तलाश मुझे है किसकी"

"तलाश मुझे है किसकी"

***राजीव तनेजा***

तलाश मुझे है किसकी
क्यूँ ये मैँ नहीं जानता
भूल जाऊँ कैसे उसे
दिल है नहीं मानता

एक झलक देखी जब से
अवचेतन मन बसी तब से
काश मिल जाए वो मुझे
सच जो चाहत है मेरी

भूल जा कहे गर खुदा भी
उडने दूं कैसे अपनी हँसी
पल-पल याद करता दिल
खोज लाउंगा ढूँढ लाउँगा
करूँगा हासिल

***राजीव तनेजा***

"बडा दिन"

"बडा दिन"

***राजीव तनेजा***

"बात पिछले साल की है....चार दिन थे अभी त्योहार आने में...

मैँ मोबाईल से दनादन 'एस.एम.एस'किए जा रहा था"

"क्रिसमस का त्योहार जो सिर पर था लेकिन ये 'एस.एम.एस' मैँ..

अपने खुदगर्ज़ दोस्तों को या फिर मतलबी रिश्तेदारों को नहीं कर रहा था"

"ये तो मैँ उन रेडियो वालों को भेज रहा था जो ....

गानों के बीच-बीच में अपनी टाँग अडाते हुए बार-बार ..

फलाने व ढीमके नम्बर पे 'एस.एम.एस' करने की गुजारिश कर रहे थे कि...

फलाने-फलाने नम्बर पे 'जैकपॉट'लिख के 'एस.एम.एस' करो तो...

'साँता'आपके घर-द्वार आ सकता है ढेर सारे ईनामात लेकर"







"सो!...मैने भी चाँस लेने की सोची कि यहाँ दिल वालों की दिल्ली में लॉटरी तो बैन है ही ...

तो चलो 'एस.एम.एस' ही सही"...

"क्या फर्क पडता है?"

"बात तो एक ही है"...

"एक साक्षात जुआ है तो दूसरा मुखौटा ओडे उसी के पद-चिन्हों पे खुलेआम चलता हुआ उसी का कोई भाई-भतीजा"

"साले!...यहाँ भी रिश्तेदारी निभाने लगे"


"सो!...अपुन भी किए जा रहे थे 'एस.एम.एस' पे 'एस.एम.एस'कि....

जब खुद ऊपरवाला आ के छप्पर फाड रहा है अपने तम्बू का और...

बम्बू समेत ही हमें ले चल रहा है शानदार-मालादार भविष्य की तरफ कि...


"लै पुत्तरर !..कर लै हुण मौजाँ ही मौज़ाँ"


"हो जाण गे हुण तेरे वारे-न्यारे"


"अब ये कोई ज़रूरी नहीं कि हमेशा तीर ही लगें निशाने पे"...

"तुक्के भी तो लग ही जाया करते हैँ निशाने पे कभी-कभार"...

"कोई हैरानी की बात नहीं है इसमें जो इस कदर कौतुहल भरा चौखटा लिए मेरी तरफ ताके चले जा रहे हैँ आप"


"क्या किस्मत के धनी सिर्फ आप ही हो सकते हैँ?"

"मैँ नहीं"...


"उसके घर देर है ...अन्धेर नहीं"...


"कुछ तो उसकी बे-आवाज़ लाठी से डरो"


"अब यूँ समझ लो कि अपुन को तो पूरा का पूरा सोलह ऑने यकीन ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास हो चला है कि...

अपनी बरसों से जंग खाई किस्मत का दरवाज़ा...

अब खुला कि....अब खुला"


"दिन में पच्चीस-पच्चीस दफा कलैंडर की तरफ ताकता कि अब कितने दिन बचे हैँ पच्चीस तारीख आने में"


"पच्चीस तारीख!...?"..


"अरे!...बुरबक्क...लगा दी ना टोक"


"हाँ!...पच्चीस तारीख"


"कितनी बार कहा है कि यूँ सुबह-सुबह किसी के शुभ काम में अढंगा मत लगाया करो लेकिन...

तुम्हें अक्ल आए तब ना"


"पच्चीस बार पहले ही बता चुका हूँ कि पच्चीस दिसम्बर को ही तो मनाया जाता है 'बडा दिन' दुनिया भर में"...


और आप हैँ कि हर बार इसे 'बडा खाना' समझ लार टपकाने लगते हैँ"


"पेटू इंसान कहीं के "...


"बडा खाना तो होता है फौज में लेकिन तुम क्या जानो ये फौज-वौज के बारे में"...

