीं  ना कहीं तो ठहरना ही था"...

"लेकिन हमारे होते हुए भला आपको होटल में रुकने की ज़रूरत ही क्या थी?"...

"दरअसल!...परसों स्टेशन से भटकता-भटकता मैँ सीधा आप ही के घर आया था लेकिन आपके यहाँ तो ताला मुँह चिढा रहा था"...

"ओह!...तो फिर आपको आने से पहले फोन कर लेना चाहिए था ना"...

"जी!..कई बार किया था लेकिन आपने उठाया ही नहीं"....

"ओह!...तो उस दिन वो नामुराद शक्स आप ही थे जो बीस-बीस बार मिस काल कर के मुझे परेशान कर रहा था?"...

"जी!...जी हाँ...वो भलामानुस मैँ ही था...मेरे अलावा और भला कौन इतना ज़िद्दी और अड़ियल हो सकता है?"...

"और मैँ पागल का बच्चा...गुस्से में लाल-पीला हो के ऐसे ही खाम्ख्वाह...किसी और बेचारे को गाली पे गाली दिए जा रहा था"...

"क्या सच?"..

"जी"...

"वैरी स्ट्रेंज...बड़ी अजीब बात है"...

"जी!...अजीब तो मुझे भी बड़ा लगा था जब बार-बार मिस काल आ रहे थे"...

"तभी मैँ कहूँ कि परसों से मुझे चक्कर क्यों आए जा रहे थे?...और उसी दिन तो मैँ बार-बार ठोकर खा के गिर भी रहा था"...

"जी!...जैसे पुराने ज़माने में संत जनों की दुआओं वगैरा में बड़ा बल होता है...ठीक वैसे ही आजकल के कलयुगी ज़माने में हम जैसे शैतानों और हैवानों की बददुआओं में भी बड़ी ताकत होती है"मैँ गर्व से फूला ना समाता हुआ बोला...

"जी"...

"ओह!...लेकिन उस दिन आप सीधा कॉल करने के बजाए बार-बार मिस काल क्यों कर रहे थे?"...

"मिस कॉल नहीं करता तो और क्या करता?"...

"क्या मतलब?...सीधे-सीधे फोन भी तो कर सकते थे"...
"एक्चुअली!...हुआ क्या कि उस दिन स्टेशन पे उतरते ही एक कॉल सैंटर वाली छम्मक छल्लो से फोन पे सैटिंग हो गई और उसी के साथ बातें करने में मन ऐसा रमा कि ध्यान ही नहीं रहा कि कब फोन का बैलैंस खत्म हो गया"...

"ओह!..लेकिन अब तो हर जगह इनकमिंग फ्री है...इसलिए बैलैंस खत्म होने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता"...

"जी!...लेकिन मैँ तो रोमिंग में था ना"...

"ओह!...तो फिर से रिचार्ज करवा लेना था ना"...

"करवाया ना!...पूरे पचास रुपए का रिचार्ज करवाया"...

"फिर तो आप बड़े ही आराम से मुझे कॉल कर सकते थे"...

"जी!...लेकिन वो पचास रुपए भी तो उसी कम्बख्तमारी से बात करने के चक्कर में स्वाहा हो गए"...

"ओह!...तो फिर कुछ काम बना?"...

"काम बना?...पागल की बच्ची ऐसे ही बेकार में टाईमपास-टाईमपास खेल रही थी"...

"ओह!...तो फिर आपको एक-आध एक्स्ट्रा रिचार्ज करवा के सीधे मेरे से बात करनी चाहिए थी"..

"जी!...लेकिन...

"लेकिन क्या?"...

"लेकिन उस दिन मेरे पास पाँच-पाँच सौ के बँधे नोटों के अलावा और कोई छुट्टा नोट बचा ही नहीं था"...

"और इस ज़रा से काम के लिए उन्हें तुड़वाने का मन नहीं हुआ होगा?"...

"जी"..

"गुड!...वैरी गुड...ये सब तो खैर चलता ही रहता है ज़िन्दगी में कभी नाव गाड़ी पे तो कभी गाड़ी नाव पे...इस सब से घबराने की ज़रूरत नहीं...तू नहीं...और सही...और नहीं...और सही"...

"जी"...

"तो फिर किसी दिन फुरसत निकाल के आप आईए ना हमारे यहाँ"...

"जी!...ज़रूर"..

"तो फिर कब आ रहे हैँ?"...

"जब आप कहें"...

"वैसे अभी आप और कितने दिन तक हैँ यहाँ?"...

"जी!...काम तो यही कोई दो-चार दिन का ही है लेकिन आपको तो पता ही है कि आजकल सरकारी दफ्तरों में काम-काज कैसे होते है?"...

"जी!...कभी साहब होते हैँ तो क्लर्क गायब मिलता है और कभी क्लर्क और साहब..दोनों होते हैँ तो चपरासी या फिर स्टैनो डेट पे गई होती है"...

"चपरासी के साथ?"..

"जा भी सकती हैँ...अब हर बार मोटी आसामी थोड़े ही फँसती है जाल में"...

"जी"...

"तो इसका मतलब एक हफ्ते के लिए गई आपकी भैंस पानी में"...

"जी!..वैसे तो मैँ अपने मँझले भाई को सख्त ताकीद कर के आया हूँ कि मेरे पीछे से रोज़ाना का नियम बाँध ले"...

"किस चीज़ का?"...

"यही कि अपनी 'राम प्यारी' को जोहड़ किनारे दो घंटे से ज़्यादा की आउटिंग नहीं करानी है और आउटसोर्सिंग तो बिलकुल नहीं...ऐड्स का ज़माना है भय्यी...क्या पता किससे?...क्या रोग लग जाए?"".. ox

"जी!...वैसे भी बड़े-बुज़ुर्ग कह गए हैँ कि...सेफ्टी इज़ दा बैस्ट पॉलिसी"...

"जी"...

"लेकिन ये राम प्यारी कौन?"...

"हमरी अपनी...खुद की भैंस...अऊर कौन?"...

"ओह!...मैँ तो सोच रहा था कि आपकी पत्नि.....

"छी...छी-छी...कैसी अनहोनी और अनोखी बात करते हैँ तनेजा जी आप भी"...

"क्यों?...क्या हुआ?"...

"आपको भली भांति पता तो है कि...मैँ बाल ब्रह्मचारी...कन्या हो या नारी..मुझे सब हैँ  प्यारी"...

"ये तो खैर अच्छी बात है लेकिन ऐसे...अकेले कब तक?"...

"मेरा बस चले तो ज़िन्दगी भर तक....उम्र भर तक"...

"ओ.के...ओ.के...जैसी आपकी मर्ज़ी...आपने अपना जीवन जीना है और मैँने अपना"...

"जी"...

"और वैसे भी अपने को क्या फर्क पड़ता है?...कोई मरे या जिए"मैँ मन ही मन बुदबुदाता हुआ बोला...

"ये सब तो खैर चलता ही रहेगा...आप मुझे ये बताएँ कि कब आ रहे हैँ हमारे यहाँ?"... 

"मैँ क्या बताऊँ?...आपने बुलाना है...जब जी में आए...तब बुलाएँ"...

"अपुन ने तो बस आपका हुक्म बजाना है"...

"तो फिर...

"आप अपनी सुविधा देख लें...जब भी आपको कनवीनियैंट लगे"...

"ठीक है!..तो फिर कमिंग सनडॆ को आप आईए हमारे यहाँ...एक साथ डिनर करते हैँ"...

"सनडे को?"...

"जी"...

"मैँ तो सोच रहा था कि आज मैँ फ्री हूँ तो क्यों ना अभी...दोपहर को ही लँच टाईम में मिल लिया जाए"...

"अभी?"...

"जी"...

"अभी तो ज़रा मुश्किल है"...

"तो फिर रात को?"...

"नहीं!...रात को तो और भी मुश्किल है"..

"क्या मुश्किल है?"...

"एक्चुअली!... रात को किसी फंक्शन में जाना है और अभी भी जब आपका फोन आया तो मैँ किसी निहायत ही ज़रूरी काम में बिज़ी था"...

"ओह!...तो इसका मतलब मैँने आपको डिस्टर्ब किया?"...

"नहीं!...ऐसे तो कुछ खास नहीं लेकिन ऐसे अचानक...अनचाहा फोन आ जाने से बन्दा थोड़ा-बहुत डिस्टर्ब तो हो ही जाता है"...

"जी!..वैसे अभी मेरा फोन आने से पहले आप क्या कर रहे थे?"...

"कुछ खास नहीं...बस ऐसे ही एक ज़रूरी काम"...

"उस काम का कोई नाम भी तो होगा?"...

"दूध पिला रहा था"...

"दूध?"चमनलाल जी एकदम से चौंक कर बोल पड़े...

"जी"..

"लेकिन किसे?"...

"किसे से क्या मतलब?...अपनों को ही तो दूध पिलाया जाता है"...

"लेकिन अभी पिछले महीने ही तो मैँ कलकत्ता से हो के आया हूँ"...

"तो?"...

"वहाँ आपकी कलकत्ता वाली मौसी से मुलाकात हुई थी"...

"तो?"...

"वो तो कुछ और ही कहानी बता रही थी"...

"क्या?"...

"वो कह रही थी कि ..."वैसे ते साड्डे मुंडे विच्च कोई खोट कोईणी लेकिन थोहड़ी ज्यी...माड़ी-मोटी ज्यी कमी हैगी...तां कर के...

"उनकी बात पे मत जाईए...उनका क्या है?...वो तो हमेशा ऐसे ही बेमतलब का बकती रहती है"...

"क्या मतलब?"...

"उन्हें तो हमारी हर चीज़ 'थोहड़ी ज्यी' ही नज़र आती है"...

"क्या मतलब?"..

"उन्हें तो शुरू से ही अपने मट्ठे को शुद्ध मक्खन और दूसरे के 'इम्पोर्टेड चीज़'(Cheese)  को भी दही बताने की आदत है"..

"क्या मतलब?"...

"जवानी के दिनों में उन्हें बॉय चाँस किसी भी वजह से...अगर ज़रा सी भी खरोंच  लग जाती थी तो ऐसे हाय-तौबा मचा-मचा के पूरा मोहल्ला सिर पे उठा लेती थी कि मानों अभी के अभी...तुरंत अपना चौथा सिज़ेरियन करवा के आ रही हों"...

"ओह!...तो इसका मतलब आप अभी तक छड़े-छांट(कुँवारे) के बराबर हैँ"...

"छड़े-छांट के बराबर क्यों?...सांड के बराबर क्यों नहीं?"...

"लेकिन मौसी जी तो कह रही थी कि आप के घर में बच्चे नहीं"...

IndianBaby

"जैसी प्रभु इच्छा...इसमें हम और आप भला कर ही क्या सकते हैँ?"...

"तो क्या होने की कोई गुंजाईश भी नहीं?"...

"गुंजाईश क्यों नहीं?...एक से एक इलाज आ चुके हैँ अब तो...बस थोड़ा सा समय लगेगा"...

"लेकिन फिर ये आप दूध किसे पिला रहे थे?"...

"बीवी को"...

"बीवी को?"...

"जी हाँ!...अपनी...खुद की...इकलौती बीवी को"...

"लेकिन क्यों?"...

"क्यों से क्या मतलब?...उसका मन कर रहा था"...

"लेकिन होना तो इसका उल्टा होना चाहिए"...

"क्या मतलब?"...

"होना तो ये चाहिए कि बीवी अपना कर्तव्य समझ आपको दूध पिलाए और आप रिलैक्स मूड में...अपना मज़े से...मज़े ले-ले के उसके एक-एक सिप का ऐसे आनंद लें मानों साक्षात अमृत का रसपान कर रहे हों"...

"जी"...

"लेकिन यहाँ तो उलटा हो रहा है"...

"क्या मतलब?"...

"आप पीने के बजाय पिला रहे हैँ"...

"तो?"...

"दूसरे शब्दों में कहें तो उलटी गंगा बहा रहे हैँ"...

"इसमें उलटी गंगा बहाने की क्या बात है?...जब मेरा मन करता है तो वो भी तो पिलाती ही है ना"...

"तो?"...

"इसमें तो की क्या बात है?...किसी दिन मैँने पिला दिया...किसी दिन उसने पिला दिया...एक ही बात है"...

"अरे वाह!..एक ही बात कैसे है?"...

"उसका पीना...आपका पिलाना...एक बराबर?"...

"जी"...

"लेकिन ये सब काम तो...

"किस?..किस ज़माने की बात कर रहे हैँ चमनलाल जी आप?"...

"आजकल बराबरी का ज़माना है...औरत-मर्द में कोई फर्क नहीं...दोनों एक समान हाड़-माँस के पुतले हैँ"....

"कोई किसी से...किसी भी सैंस में कम नहीं"...

"ऐसे कैसे कम नहीं है?...मर्द..मर्द होता है और औरत...औरत होती है"...

"चलो बताओ कि अगर कोई मर्द...किसी औरत की पिटाई करे तो उस औरत को दर्द होगा कि नहीं?"...

"बिलकुल होगा"...

"और अगर कोई औरत...भगवान ना चाहे किसी मर्द की पिटाई करे तो उस मर्द को दर्द होगा कि नहीं?"..

"होगा क्यों नहीं?...बिलकुल होगा...मैँ खुद इस बात का गवाह हूँ"...

"कैसे?"..

"मैँ खुद कई बार पिट चुका हूँ"...

"औरतों से?"...

"और नहीं तो क्या मर्दों से?"...

"दैट्स नाईस...आपने कभी बताया नहीं"..

"बस!...ऐसे ही...दरअसल क्या है कि मुझे अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना बिलकुल भी पसन्द नहीं है"...

"ओ.के!...अब तो मान गए ना मेरी बात कि औरत मर्द सब बराबर होते हैँ...उनमें कोई दोयम नहीं...कोई सोयम नहीं"...

"जी!...लेकिन फिर भी मेरे हिसाब से जो काम औरतों के करने के होते हैँ...उन्हें मर्दों को करना शोभा नहीं देता"...

"लेकिन ईनाम में बराबर का हक लेना शोभा देता है?"...

"ईनाम?"...

"जी हाँ!...ईनाम और वो भी कोई छोटा-मोटा नहीं बल्कि पूरे पचास लाख का"...

"प्प...पचास लाख का?"चमनलाल जी हकलाते हुए बोले...

"जी हाँ!...पूरे प्प...पचास लाख का"मैँ भी उनकी नकल उतारते हुए बोला...

"लेकिन कैसे?"...

"कैसे क्या?...एन.डी टीवी इमैजिन वाले प्रोग्राम तो पेश कर रहे हैँ बच्चे को पालने वाला"...

rakhi-sawant-elesh-pati-patni-woh

"जी!...लेकिन आपके तो बच्चे हैँ ही नहीं"...

"तो क्या हुआ?...बच्चे को तो चैनल वालों ने खुद प्रोवाईड करना था..हमें तो बस पालना था"...