"कभी राईफल हाथ में पकड के भी देखी है या माउज़र चला के देखा है कभी?"


"छोडो!...अब ये तुम्हारे लडकियों की नाज़ुक कलाईयाँ को थामने को बेताब हाथ क्या राईफल-शाईफल पकडेंगे?"


"यू!..बेवाकूफ 'सिविलियन'..."


"इन मेनकाओं का मोह त्याग ...देश की फिक्र करो बन्धुवर...देश की"


"हाँ!..तो मैँ कह रहा था कि जैसे-जैसे पच्चीस तारीख नज़दीक आती जा रही थी...

मेरी 'एस.एम.एस'करने की स्पीड में भी तेज़ी से इज़ाफा होता जा रहा था"...


"कई हज़ार के तो मैँ रिचार्ज करवा चुका था अभी तक "


"पुराना चावल जो ठहरा"


"मालुम जो था कि जितने ज़्यादा 'एस.एम.एस'...उतना ही ज़्यादा चाँस जीतने का"


"सो!...भेजे जा रहा था धडाधड 'एस.एम.एस' पे 'एस.एम.एस'"



"अब तो मोबाईल में भी बैलैंस कम हो चला था लेकिन फिक्र किस कम्भखत को थी?"


"लेकिन सच कहूँ तो थोडी टैंशन तो थी ही कि सब यार-दोस्त तो पहले से ही बिदके पडे हैँ अपुन से "...

"फाईनैंस का इंतज़ाम कैसे होगा?".. .

"कहाँ से होगा?"

"ऐसे आडॆ वक्त पे अपने 'जीत बाबू'की याद आ गयी"


"बडे सज्जन टाईप के इंसान हैँ"...

"किसी को न नहीं कहा आज तक"

"भले ही कितनी भी तंगी चल रही हो लेकिन कोई उनके द्वार से खाली नहीं गया कभी"

"किसी पराए का दुख तक नहीं देखा जाता उनसे"

"नाज़ुक दिल के जो ठहरे"

"जो आया...जब आया...हमेशा सेवा को तत्पर"

"इतने दयालु कि कोई गारैंटी भी नहीं माँगते"

"बस तसल्ली के लिए घर,दुकान,प्लाट या गाडी-घोडे के कागज़ात भर रख लेते हैँ अपने पास "

"वैसे औरों से तो दस टका ब्याज लेते है मंथली का लेकिन...

अपुन जैसे पर्मानैंट कस्टमरज़ के लिए विशेष डिस्काउंट दे देते हैँ"


"बस बदले में उनके छोटे-मोटे काम करने पड जाते हैँ जैसे...

भैंसो को चारा डालना....

उनके 'टोमी' को सुबह-शाम गली-मोहल्ले में घुमा लाना"


"काम का काम हो जाता है और सैर की सैर"

"इसी बहाने अपुन का भी वॉक-शॉक हो जाता है"...

"वैसे इस बेफाल्तु से काम के लिए अपने पास अपने लिए भी टाईम कहाँ है?"


"ये तो बाबा रामदेव जी के सोनीपत वाले शिविर में उन्हें कहते सुना था कि...

सुबह-सुबह चलना सेहत के लिए फायदेमन्द है"


"फायदे की बात और वो मै ना मानूँ? ...

"ऐसा हरजाई नहीं"

"ऐसी गुस्ताखी करने की मैं सोच भी कैसे सकता था?"


"सो!..अपुन ने भी सोच-समझ के अँगूठा टिकाया और...

अपने जीत बाबू से पाँच ट्के ब्याज पे पैसा उठा धडाधड झोँक दिया इस 'एस.एम.एस' की आँधी में"


"अब दिल की धडकनें दिन प्रतिदिन तेज़ होने लगी ठीक कि ...

क्या होगा?...

"कैसे सँभाल पाउँगा इतनी दौलत को?"

"कभी देखा जो नहीं था ना ढेर सारा पैसा एक साथ"


"क्या-क्या खरीदूँगा?"...

"क्या-क्या करूँगा?"जैसे सैंकडो सवाल मन में उमड रहे थे"


"मैँ अकेली जान!..कैसे मैनेज करूँगा सब का सब?"


"हाँ!..अकेली ही कहना ठीक रहेगा"...

"बीवी को तो कब का छोड चुका था मैँ"


"वैसे!..अगर ईमानदारी से सच कहूँ तो उसी ने मुझे छोडा था"

"अब पछताती होगी "...

"उस बावली को मेरे सारे काम ही जो फाल्तू के लगते थे"..

"हमेशा पीछे पडी रहती थी के बचत करो...बचत करो"...