"लेकिन वो सब तो स्टूडिओ में होना था ना?"...

"जी"...

"तो फिर आप घर में क्या कर रहे थे?"...

"अरे बेवाकूफ!...घर में हम फीडर बॉटल से एक दूसरे को दूध पिला के बच्चे पालने की प्रैक्टिस कर रहे थे"...

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"धत्त तेरे की!...मैँ तो कुछ और ही समझ बैठा था"...

"क्या?"...

"क्कुछ नहीं?"...

"तो फिर आप सनडॆ को आ रहे हैँ ना?"...

"नहीं!...मैँ तो आज ही वापिस कलानौर जा रहा हूँ"...

"लेकिन अभी कुछ देर पहले तो आप कह रहे थे कि अभी हफ्ते भर तक आप यहाँ दिल्ली में ही रहेंगे"...

"जी!...लेकिन अभी-अभी दूसरे मोबाईल पे मैसेज आया है कि...

"गई मेरी भैंस पानी में"

***राजीव तनेजा***

Rajiv Taneja

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दिल तेरा दिवाना है सनम

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***राजीव तनेजा***

दिल तेरा दिवाना है सनम

कैसे कहूँ कितना पुराना है ये चमन

यूँ समझ लो कि गर 19 को हो तुम

तो तुमसे बरसों बरसों पुराना है अपन

देखता हूँ जब-जब मोहिनी सूरत तेरी

दिल मेरा बाग-बाग हो उठता है

कैसे कहूँ कि...

बत्तीसी तो हलक के अन्दर होती है

और जबड़ा मुँह के बाहर होता है

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***राजीव तनेजा***

Rajiv Taneja

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ज़िन्दगी को इस कदर करीब से जाना है मैँने(माईक्रो पोस्ट)

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***राजीव तनेजा***

ज़िन्दगी को इस कदर करीब से जाना है मैँने

पैरों में है टूटी चप्पल और हाथों में पैमाना है

बिग ब्लॉगर हाउस

राजीव तनेजा
Big_Boss_3 
बिग बॉस तृतीय शुरू हो गया...उसके देखने के बाद कुछ नया करने का विचार दिमाग में कौंधा कि क्यों ना इसी तर्ज़ पे एक नई धुन बनाई जाए?...याने के एक नया प्रोग्राम बनाया जाए जो सिर्फ नैट पर ही उपलब्ध हो और वो सिर्फ हिन्दी ब्लॉगजगत पर ही केन्द्रित हो...इसमें भाग लेने वाले हिन्दी के कुछ  ब्लॉगरों को कुछ नियम व शर्तों के साथ बाँध कर एक सप्ताह के किसी साईबर कैफे में बन्द कर दिया जाए।Business - Internet Access #4
जहाँ उन्हें प्रतिदिन के हिसाब से एक पोस्ट लिखने की अनुमति हो और वो भी सीमित शब्दों की...उन्हीं पोस्टों के गुण-दोष के आधार पर ये फैसला हो कि उनमें से कौन पटखनी मार विजयी होता है और कौन पराजित हो धाराशायी?
नोट:इस कार्यक्रम का मकसद किसी पर कोई आक्षेप लगाना नहीं बल्कि स्वस्थ मनोरंजन होगा।...तो फिर क्या कहते हैँ आप?...
आप सभी की राय एवं सुझाव आमंत्रित हैँ
अपनी-अपनी कल्पनाओं के पंख फैला कर दूर...नीले गगन में असीमित संभावनाओं की तलाश कीजिए कि इस पर्तियोगिता में कौन-कौन ब्लॉगर भाग लेगा?...वो किस तरह की पोस्ट लिखेगा?...उन्हें कौन-कौन पढेगा?...कौन-कौन टिप्पणी करेगा?...वगैरा...वगैरा।यकीन मानिए एक से एक चौंकाने वाले ...हँसाने वाले...गुदगुदाने वाले...यहाँ तक कि रुलाने वाले आईडिया हर पल आपके ज़हन में गुटरगूं कर किलोल करते नज़र आएँगे।
तो फिर देर किस बात की?...अपनी कल्पना शक्ति के घोड़ों को बिना लगाम दौड़ाईए और जीत ले जाईए एक से एक शानदार ईनाम।
जी हाँ!..एक से एक शानदार ईनाम जिनके बारे में सुनकर आप कतई अपने लोभ का संवरण नहीं कर पाएँगे...
पहला ईनाम:तीन साल तक किसी भी ब्लॉग पे बेनामी बन टिप्पणी करने का अधिकार
दूसरा ईनाम:हिन्दी ब्लॉगिंग से सम्बन्धित गढे मुर्दे उखाड़ने का एकाधिकार
तीसरा बम्पर ईनाम:मेरी लम्बी-लम्बी कहानियों को बिना पढे..उन पर कमैंट करने का लाईफ टाईम अधिकार(इस अधिकार को आप अपनी वसीयत के जरिए अपने वारिसों को भी लाभांवित कर सकते हैँ)
सांत्वना पुरस्कार: सांत्वना पुरस्कार के रूप में सभी टिप्पणीकर्ताओं के नामों और उनके ब्लॉगज़ के लिंक को मेरे सभी ब्लॉगज़ पर हमेशा के लिए सहेज कर रखा जाएगा
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हैप्पी ब्लॉगिंग ... आपके दिन और हमारी रातें मँगलमय हों ...जय हिन्द

दिल आज कायर है...गम आज अपना है

***राजीव तनेजा***

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"दिल आज कायर है...गम आज अपना है...उफ!...ये...सैंत्रो मेरी"…

गैरों के दुखों पे ओ रोने वालो ...कभी हो मेरे भी गम में शरीक"...

"ये क्या कर रहे हैँ तनेजा जी?...हटिए...दूर हटिए...इस घिसे हुए...सड़े से पीपे के पास खड़े हो के आप क्या कर रहे हैँ?"...

"धूप-बत्ती कर रहा हूँ...तुमसे मतलब?"...

"वो तो मुझे दिखाई दे रहा है कि आप इसकी आरती उतार रहे हैँ लेकिन क्यो?"...

"मेरी मर्ज़ी"..

"लेकिन फिर ऐसी शुभ घड़ी में आपकी आँखों में ये छलकते आँसू क्यो?"...

"गुप्ता जी!...अपने चश्मे पे अटी हुई धूल को झाड़िए ज़रा और फिर इत्मीनान से...तसल्ली से देख के बताईए कि मेरी आँखों में ये खुशी और हर्ष के आँसू है या फिर दुख और विषाद के?"...

"ओ.के!...लैट मी चैक...अपना ये...ये दाँया वाला डेल्ला ज़रा फैलाईए तो"....

"इतना बहुत है?"...

"थोड़ा और"..

"अब ठीक है?"...

"बस!..थोड़ा सा और"...

"ओफ्फो!...क्या मुसीबत है?...अपना एक बार में ही नहीं बता सकते?"...

"क्या?"...

"कितना फैलाना है?"...

"बस!..थोड़ा सा और"...

"लो!...बाहर ही निकाल देता हूँ...आप अपना आराम से गोटी-गोटी खेल ले"...

"क्या मतलब?"...

"जब मैँने अपना पूरा जोर लगा के अपनी आँख फैला दी...फिर भी आप कहे जा रहे हैँ कि ..और फैलाओ..और फैलाओ...तो मैँ क्या करूँ?"...

"ओह!...आई एम सॉरी...मैँ तो समझा था कि कहीं सचमुच में ही...

"क्या?"...

"यही कि आप अपनी आँखों से गोटी-गोटी खेलते हों"...

"कमाल करते हैँ गुप्ता जी आप भी...ऐसा भी कहीं होता है?"...

"जी!...होता तो नहीं है लेकिन मैँने सोचा कि आप अभी-अभी विलायत से आए हैँ तो....

"तो?"...

"शायद!...वहीं से कोई नया कांसैप्ट लाए हों"...

"हें...हें...हें...कमाल करते हैँ गुप्ता जी आप भी...ऐसा भी कहीं होता है?"...

"होता तो नहीं है लेकिन ..चलिए छोड़िए...आप बस हिलिए-डुलिए नहीं...मैँ अभी चैक किए देता हूँ"...

"क्या?"...

"यही कि आपकी आँखों में आँसू खुशी के हैँ या फिर दुख के"...

"ओ.के...ओ.के"...

"अब ठीक है?"मैँ अपनी दायीं आँख की पुतली को फैलाता हुआ बोला...

"जी!...जी बिलकुल"...

"ठीक है!...तो फिर बताइए कि क्या नोटिस किया आपने?"...

"यही कि आँखे आपकी बता रही हैँ आप खुश हैँ...बहुत खुश"...

"जी"...

"लेकिन किसलिए?"....

"पट्ठे को सब जो सिखा दिया...आईन्दा से मेरे साथ पंगा नहीं लेगा"...

"किसे सबक सिखा दिया?...कौन पंगा नहीं लेगा?"...

"टॉप सीक्रेट"...

"जैसी आपकी मर्ज़ी"...

"और...और बताओ कि मेरे चेहरे पे क्या दिखाई दे रहा है?"..

"आपका पीला पड़ा चेहरा बता रहा है कि आप थोड़े दुखी भी हैँ"...

"थोड़े?...या फिर ज़्यादा?"...

"जी!...थोड़े"...

"यहीं तो  आपको गलती लग रही है जनाब...मैँ थोड़ा नहीं बल्कि...ज़्यादा...बहुत ज़्यादा दुखी हूँ"...

"क्या सच?"...

"जी"मैँ ठण्डी साँस लेता हुआ बोला...

"लेकिन एक ही टाईम पे आपके चेहरे पे ये दो-दो मिश्रित एक्सप्रैशन कैसे?"...

"यही तो अपना कमाल है बच्चू"...

"क्या?"...

"किसी को अपने अन्दर की बात नहीं पता चलने देता"...

"लेकिन कैसे?"...

"टॉप सीक्रेट"...

"ओह!...लेकिन इस तरह आड़े-तिरछे...विद्रूप से चेहरे बना के दुखी होने से फायदा?"...

"क्या मतलब?"...

"अपना आराम से दहाड़ें मार-मार के भी तो रोया जा सकता है"...

"जी!...रोया तो जा सकता है लेकिन...

"तो फिर इतनी सारी मेहनत?...इतना सारा स्यापा?...किसलिए?"...

"किसलिए...क्या?...बस!...ऐसे ही...ऐज़ हे हॉबी...पैदायशी शौक है मेरा"...

"ओह!...तो फिर ठीक है"...

"और फिर क्या फायदा?..ऐसे अनजाने लोगों के आगे ...बेकार में ही अपना दुखड़ा रो-रो अपना गला सुजाता फिरूँ?"..

"जी!..किसी ने कुछ करना-कराना थोड़े ही होता है?...उल्टा सब तमाशा और बना लेते हैँ"..

"बिलकुल सही कहा आपने"...

"लेकिन मैँ तो आपका बाल सखा हूँ...पुराना मित्र हूँ"...

"तो?"...

"इस नाते आप मुझे तो बता ही सकते हैँ"...

"जी!...बता तो सकता हूँ लेकिन क्या है कि...ऐन टाईम पे अपने कई मित्रों को रंग बदलते देखा है...इसलिए थोड़ा संकोच सा फील कर रहा हूँ"...

"क्या मतलब?"...

"मैँने दोस्तों को पीठ पीछे वार करते देखा है"...

"ओह!...लेकिन क्या आपने मुझे भी उन जैसा समझ लिया है?"...

"जी!...कुछ-कुछ...सब एक जैसे ही होते हैँ"...

"अगर ऐसा है तो मुझे पहले...बहुत पहले ही आपका साथ छोड़ कर चले जाना चाहिए था"...

"तो फिर गए क्यों नहीं?"...

"क्योंकि मेरी नज़र आपकी सैंत्रो पर थी"...

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"क्या मतलब?"..

"मैँ कई दिनों से सोच रहा था कि आपसे...आपकी सैंत्रो की बात करूँ?"...

"क्या मतलब?...मेरी सैंत्रो कोई लड़की है जो तुम उसका रिश्ता माँगने की सोच रहे थे?"...

"नहीं-नहीं!...मेरा ये मतलब नहीं था"...

"तो फिर क्या मतलब था?"...

"यही कि मैँ आपकी सैंत्रो खरीदना चाहता था"...

"क्या सच?"...

"जी बिलकुल"...

"लेकिन तुम्हारे पास तो अपना...खुद का टू-व्हीलर है ही और तुम उसी पे आते-जाते हो"...

"जी!...ऐसे तो एक थ्री-व्हीलर भी है"...

"मालुम है...उसे तुम्हारी बीवी चलाती है ना?"...

"जी"...

"तो फिर तुम इसका क्या करोगे?"...

"किसका?"...

"सैंत्रो का"...

"बात तो आपकी सही है लेकिन...

"लेकिन क्या?"...

"लेकिन जब से मेरी बीवी ने बगल वाले 'चौबे' जी की 'मिश्राईन' को उनके साथ उनकी ऐल्टो में घूमते हुए देखा है...ज़िद पे अड़ के खड़ी हो गई हैँ कि... "हमहु....अब सैंत्रो में घूमे-फिरेबा करि"...

"एक मिनट!..एक मिनट...आपने अभी कहा कि 'चौबे' जी की 'मिश्राईन'?"...

"जी"...

"ये कौन सी कास्ट हो गई?...'चौबे' जी की 'मिश्राईन'?...कायदे से तो 'चौबे' जी तो 'चौबाईन' होनी चाहिए  और मिश्रा जी की 'मिश्राईन'?"...

"जी!...मिश्रा जी की ही तो ये मिश्राईन है"...

"लेकिन कैसे?"...

"कैसे...क्या?...पाँच बरस पहले बिजनौर से ब्याह के लाए थे उसे"...

"अरे!...मेरा मतलब था कि अगर वो मिश्रा जी की मिश्राईन है तो फिर चौबे जी के साथ कैसे?"...

"ओह!...तो फिर ऐसे कहिए ना"...

"दरअसल!...क्या है कि आजकल अपने 'चौबे' जी दो नम्बर में बहुत नोट छाप रहे हैँ"...

"तो उन्होंने अपनी 'चौबाईन' को 'मिश्राईन' कह के बुलाना शुरू कर दिया?"...

"नहीं-नहीं!...बिलकुल नहीं"..'

"तो फिर?"...

"मिश्रा जी तो उनके बॉस हैँ"...

"तो?"...

"उन्हीं की बीवी के साथ तो टांका भिड़ा है अपने चौबे जी का"...

"ओह!..तो ये बात है"...

"जी"...

"तो फिर ठीक है...बोलो!...कितने में खरीदोगे?"..

"क्या?"...

"मेरी सैंत्रो"...

"कितने में क्या?...अपना बस वाजिब दाम पर मिल जाए तो मैँ खुद को गंगा नहाया समझूँ"...

"फिर भी!...कुछ बजट तो होगा आपका?"...