"कोई काम नहीं आया है और ना कोई आएगा"...

"काम आएगा तो सिर्फ गाँठ में बन्धा पैसा ही"

"दोस्त-यार...रिश्तेदार सब बेकार का...

फालतू का जमघट है"...


"बच के रहो इनसे"


"उस बावली को क्या पता कि ज़िन्दगी कैसे जिया करते हैँ"..

"उसे तो बस यही फिक्र पडी रहती हमेशा कि...

'फीस का इंतज़ाम हुआ बच्चों की?'...

'ये नैट कटवा क्यूँ नहीं देते?'...

'कार साफ करने वाला पैसे माँग रहा था'...

'गाडी की किश्त जमा करवा दी?'


"वो बोल-बोल के परेशान हुए रहती थी बे-फाल्तू में ही"

"शायद!...इसी चक्कर में दुबली भी बहुत हो गई थी"

"अरे!...अगर फीस नहीं भरी तो कौन सा आफत आ जाएगी?"...

"ज़्यादा से ज़्यादा क्या करेंगे?"...

"नाम ही काट देंगे ना?"

"तो काट दें साले!..."...

"कौन रोकता है?"...


"सरकारी स्कूल बगल में ही तो है"...

"एक तो फीस भी कम...

"ऊपर से पैदल का रास्ता"...

"बचत ही बचत"...


"उल्टा!..जो पैसे बच जाएंगे...

तो उनसे कार की किश्त भी टाईम पे भर दी जाएगी"

"वैरी सिम्पल"

"ये आना-जाना तो चलता ही रहता है"

"कभी इस स्कूल तो कभी उस स्कूल"


"कहती थी कि नैट कटवा दूँ"...

"हुँह!..बडी आई नैट कटवाने वाली"...

"इतनी जो फैन मेल बनाई है दो बरस में...

सब!..छू मंतर नहीं हो जाएगी?"


"गुरू!..यहाँ तो चढते सूरज को सलाम है"...

"दिखते रहोगे तो बिकते रहोगे"...

"दिखना बन्द तो समझो बिकना भी बन्द"

"बैठे रहो आराम से"


"फैनज़ का क्या है?"...

"आज हैँ...कल नहीं"...


"आज शाहरुख के कर रहे हैँ तो कल रितिक के पोस्टर रौशन करेंगे लडकियों के बैडरूम"


"टिकाऊ नहीं होती है ये प्रसिद्धी-वर्सिद्धी "...


"बडे जतन से संभाला जाता है इसे"


"अपने!..'कुमार गौरव'का हाल तो मालुम ही है ना?"


"वन फिल्म वण्डर"


"एक फिल्म से ही सर आँखों पे बिठा लिया था पब्लिक ने और...

अगले ही दिन दूजी फिल्म पे उसी दिवानी पब्लिक ने ज़मी पे भी ला पटका था"


"टाईम का कुछ पता नहीं"...

"आज अच्छा है"....

"कल का मालुम नहीं"....

"रहे...रहे"...

"ना रहे ...ना रहे"


"क्या यार!...यहाँ तो पहले ही टैंशन है इतना कि मोबाईल में बैलैंस बचा पडा है और...

दिन जो हैँ वो प्रतिदिन कम होते जा रहे हैँ"

"कैसे भेज पाउंगा सारे पैसे के 'एस.एम.एस'?"

"अब ये सब सोच-सोच के मैँ सोच में डूबा हुआ ही था कि घंटी बजी और लगा कि...

जैसे मेरे सभी सतरंगी सपनों के सच होने का वक्त आ गया"

"मेरे बारे में मालुमात किया उन्होंने ....

पूछने पे पता चला कि रेडियो वाले ही थे और मेरा नम्बर उन्होंने सलैक्ट कर लिया है बम्पर ईनाम के लिए "

"बाँछे खिल उठी मेरी"...

"इंतज़ार की घडियाँ खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी"


"प्यास के मारे हलक सूखा जा रहा था लेकिन पानी पीने का होश और फुरसत किसे थी?"


डर जो था कि कहीं 'साँता जी' गल्ती से ही किसी और के घर ना जा घुसें"...

"खास कर के बाजू वाले शर्मा जी के यहाँ"...

"साले!...दोगले किस्म के इंसान"..

"सामने कुछ और...पीठ पीछे कुछ"

"ऊपर-ऊपर से तो बेटा-बेटा करते रहते थे और अन्दर ही अन्दर मेरी ही बीवी पे नज़र रखते थे"


"बडा समझाते रहते थे मुझे दिन भर कि ...

"बेटा ऐसे नहीं करो...वैसे नहीं करो"

"अरे!...मेरा घर ...मेरी बीवी...

मेरी मरज़ी जो जी में आए करूँ"

"तुम होते कौन हो बीच में अडंगी लगाने वाले?"


"कहीं!...बीवी ही तो नहीं सिखा के गई उन्हें ये सब?"

"क्या पता!..पीठ पीछे क्या-क्या गुल खिलते रहे हैं यहाँ?"


"ये सब सोच-सोच के मैँ परेशान हो ही रहा था कि साँता जी आ पहुँचे"...

"उनका ओज से भरा चेहरा देख ही मेरे सभी दुख ....सभी चिंताएँ हवा हो गई"


"लम्बा तगडा कसरती बदन"...

"सुर्ख लाल दमकता चेहरा"...



"झक लाल कपडे"..

"उन्होंने बडे ही प्यार से सर पे हाथ फिराया"...

"मस्तक को प्यार से चूमा"

"चेहरा ओज से परिपूर्ण था "


"नज़रें मिली तो मैँ टकटकी लगाए एकटक देखता रह गया"

"आँखे चौंधिया सी रही थी"...

"सो!...ज़्यादा देर तक देख नहीं पाया मैँ"

"निद्रा के आगोश ने मुझे घेर लिया था"

"आँखे बन्द होने को थी"

"मुँह में आए शब्द मानो अपनी आवाज़ खो चुके थे"...

"चाह कर भी मैँ कुछ कह नहीं पा रहा था"

"शायद पवित्र आत्मा से मेरा पहला सामना था इसलिए"

"ऐसा ना मैंने पहले कभी देखा था और ना ही कभी इस बारे में कुछ सुना था"

"शायद!...आत्मा से परमात्मा का मिलन इसे ही कहते होंगे "


"ये आम इंसान से परम ज्ञानी बनने का सफर बहुत भा ही रहा था मुझे कि ...

उन्होंने पूछ लिया...

"बता वत्स !...क्या चाहिए तुझे?"

"बता!..क्या इच्चा है तेरी?"...


"मेरे कंठ से आवाज़ न निकली"

उन्होंने फिर प्रेम से पूछा"बता!...तेरी रज़ा क्या है?"

"चुप देख मुझे ...

उन्होंने खुद ही 'एयर कंडीशनर' की तरफ इशारा किया"

"मैंने मुण्डी हिला हामी भर दी"

"फिर टीवी की तरफ इशारा किया तो मैँने फिर मुण्डी हिला दी"

"उसके बाद तो फ्रिज...

'डीवीडी प्लेयर'...

'होम थियेटर'...

'हैण्डी कैम'...सबके लिए मैँ हाँ करता चला गया"


"वैसे होने को तो ये सारी की सारी चीज़े मेरे पास पहले से ही मौजूद थी लेकिन कोई भरोसा नहीं था इनका"

"बीवी के साथ कैसा जो चल रहा था कोर्ट में"

"क्या पता साली!...सब वापिस लिए बिना नहीं माने"

"इसलिए कैसे इनकार कर देता साँता जी को?"

"इतनी तो समझ है मुझे कि अच्छे मौके बार-बार नहीं मिला करते"

"सो!...हाथ आया दाव बिना चले कैसे रह जाता?"

"पहली बार तो मेरी किस्मत ने पलटी मारी थी और वो भी तब जब बीवी नहीं थी मेरे साथ"..

"शायद ऊपरवाले ने भी यही सोचा होगा कि इसके घर की लक्ष्मी तो हो गयी उडनछू....

तो क्यों न बाहर से ही कोटा पूरा कर दिया जाए इसका"

"नेक बन्दा है...कुछ ना कुछ बंदोबस्त तो करना ही पडेगा इसका"

"मैँ खुशी से पागल हुआ जा रहा था कि आवाज़ आई कि...

"वक्त के साथ-साथ मैँ भी बूढा हो चला हूँ"...

"इतना सामान कँधे पे उठा नहीं सकता और....

भला दिल्ली की सडकों पर बर्फ गाडी याने स्लेज का क्या काम?"

"इसलिए!...स्लेज छोड ट्रक ही ले आया हूँ मैँ"...




"वक्त के साथ-साथ खुद को भी बदलना पडता है...

"सो!...बदल लिया"साँता जी मुस्कुराते हुए बोले


"मैने भी झट से कह दिया कि आपक नाहक परेशान न हों...मैँ हूँ ना"

"उसी वक्त उनके साथ जा के सारा सामान ट्रक से अनलोड किया ही था कि इतने में नज़र लगाने को शर्मा जी आ पहुँचे"

बोले"ये क्या कर रहे हो?"...