"जी!...यही कोई दो-पौने दो लाख तक मिल जाए तो मैँ आराम से अफोर्ड कर लूँगा"...

"पौने दो तो नहीं लेकिन हाँ!...अगर तुम एक लाख पिच्यासी हज़ार दे दो तो डील पक्की"..

"कुछ और कम नहीं हो सकता क्या?"...

"अरे!...इससे तो ज़्यादा मुझे वो 'कार बहार' वाला डीलर ही दे रहा था लेकिन...

"ठीक है!...मुझे मंज़ूर है"...

"तो फिर निकालो ब्याना"...

"जी!...ज़रूर...लैट मी चैक...

"नहीं!...चैक तो मैँ नहीं लूँगा...मुझे कैश चाहिए..चैक का कोई भरोसा नहीं कि कब बाऊँस हो जाए?...कुछ पता नहीं"...

"नहीं-नहीं!..आप गलत समझे..मैँ तो कह रहा था कि अभी चैक करता हूँ कि जेब में कितनी धन-माया पड़ी है?...और फिर हम ठहरे गुटखा...खैनी और तम्बाखू वाले...अपने कौन से बैंक में खाते हैँ?"...

"ओह!..तो फिर यू कैन चैक"...

"थैंक्यू"कह गुप्ता जी अपनी जेब खंगालने का उपक्रम करने लगते हैँ...

"अभी!...फिलहाल आपकी जेब में कितने रुपए हैँ?"..

"वोही तो देख रहा हूँ"...

"ओ.के"...

"रेज़गारी और चिल्लड़ वगैरा मिलाकर यही कोई दो-सवा दो हज़ार पड़े हैँ अभी फिलहाल मेरे पास"...

"बस?"..

"लीजिए!...फिलहाल तो आप इन्हें ही रखिए"...

"लेकिन सिर्फ दो हज़ार?...इससे क्या होगा?"...कम से कम दस हज़ार तो दीजिए"...

"आप अभी इसे...ऐज़ ए टोकन मनी रख लीजिए...बाकी के मैँ घर से ला के देता हूँ ना"...

"ठीक है!...तो फिर नो प्राबल्म"मैँ अपनी जेब में रुपए डालता हुआ बोला...

"तो फिर डिलीवरी लेने कब आऊँ?"...

"कब क्या?...जब मर्ज़ी ले लो...चाहो तो अभी ले लो"...

"अभी?"..

"हाँ!...अभी ले लो...क्या दिक्कत है?...मेरी तरफ से तो ये वैसे भी अब तुम्हारी हो चुकी है"...

"हें...हें...हें...ऐसा कैसे हो सकता है?"...

"क्या मतलब?"...

"अभी तो मैँने बस आपको 'टोकन मनी' ही दी है"...

"गुप्ता जी!...लगता है कि आपने मुझको अभी ठीक से पहचाना नहीं"...

"आपने अभी सिर्फ मेरा बाहरी रूप देखा है...कभी दिल के अन्दर भी तो झाँक के देखिए"...

"क्या मतलब?"...

"अरे!..जब जबान कर दी...तो कर दी...आप बस!...इसे अभी के अभी ही ले के जाईए"...

"लेकिन...

"लेकिन-वेकिन कुछ नहीं...मैँने कह दिया ना...आप इसे अभी ले के जाईए"...

"लेकिन मैँ सोच रहा था कि पहले अपनी श्रीमति जी को भी दिखा देता तो...

"क्या आप सारे काम अपनी पत्नि को बता के करते हैँ?"...

"नहीं!...बिलकुल नहीं"...

"तो फिर?"...

"ओ.के...ओ.के!...अगर आप नहीं मानते हैँ तो फिर जैसी आपकी मर्ज़ी"...

"ठीक है!...तो फिर लो...चाबी पकड़ो"...

"ज्जी!....नेक काम में तो वैसे भी देरी नहीं करनी चाहिए"गुप्ता जी हाथ आगे बढाते हुए बोले...

"एक मिनट!...तनेजा जी...मेरे ख्याल से मैँ इसे आज के बजाय कल ले जाऊँ तो ज़्यादा अच्छा रहेगा.....

"कल?"...

"आपको कोई ऐतराज़ तो नहीं?"...

"नहीं!...ऐतराज़ तो खैर...क्या होना है?...लेकिन मेरे ख्याल से नेक काम में देरी नहीं करनी चाहिए"...

"दरअसल!...क्या है कि मैँ अभी...फिलहाल किसी काम से अपने ससुराल जा रहा था तो सोच रहा था कि आज के बजाय कल वापिस आने के बाद....

"अरे वाह!..ये तो और भी बढिया बात है...अपना सीधे...यहीं से...डगमग़-डगमग करते हुए सासू माँ के द्वार पे धावा बोल डालिए"....

"धावा?"...

"जी हाँ!...धावा...और वो भी फुलटू इम्प्रैशन से लैस...रुआब भरा धावा"...

"ठीक है!...तो फिर जैसा आप उचित समझें....चाबी कहाँ है?"...

"कहाँ क्या?...चौबीसों घंटे मेरी जेब में रहती है...लीजिए"मैँ जेब से चाबी निकाल पकड़ाता हुआ बोला...

"नहीं!...आज रहने दीजिए....कल पे ही रखते हैँ"...

"क्यों?...क्या हुआ?"...

"मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि आज शनिवार है"...

"तो?"...

"शनिवार के दिन तो मैँ किसी चीज़ का सौदा नहीं करता...लोहे का तो बिलकुल नहीं"...

"ओह!...

"आप चिंता क्यों करते हैँ?...कल होने में अब बचे ही कितने घंटे है?"...

"ठीक है!...तो फिर जैसी आपकी मर्ज़ी"मैँ ठण्डी साँस लेते हुए बोला...

"ओ.के!..तो फिर कल मिलते हैँ"...

"बाकी के पैसों के साथ?"...

"ज्जी!..जी बिलकुल...इसमें भला कहने की क्या बात है?"...

"ओ.के!...बॉय"..

"बॉय"...

"तनेजा जी!..एक बार गाड़ी के दर्शन करवा देते तो...

"हाँ-हाँ!..क्यों नहीं?...इसमें भला क्या दिक्कत है?...आप ही की चीज़ है...जब मर्ज़ी...जितने मर्ज़ी दर्शन कीजिए"ये कह के मैँ एक साईड हो जाता हूँ"...

"लीजिए!...कीजिए खुल के दर्शन कीजिए"...

"लेकिन गाड़ी है कहाँ?"...

"ये!...ये आपके सामने ही तो खड़ी है"...

"लेकिन कहाँ?"...

"ओफ्फो!...तुम्हारी आँखे हैँ या बटन?"...

"क्या मतलब?"...

"ये गाड़ी नहीं तो और क्या है?"मैँ अपनी कार की छत पे धौल जमा उसे बजाता हुआ बोला...

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"ओह!..तो ये फूटा कनस्तर आपका है?"...

"मेरा क्यों?...अब तो ये तुम्हारा है"...

"क्या मतलब?"...

"अभी तुमने मुझसे मेरी कार खरीदी है कि नहीं?"...

"जी!...खरीदी तो है लेकिन...ये तो...

"अभी इसी की ही तो 'टोकन मनी' दी है तुमने"... 

"इसकी?"गुप्ता जी चौंक कर परे हटते हुए बोले

"जी हाँ!...इसकी"...

"पागल समझ रखा है आपने मुझे?"...

"क्या मतलब?"..

"इस फूटे हुए कनस्तर को मैँ भला क्यों खरीदने लगा?"...