"मैँ चुप रहा"..


"वो फिर बोल पडे"...

"मुझे गुस्सा तो बहुत आया लेकिन चुप रहा कि कौन मुँह लगे और अपना अच्छा-भला मूड खराब करे"


फिर बोल पडे"ये क्या कर रहे हो?"


"अब मुझसे रहा न गया"...

"आखिर बर्दाश्त की भी एक हद होती है"

"तंग आकर आखिर बोलना ही पडा कि...

"मेरा माल है"...

"मैँ जो चाहे करूँ"..

"आपको मतलंब?"


"शर्मा जी बेचारे तो मेरी डांट सुन के चुपचाप अपने रस्ते हो लिए"

"साँता जी के चेहरे पे अभी भी वही मोहिनी मुस्कान थी"

"उनकी सौम्य आवाज़ आई"अब मैँ चलता हूँ"....

"अगले साल फिर से मिलता हूँ"


"और वो पलक झपकते ही गायब हो चुके थे"

"मैँ खुशी से फूला नहीं समा रहा था कि अगले साल फिर से आने का वादा मिला है"...

"इस बार तो मिस हो गया लेकिन अगली बार नहीं"...

"अभी से ही लिस्ट तैयार कर लूंगा कि ये भी माँगना है और वो भी माँगना है"

"बार-बार सारे गिफ्टस की तरफ ही देखे जा रहा था मैँ"...

"नज़र हटाए नहीं हट रही थी कि पता ही नहीं चला कि कब आँख लग गयी"

"सपने में भी उस महान आत्मा के ही दर्शन होते रहे रात भर"

"जब आँख खुली तो देखा कि दोपहर हो चुकी थी"

"सर कुछ भारी-भारी सा था"

"उनींदी आँखो से सारे सामान पे नज़र दौडाई"..

"लेकिन!...ये क्या?"

"जो देखा...देख के गश खा गया मैँ"...

"सब कुछ बिखरा-बिखरा सा था"

"न कहीं टीवी नज़र आ रहा था और ना ही कहीं फ्रिज और होम थिएटर"

"हैण्डी कैम का कहीं अता-पता नहीं था"

"कायदे से तो हर चीज़ दुगनी-दुगनी होनी चाहिए थी पर यहाँ तो इकलौता पीस भी नदारद था"

"देखा तो तिजोरी खुली पडी थी"

"कैश....गहने-लत्ते...क्रैडिट कार्ड....

कुछ भी तो नहीं था"

"सब का सब माल गायब हो चुका था"

"मैंने बाहर जा के इधर-उधर नज़र दौडाई तो कहीं दूर तक कोई नज़र नहीं आया"


"कोई साला!..मेरे सारे माल पे हाथ साफ कर चुका था"

"मैँ ज़ोर-ज़ोर से धाड मार-मार रोने लगा"...

"भीड इकट्ठी हो चुकी थी "

"सबको अपना दुखडा बता ही रहा था कि शर्मा जी की आवाज़ आई...

"क्यों अपने साथ-साथ सबका दिमाग भी खराब कर रहे हो बेफिजूल में?"...

"रात को सारा सामान खुद ही तो लाद रहे थे ट्रक में और अब ड्रामा कर रहे हो चोरी का"

"मैने अपनी आँखो से देखा और आपसे पूछा भी तो था कि ये आप क्या कर रहे हैँ?"

"आपने ने तो उल्टा मुझे ही डपट दिया था कि मैँ अपना काम करूँ"

"रेडियो स्टेशन से पता किया तो मालुम हुआ कि ईनाम पाने वालों की लिस्ट में मेरा नाम ही नहीं था"

"अब लगने लगा था कि वो साला साँता फ्राड था एक नम्बर का "

"किसी तरीके से मेरा नम्बर पता लगा लिया होगा उसने"

"और शायद मुझे हिप्नोटाईज़ कर चूना लगा गया"

"अब तो यही के उम्मीद की किरण बाकि है कि शायद वो अपना वायदा निभाए और अगले साल वापिस आए"

"एक बार मिल तो जाए सही कम्भख्त,फिर बताता हूँ कि कैसे सम्मोहित किया जाता है"

"बस इसी आस में कि वो आएगा मैँ इस बार भी 'एस.एम.एस' किए जा रहा हूँ...किए जा रहा हूँ"

"जय हिन्द"

***राजीव तनेजा***

"ठण्डे-ठण्डे पानी से नहाना चाहिए"

"ठण्डे-ठण्डे पानी से नहाना चाहिए"

***राजीव तनेजा***


"क्या मियाँ!....?"...