"मुझे क्या पता?"...

"नहीं!...बिलकुल नहीं...इसे तो मैँ बिलकुल भी नहीं खरीदने वाला"...

"ओए!...जबान कर के फिरता है?...तू आदमी है के घचक्कर?"...

"यही तो मैँ भी पूछ रहा हूँ"...

"क्या?"...

"ये पीपा है या कनस्त्तर?"...

"थप्पड़ इतने मारूँगा कान पे कि वहाँ पे भी पलस्तर चढवाते हुए नज़र आओगे"..

"लेकिन इसकी ये हालत कैसे?...अभी कुछ दिन पहले ही तो मैँ आपको आपके सात बच्चों के साथ धड़ल्ले से इस पर सवारी करते देखा था"...

"तो?"...

"अब तो ये इतनी खराब दिख रही है कि मैँ क्या?...कोई भी धोखा खा जाएगा"...

"किस बात का?"...

"यही कि ये पीपा है या फिर है कोई कनस्तर?"..

"तो फिर मुझ से मार नहीं खाएगा?"...

"लेकिन इसकी ये...इतनी बुरी हालत किसने कर दी?"...

"ऑफकोर्स मैँने!...और भला किसमें दम है जो मेरी किसी चीज़ की तरफ आँख उठा कर भी देखे"...

"जी!...लेकिन कब?...कैसे?...और क्यो?"...

"सब मेरी ही हठधर्मी का नतीज़ा है"...

"क्या मतलब?"...

"ना मैँ बोर्ड लगाता और ना ये सब होता"...

"कैसा बोर्ड?...कौन सा बोर्ड?"...

"नो पार्किंग का बोर्ड"...

"ओह!...तो इसका मतलब आपने 'नो पार्किंग' एरिया में अपनी गाड़ी खड़ी कर दी थी..तभी कोई इसे ठोक गया होगा"...

"मुझे क्या येड़ा समझ रखा है क्या?"..

"क्या मतलब?"...

"मैँ भला अपनी गाड़ी को 'नो पार्किंग' ऐरिया में क्यों खड़ी करने लगा?"...

"तो फिर किसने?"...

"वो तो उस हरामखोर ने अपनी बाईक खड़ी की थी"...

"कहाँ?"..

"नो पार्किंग ऐरिया में...स्साले!...को अच्छी भली आँखे होते हुए भी डेढ फुट बॉय डेढ फुट का 'नो पार्किंग' लिखा हुआ बोर्ड दिखाई नहीं दिया था"..

"वो कहाँ पर है?"...

"मेरे घर के सामने"...

"क्या मतलब?...आपका घर तो गली के अन्दर है"...

"तो?"...

"वहाँ कौन सी 'नो पार्किंग ज़ोन है"...

"मेरी अपनी...खुद की बनाई हुई...बकायदा मैँने बोर्ड लगाया हुआ है उस पर कि...

"यहाँ गाड़ी खड़ी करना सख्त मना है"...

"क्या मतलब?...ऐसा कैसे हो सकता है"...

"अरे वाह!...हो कैसे नहीं सकता...मेरा अपना...खुद का खरीदा हुआ घर है"...

"तो?"...

"उसका अगाड़ा और पिछवाड़ा भी तो मेरा ही हुआ ना?"...

"जी!...हुआ तो सही लेकिन सड़क तो सरकारी...

"सरकारी है तो क्या हुआ?...इसका मतलब ये तो नहीं हो जाता कि सारे जहाँ के कुत्ते-बिल्ली वहाँ आ के हकते-मूतते रहें?"...

"तो फिर इसके लिए तो आपको 'एम.सी.डी' वालों की कुत्ता पकड़ गाड़ी से संपर्क करना चाहिए"...

"अरे!...कुत्ते-बिल्लियों से लेकर बाघ-बकरियों तक के लिए तो मैँ अकेला ही काफी हूँ"...

"वो कैसे?"...

"ऐसी डरावनी आवाज़ में विद्रूप एवं विकृत चेहरे बना-बना के भौंकता हूँ कि आस-पड़ौस वाले भी कई बार मुझे सचमुच का कुत्ता समझ लेते हैँ"..

"ओह!...

"और डर के मारे इतना सहम जाते हैँ...इतना सहम जाते हैँ कि कोई जल्दी से चूँ तक करने की जुर्रत नहीं करता"...

"गुड!...वैरी गुड"...

"जब आदमियों की ये हालत है तो फिर मेरी हेठी के चलते इन पंछी-परिन्दों और जानवरों की औकात ही क्या है?...किस खेत की मूली हैँ वो?"...

"जी"...

"लेकिन स्साले!..इन उल्लू के पट्ठों को कैसे समझाऊँ?"...

"ओह!...तो क्या आपके घर-आँगन में उल्लुओं का भी बसेरा है?"...

"नहीं-नहीं!...बिलकुल नहीं...वो भला अपना डेरा मेरे यहाँ क्यों बसाने लगे?"..

"तो फिर?"...

"मैँ तो उन हरामज़ादों की बात कर रहा था जो मेरी तमाम तरह की जायज़-नाजायज़ वार्निंगों और चेतावनियों के बावजूद मुझे अनदेखा कर अपनी गाड़ी वहाँ खड़ी करते हैँ"...

"ओह!...तो फिर आपको एक काम करना चाहिए"...

"क्या?"...

"घर के बाहर कुछ गमले...पौधे वगैरा लगाकर वृक्षारोपण वगैरा करते रहा करें"...

"कई बार कर के देख लिया...हर बार कोई ना कोई हरामज़ादा...मेरी सारी मेहनत पे पानी फेर डालता है"...

"क्या मतलब?"...

"गमले समेत सारे पौधों और क्यारियों को तोड़-मरोड़ कर तहस-नहस कर डालता है"..

"ओह!...

"ये शहर नहीं चोरों की बस्ती है...चोरों की बस्ती"...

"क्या मतलब?"...

"यहाँ चोरों को भी मोर पड़ जाते हैँ"...

"क्या मतलब?"...

"एक तो मैँ बड़ी मुश्किल से रात-बिरात सरकारी नर्सरी से पौधे चुरा के लाता हूँ और अगले दिन ही मुझे कोई सवा सेर टकरा जाता है"...

"मतलब...कोई और आपके घर से उन्हें चुरा के ले जाता है?"...

"जी!...मेरी तमाम कोशिशों और सावधानियों के बावजूद"...

"आपको इन चोरों की वजह से ही दिक्कत और परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है ना?"..

"जी!...एक तो वैसे भी चोरी इतना पेचीदगी भरा काम है कि बस पूछो मत...ऊपर से इन चोरों ने जीना हराम कर रखा है"...

"इस चोरी वगैरा के पीछे आपका असली मकसद तो अपने घर के आगे दूसरों की गाड़ी खड़ी नहीं होने देना है ना?"...

"जी"...

"या फिर किसी किस्म का कोई लालच वगैरा?"...

"तौबा-तौबा...क्या बात कर रहे हैँ आप?...मैँ और लालच?...तौबा-तौबा"मैँ अपने कानों को हाथ लगाता हुआ बोला...

"ठीक है!...तो फिर आप इस चोरी जैसे पेचीदगी भरे काम को करने के बजाए आसान रास्ता अपनाया करें"...

"क्या?"...

"आप कोई पुराना सा...टूटा-फूटा...पाँच...सात सौ रुपए वाला टू-व्हीलर अपने घर के आगे इस तरह अड़ा कर खड़ा कर दिया करें कि किसी के और कुछ खड़ा करने लायक कोई जगह ही बाकी ना रहे"...