"अब तो दिवाली को गुज़रे हुए भी कई घंटे हो गए"...

"अब तो ये आलस-शालस को मारो गोली और सीधा बाथरूम में जा घुसो"...

"बाल्टी,साबुन.तेल,शैम्पू सब याद कर रहे हैँ"

"बाजुएँ अकड गयी हैँ उनकी तुमसे मिले बिना"

"और तुम हो कि....कोई फिक्र ना फ़ाका"..


"याद है ना...

'शानू जी'के कवि सम्मेलन में जाना है?"और...

दो दिन बाद अपनी शायर फैमिली वाली'श्रधा जी'भी तो आ रही है सिंगापुर से"...


"उनसे भी तो मिलने जाना है पटपडगंज"

"आज ही तो पता और फोन नम्बर नोट कराया है उन्होंने"


"कहीं भूले तो नहीं बैठे हैँ जनाब?"

"कहा भी था कि अच्छी तरहा नक्शा-वक्शा बना लो दोनों पतों का"

"कहीं हम गली-गली भटकते फिरें और भूखे-प्यासे तब पहुँचे मँज़िल पे जब...

जूठे पत्तल चाटने के अलावा कोई और जुगाड ही न बचा हो"


"जल्दी से हो जाओ तैयार"...

"इंतज़ार हो रहा होगा हमारा वहाँ"...


"अब ये कोई ज़रूरी तो नहीं कि खुद ही फोन करें शानू जी और श्रधा जी कि....

"आ जाओ!...हम इंतज़ार कर रहे हैँ"


"इतने वी.आई.पी भी नहीं हम"


"सौ तरह के सौ-सौ काम होंगे उन्हें"


"हमारी तुम्हारी तरह वेली थोडी हैँ वो दोनों कि न्यौता आ जाए सही कहीं से और...

बस मुँह उठाएँ और चल दें "


"याद है ना पिछली बार जब चंबल से न्योता आया था अपुन को ?"...

"बडे मज़े से पहुँच गए थे अगली ही गाडी से लॉलीपॉप चूसते-चूसते"...


"ये तो वहाँ जा के पता चला था कि वो 'इनवीटेशन कार्ड'नहीं बल्कि...

फिरौती के लिए लिखा गया पत्र था जिसे हम न्योता समझ कूदे-कूदे फिर रहे थे"


"ये तो शुक्र है कि उसी दिन पुलिस ने धावा बोल मुठभेड में'लाखन सिंह'को मार गिराया था"...

"वर्ना हम तो कब के लग गए होते 'खुड्डल लाईन'"


"सब तुम्हारी बेवाकूफी का नतीज़ा था"...

"ना खुद खत ढंग से पढा और ना ही मुझे ठीक से पढने दिया"


"और नतीजे में!..याद है ना कैसे बीहडों में जाग-जाग काटी थी रात?"


"साले!...उन गीदडों ने भी तो हुआँ-हुआँ कर जीना हराम कर डाला था"


"हुह!...बडे आए कहने वाले तुम कि....

"पापा जी!..आप चिंता ना करें"...

"मैँ सब सम्भाल लूंगा"...


"कहीं उस दिन मेरी दौलत याने मेरी बीवी को ही संभालने की नहीं सोच रहे थे ना ?"


"ऐसा सोचने के बारे में सोचना भी मत"...


"इसलिए नहीं कि पराई नॉर पे नज़र डालना पाप है...गुनाह है "

"बल्कि इसलिए कि ऐसी सोच सोच के भी तुम पछताओगे"


"उफ!...किस मनहूस की याद दिला दी?"

"रोयाँ-रोयाँ तक काँप उठता है आज भी जब माथे पे हाथ फेरता हूँ"


"देख रहे हो ना?"


"अभी भी सूजन नहीं गई है उस दिन वाले बेलन की मार की"


"पट्ठी का निशाना ही इतना पक्का है कि बस पूछो मत"...

"सौ गज़ के फासले से भी अचूक वार करती है"...

"बचपन में मारन पिट्टी जो खेला करती थी"


"वैसे एक बात समझ नहीं आ रही कि मैँ ये सब राज़ की बातें मैँ तुमसे क्यों करता जा रहा हूँ?"

"खैर छोडो इन बेफिजूल की बातों को"...

"कुछ नहीं धरा इनमें"


"हाँ!...तो मैँ कह रहा था कि....