"जी!...सब कर के देख चुका हूँ लेकिन कोई फायदा नहीं"...

"क्या मतलब?"..

"उसके इंजर-पिंजर तक स्मैकिए लूट के ले गए"...

"ओह!...तो क्या आपको पता भी ना चला?"..

"पता कैसे चलता?...किसी दिन उसके टायर गायब हुए तो किसी दिन उसकी स्टैपनी"...

"वैसे उसमें अब बचा क्या है?"...

"एक मिनट...मुझे सोचने का ज़रा मौका दें...लैट मी थिंक"...

"ओ.के"...

"हैंडिल को तो मैँने परसों रात ही देखा था लेकिन शायद...आज....हाँ!...याद आया...आज तो वो भी गायब था"...

"ओह!...तो फिर आप एक काम करें"...

"क्या?"...

"आप परसराम बनिए से मिल लें?"...

"कौन सा परसराम बनिया?...वो कमेटी वाला?"..

"जी!...जी हाँ...वही"...

"उससे किसलिए"...

"उसके पास जब्त किए हुए रिक्शों की भरमार रहती है"...

"तो?...मैँने उनका क्या करना है"...

"उससे  दो-चार बिना सीट और गद्दी वाले जंग लगे रिक्शा ले आएँ...सस्ते ही दे देगा...अपना खास आदमी है"...

"लेकिन किसलिए?"..

"उन्हें अपने घर के बाहर सीमेंट में चिनवा के इस कदर जाम करवा दें कि किसी और के लिए वहाँ अपनी गाड़ी खड़ी करने की कोई जगह ही ना बचे"...

"नॉट ए बैड आईडिया!...लेकिन जाम करवाने की ज़रूरत क्या है?...उन्हें तो वैसे भी खड़ा कर सकते हैँ"...

"पागल तो नहीं हो गए हो कहीं?...टायर ही कहाँ होंगे उसमें"...

"क्या मतलब?"...

"अरे!...सस्ता...चालू सा जुगाड़ हमें करना है कि बस किसी तरह से जगह घिरी रहे"...

"जी"...

"और फिर साबुत रिक्शे खरीद के आपको अपना मेहनत से कमाया हुआ पैसा फिर चोरी करवाना है क्या?"...

"ओह!...ये बात तो मेरे दिमाग में ही नहीं आई"...

"कोई बात नहीं...बुढापे में कभी-कभी हो भी जाता है"...

"क्या?"...

"आदमी बावला"...

"जी!...ये तो है...अब मुझे देखिए...चालीस से ऊपर की उम्र नहीं है मेरी लेकिन दिमाग को जैसे अभी से ही जंग लगना शुरू हो गया है"...

"लेकिन इसमें चिंता की कोई बात नहीं है...अपना पाँच-सात सालों बाद अपने आप आपकी ये समस्या दूर हो जाएगी".....

"तो क्या इस बिमारी का असर पाँच-दस सालों तक ही रहता है?"...

"नहीं"...

"तो फिर?"...

"तब तक तो आप वैसे ही टैँ बोल जाएँगे"...

"अपने आप?"...

"जी!...ये बिमारी ही कुछ ऐसी है"...

"ओह!...इसका मतलब मेरे पास ज़्यादा वक्त नहीं है"..

"जी"...

"फिर तो मुझे जल्दी करनी चाहिए"...

"जी"...

"तो फिर यही...आपका बताया इलाज कारगर रहेगा ना इन ढीठों के लिए?"...

"जी"...

"और कोई चारा भी तो नहीं...सारे के सारे इंतज़ामात फेल जो हो चुके हैँ"...

"तो क्या इससे पहले आप और भी कुछ तरीके अपना चुके हैँ इस सब के लिए"...

"और नहीं तो क्या?...आपने मुझे क्या निठल्ला समझ रखा है जो मैँ ऐसे हाथ पे हाथ धरे बैठा रहूँ?"..

"तो फिर आपने...गाड़ियाँ खड़ी ना हों...इसके लिए किस तरह के?...और कैसे उपाय अपनाए?"...

"जैसे..कई बार मैँ बाहर खड़ी हुई गाड़ियों के टायरों में से हवा निकाल देता था...उन्हें पंचर कर दिया करता था वगैरा"....

"गुड!...वैरी गुड...इन नामाकूलों के साथ ऐसा ही सलूक किया जाना चाहिए"...

"लेकिन कोई फायदा नहीं"...

"क्या मतलब?"...

"रोज़ाना के केस आते देख नुक्कड़ के पंचर वाले मिस्त्री ने मेरे घर के सामने ही अपना नया ठिय्या जमा लिया"...

"ओह!...

"उसका काम चलता देख...दो-चार गैराज भी खुल गए...अब रोज़ाना  धुँआ-धक्कड़ से दो-चार होते हुए दिन भर उनकी चिल्लम पों सुननी पड़ती है"....

"रोज़ाना?"...क्या कोई छुट्टी वगैरा भी नहीं करते?"...

"जी नहीं...कोई छुट्टी नहीं करते...यही तो रोना है कि कम्बख्तमारे!..सनडॆ की भी छुट्टी नहीं करते"...

"ओह!...

"मैँ तो सोच रहा हूँ कि लेबर कमिश्नर को कुछ दे-दिला के स्सालों...पर बाल मज़दूरी का केस करवा दूँ"...

"नॉट ए बैड आईडिया"...

"लेकिन पट्ठा मुँह कुछ ज़्यादा ही बड़ा फाड़ रहा है जो कि मेरे बूते से बाहर है"...

"ओह!...तो फिर आपको कोई आसान सा..सुलभ सा तरीका सोचना चाहिए था"...

"सोचा ना"..

"क्या?"...

"मैँने अपने घर का बचा हुआ बासी खाना बाहर खड़ी हुई गाड़ियों पर फैंकना शुरू कर दिया"...

"अरे वाह!...ये तरीका तो बड़ा ही लाजवाब है"...

"खाक लाजवाब है"...

"क्या मतलब?"...

"मेरे घर के बाहर खाना माँगने के लिए भिखमंगों की लाईनें लगने लगी"...

"ओह!...

"इतने में ही बस कहाँ?...मुझे लोगों की गाड़ियाँ गन्दी करते देख....उन्हें साफ करने वालों का धन्धा चल निकला"...

"ओह!...

"उनकी देखादेखी...बरसों से मक्खियाँ मार रहे उस 'अग्रवाल पेंट्स' के मालिक भी मन्द पड़ा धन्धा ज़ोरों से चल निकला"...

"वो कैसे?"...

"दस-दस रुपए में इस्तेमाशुदा पुरानी धोतियों के टुकड़े जो बेचने लगा"...

"ओह!..

"अभी परसों तो हद ही हो गई...हद की?...हद नाल्लों वी वध हो गई"...

"ओह किवें?...वो कैसे?"...

"एक स्साला!...प्यार का मारा पूरे डेढ घंटे तक मेरे घर के आगे अपनी बाईक अड़ाए खड़ा रहा"...

"तो क्या आपने उसे डांटा नहीं"...

"डांटा क्यों नहीं?...बहुत डांटा...लेकिन कोई मेरी सुने तब ना?"...

"वो हरामखोर!...ज़रूर अपनी माँ #$%ं&%  होगा"...

"नहीं-नहीं!...बिलकुल नहीं"...

"तो फिर वो ज़रूर अपनी बीवी से बात कर रहा होगा"... 

"अजी कहाँ?...बीवी से बात करने की भला किसे फुर्सत होती है?....उससे भला कोई दो-दो घंटे तक क्या बात करेगा?...और वो भी मुस्कुरा-मुस्कुरा के?"...