बेचारी शानू जी तो काम के बोझ से अधमरी हुई जा रही होंगी और श्रधा जी सफर की थकान के मारे चूर"


"शानू जी ही तो सब इंतज़ामात कर रही हैँ कवि सम्मेलन का"


"अपनी श्रधा जी भी कौन सी कम हैँ?"

"पूरा फोरम और ब्लॉग संभाल रही हैँ अपने दम पे"


"बहुत टैंशन हो जाती होगी इन दोनों को तो"...


"पता नहीं कैसे मैनेज कर लेती होंगी ये सब ?"...

'बिज़िनस'संभालना...

'घर-परिवार'देखना...

'कविता' लिखना....

'शायरी' झाडना....

'ब्लॉग' अप टू डेट रखना...

'दूसरों के चिट्ठों पे टिपियाना वगैरा...वगैरा. .."


"और अपुन?"...

"अपुन ठहरे रमते जोगी"...


"अपना क्या है...

"ऐन टाईम पे जाना है"...

"चाय-नाश्ता पाडना है"

"दो-चार बार जहाँ सबने ताली बजाई....

सो!...हमने भी बजा देनी है "


"थोडी बहुत वाह-वाह भी कर देंगे अपने गुरुदेव 'समीर लाल जी'के लिए...

"वो भी तो आ रहे हैँ ना कनेडा से"


"सो!...तैयार हो जाओ फटाफट"


"कोई ज़रूरी नहीं कि पिछली होली और दिवाली की तरह इस बार भी तुम्हें ज़बर्दस्ती ही नहलाया जाए"


"अबकि बार तो आपको एक्दम से गोरा-चिट्टा बना के ही दम लेना है"...

"बॉय गॉड...कसम से"...

"अपनी श्रधा जी जो आ रही हैँ"


"उफ!...क्या गज़ब के क्यूट और हैंडसम लगोगे"


"पता है ना!....पिछली बार जो हैदराबाद वाली ऑंटी ताना मारा था कि...

खुद तो इतना बन-संवर के रहते हो और अपने दोस्त का कोई ख्याल नहीं"



"तो बन्धु मेरे..इस बार किसी को कोई शिकायत का मौका नहीं"

"अब ये उनींदी आँखो से नींद का पर्दा हटाओ और चौखटे पे पानी के छींटे मारते हुए सीधे जा घुसो नहाने को"...


"क्या कहा?"

"नींद आ रही है?"

"वाह रे!..मेरे कुम्भकरण...वाह"


"रामलीला कब की खत्म हो गयी और अब भी कुम्भकरण के पात्र को ही जिए चले जा रहे हो?"


"वाह!..."...


"ये तुम राजेश खन्ना कब से बन गए कि चाहे दस बरस पहले से ही बुढाए पडे हो लेकिन. ..

रोल 'हीरो'का ही करना है उस्ताद ने"


"रजनीकाँत समझ रखा है क्या खुद को ?"

"अरे!...झंडू का च्यवनप्राश खाता है वो दिन में तीन-तीन दफा और तुम हो कि...

पैग पे पैग चढाए रहते हो हरदम"


"पता भी है कि दारू पीने से 'लीवर'खराब होता है लेकिन अब इस बुड्ढे 'काका'को समझाए कौन?"

"डिम्पल जी की बात तो सुनते ही कहाँ हैँ?"


"उफ!...किसका नाम ले लिया?"

"लुट गया ना सब सुख चैन मेरा?"

"याद दिला ना'बॉबी'की?"...

"अब रातें करवटें बदल-बदल ही काटनी पडा करेंगी"


"अपनी 'बॉबी डार्लिंग'उर्फ श्रीमति मायके जो गयी हुई है"


"रात काटने से याद आया कि मियाँ!...कब तक यूँ कुँभकरण की नींद उँघाते रहोगे?"

"डाक्टर ने नहीं कहा था कि रामलीला में कुंभकरण का रोल करो?"...

"कोई और रोल नहीं था क्या करने को?"

"ह्म्म!...तो यहाँ भी तुम्हारे आलस ने ही ज़ोर मारा होगा कि...

'सोने'को खूब मिलेगा और नाम का नाम होगा"...


"खाक!..सोना मिलेगा"....

"दिहाडी तो पूरी दी नहीं गयी इन मुय्ये रामलीला वालों से"...


"हुँह!...बडे आए सोना देने वाले"..

"एक पीतल का पानी चढी गद्दा थमाई...

वो भी 'डिब्ब-खडिब्बी' कि..

"ले बेटा!...चढ जा स्टेज पे"...

"छुडा दे छक्के"...