"वो तो ज़रूर ही अपनी किसी माशूका के साथ गुटरगूँ कर रहा होगा"...

"जी"...

"आपको ज़ोर से चिल्ला के उसे डांटना चाहिए था"..

"डांटा ना...लेकिन कोई मेरी सुने तब ना?"...

"क्या मतलब?"..

"वो तो नीचे खड़ा था और मैँ दूसरी मंज़िल पे खड़ा चिल्ला रहा था...ऐसे में मेरी आवाज़ भला उस तक कैसे पहुँचती?"...

"ओह!...तो आपको नीचे आ जाना चाहिए था"...

"आया ना...लेकिन...

"कोई आपकी सुने...तब ना?"..

"जी!...स्साले के आगे चिल्ला-चिल्ला के  मेरा हलक सूख के कांटे समान हो गया लेकिन उस मिट्टी के माधो पर कोई असर नहीं...पट्ठा...टस से मस भी ना हुआ"...

"ओह!...तो फिर आपने क्या किया?"...

"करना क्या था?...गुस्सा तो इतना आ रहा था कि इस स्साले के हाथ-मुँह सब एक ही मुक्के में तोड़ दूँ लेकिन...

"लेकिन क्या?"...

"लेकिन फिर ठंडे दिमाग से सोचा कि ऐसे गन्दे...छिछोलेदार आदमी को हाथ लगाना भी तो महापाप की श्रेणी में आएगा"...

"जी!..मेरे ख्याल से वृहद तनेजा कोष के छटे अध्याय के पाँचवें प्रसंग की बारहवीं पंक्ति में आपके आदरणीय गुरूजी भी यही लिख गए हैँ ना कि...."ऐसे नामाकूल लोगों को छूना भी नर्क के दर्शन करने के बराबर है"...

"जी!...बिलकुल सही फरमा रहे हैँ आप"..

"तो इसका मतलब आपने अपने प्रयासों के जरिए अपने गुस्से पे काबू पा लिया?"...

"ऐसे-कैसे पा लिया?"..मेरा गुस्सा कोई रेत का भरा प्याला नहीं कि पल भर में ही ज़रा सी गर्मी पा कर आगबबूला हो उठूँ और ना ही मैँ नवरत्न तेल की ज़रा सी मसाज के बाद ठण्डा-ठण्डा...कूल-कूल हो जाता हूँ"..

"ओह!...

"पहली बात तो मुझे कभी गुस्सा चढता नहीं है और यदि चढ जाता है तो...फेर छेत्ती उतरदा कोणी"...

"तो फिर कैसे?"...

"फिर मैँने सोचा कि इस स्साले!...हरामखोर को सबक सिखाने के लिए ना चाहते हुए भी कोई ना कोई कठोर कदम तो ज़रूर ही उठाना पड़ेगा"...

"स्साले!...की बाईक में आग लगा देनी थी"...

"जी!...मेरे दिमाग भी पहले-पहल यही आईडिया आया था लेकिन बाहर बहता हुआ नाला देखकर मन मसोस कर रह गया कि पट्ठा उसी में अपनी बाईक धंसा के आग बुझा लेगा"...

"ओह!...

"फिर सोचा कि कुछ ना कुछ ऐसा करूँ कि ना रहे बाँस और ना बजे बाँसुरी"...

"तो फिर आपको उस स्साले की गड्डी तोड़ डालनी थी"...

"यही!...यही तो मेरे दिमाग में भी आ गया था कि आज इसकी बाईक का कचूमर निकाल के ही दम लूँगा"....

"गुड!...वैरी गुड..तो फिर क्या किया आपने?"...

"करना क्या था?...तुम तो जानते ही हो कि सैंत्रो की चाबी चौबीसों घंटे मेरी जेब में पड़ी रहती है"...

"जी"...

"तो बस सीधा अपनी सैंत्रो में चाबी लगाई और फिर अपने रैंप से फुल्ल-फ्लैज....बैक गियर में...उसे ये जाने दे...और वो जाने दे"...

"ओह!...बेचारा"...

"लेकिन.....

"लेकिन क्या?"...

"ऐन मौके पे पट्ठे ने बाईक हटा ली और उसकी जगह एक ट्रक आ के खड़ा हो गया"...

"ओह!...

"जी"...

"दिल आज कायर है...गम आज अपना है...उफ!...ये...सैंत्रो मेरी"…

गैरों के दुखों पे ओ रोने वालो ...कभी हो मेरे भी गम में शरीक"...

***राजीव तनेजा***

Rajiv Taneja

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हँगामा है क्यूँ बरपा?...इक पोस्ट ही तो लिखी थी

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***राजीव तनेजा***

आज गाँधी जयंति के अवसर पर छुट्टी थी तो बस ऐसे ही खाली बैठे-बैठे मैँ अपनी पुरानी पोस्टों पर पड़ी धूल को फांक रहा था..ऊप्स!...सॉरी...उन पर पड़ी धूल को हटा रहा था तो अचानक एक पुरानी पोस्ट पर नज़र पड़ते ही मैँ चौंक कर उछल पड़ा।24 अक्टूबर 2008 को अपने ब्लॉग हँसते रहो पर इस पोस्ट को मैँने एक कविता  "निबटने की तुझसे कितनी हम में खाज है" के रूप में पोस्ट किया था।जिसमें मैँने उत्तर भारतीयों के साथ मुम्बई में हो रहे सलूक को लेकर चिंतित हो अपनी व्यथा और भड़ास को जाहिर किया था।उसको लेकर ऐसा हँगामा मच जाएगा...मैँने कभी सोचा भी नहीं था।लोग आपस में लड़ने-भिड़ने से लेकर गाली-गलोच तक पे उतारू हो जाएँगे...इसकी मुझे कतई उम्मीद न थी।

दरअसल!...हुआ क्या है कि एक किन्हीं कुक्कू नाम की मोहतरमा का दिल उस पोस्ट पर आ गया और उन्होंने उसका लिंक ब्ळोग भारती नामक साईट पर "ऐन ओपन चैलेंज टू राज ठाकरे" के नाम से दे दिया।बस फिर क्या था जनाब...कुल 58 कमैंट प्रतिक्रियाएँ आ चुकी हैँ उस मुद्दे के पक्ष और विपक्ष में।उनमें से कुछ में ऐसी भाषा का प्रयोग किया गया है जिसका उल्लेख करना सभ्य ब्लॉगजगत में उचित नहीं।

अब इसे अपनी लेखनी की सफलता समझूँ या फिर विफलता?...कृप्या अपनी राय से अवश्य अवगत कराएँ


"निबटने की तुझसे कितनी हम में खाज है"

माना कि...
अपनों के बीच... अपने शहर में
चलती तेरी बड़ी ही धाक है
सही में...
विरोधियों के राज में भी तू. ..
गुंडो का सबसे बडा सरताज है ...
हाँ सच!...
तू तो अपने ठाकरे का ही 'राज' है...
सुना है!...
समूची मुम्बई पे चलता तेरा ही राज है
अरे!...
अपनी गली में तो कुता भी शेर होता है...
आ के देख मैदान ए जंग में...
देखें कौन. ..कहाँ... कैसे ढेर होता है
सुन!...
सही है...सलामत है...चूँकि मुम्बई में है...
आ यहाँ दिल्ली में...
बताएँ तुझे ...
निबटने की तुझसे कितनी हम में खाज है
हाँ! ...
निबटने की तुझसे कितनी हम में खाज है

***राजीव तनेजा***

 

 
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