"मार ले मैदान"


"तुमने भी सोचा होगा कि चलो इसे ही बेच कुछ दाम वसूल लूगा"

"पर वो भी तो पट्ठों ने वापिस छीन ली और उल्टा पुलिस में जाने की धमकी देने लगे सो अलग"...


"और ले लो वडेंवे!..."...


"वाह!..रे मेरे बंटुक नाथ"...

"वाह"...

"बडे आए थे कहने वाले कि अब होंगे आम के आम और गुठलियों के भी पूरे-पूरे दाम"


"दिखा दी न तुमने अपनी बनिया बुद्धी"...

"हर चीज़ में फायदा ढूंढते हो"...


"अब!...ये जो दो-दो महीने नहीं नहाते हो"...

"तो!...इसमें भी कोई न कोई फायदा ही ढूँढते होंगे महाशय...?"


"है ना!...?"


"हाय!...अब क्या करूँ तुम्हारी इस मूढ बुद्धी का?"अब कह रहे हो कि....

'साबुन'बचता है...

'तेल' बचता है...

'तौलिया-कंघी'कम घिसते हैँ"



"और!..ये जो दो-दो महीने की मैल को जब चाकू से खुरच-खुरच के उतारते हो ?"

"वो सब क्या होता है?"


"याद है ना पिछली बार का?"...

"जब धार कुंद पड गयी थी चाकू की तो बीच में ही पिताश्री से 'ब्लेड'माँग काम चलाना पडा था किसी तरह"..

"और ऊपर से कँजूसों के महा कँजूस तुम्हारे पिताजी"...

"थमा दिया उन्होंने दो साल से पडा-पडा जंग खा रहा ब्लेड"...

"वो भी पूरा नहीं...आधा ही थमाया था कि बचा हुआ आधा वक्त-बेवक्त काम आएगा"

"बचत में कैसी शर्म?"


"अगर 'सैप्टिक-शैप्टिक'हो जाता तो उनकी बला से?"..


"फिर पता चलता बच्चू को"

"ट्ट्टू पता चलता तुम्हारे पिताश्री को?"

"उन्होंने तो उसी घसियारे 'डाक्टर'के बच्चे से ही ठुकवा देने थे 'इंजैक्शन'धडाधड"


"हाँ!..ठुकवाने ही तो थे"..

"कौन सा डिग्रीधारी था वो डाक्टर ?"...

"पट्ठा!..पंचर जो लगाया करता था पहले"...

"पुरानी आदतें इतनी जल्दी कहाँ पीछा छोडती हैँ?"

"पहले 'टायर'से कील निकाला करता था अब अब बदन में कील घुसेडा करता है"..

"खैर छोडो...क्या रखा है टाईम खोटी करने में?"

"ये आलस का पुलिंदा छोडो और उठ के नहा लो फॅटाक से फटाफट "...


"नहीं तो!...पता है ना मेरा?"


"क्या कहा?"...

"नहीं पता?"


"तो!..तुम ऐसे नहीं मानोगे?"

"लगता है!..'थर्ड डिग्री'ही अपनानी पडेगी?"


"थर्ड डिग्री से याद आया कि स्कूल तो 'थर्ड' में ही छोड दिया था मैंने"..


"बस!..तभी तो पड गया था दो नम्बर के धन्धे में"...

"फिर आना-जाना तो लगा ही रहा ताउम्र"...

"कभी अपने देश में तो कभी परदेस में"...


"अब अपने देश वालों में इतना दम कहाँ कि वो अपने पर थर्ड डिग्री अपना सकें?..

"ये तो वो साले फिरंगी पुलिस वाले ही नहीं समझते किसी को कुछ"...

"ज़रा सी!..बस ज़रा सी 'चूं-चपड'करुं सही...

उन्हें तो बस मौका भर चाहिए हाथ साफ करने का"...


"साले!...बन्दे को बन्दा नहीं समझते हैँ"...

"पता नहीं मेरे चौखटे में ऐसे कौन से सुरखाब के पर लगे हैँ जो देखते ही...

अपने-अपने लट्ठों को तेल पिलाना चालू कर देते हैँ"


"अब कुछ ना पूछो कि कैसे बचते बचाते जुगाड-पानी से दे-दिला कर...

उनका 'तौलिया'गायब करवाया है खास तुम्हारे लिए"


"देख लिया ना?"

"आखिर दोस्त ही दोस्त के काम आता है!...दुशमन नहीं"


"अब तुम्हारे इस चक्कर में मेरी हालत का मुझे ही पता है कि क्या-क्या हुआ मेरे साथ"...

"आह!...पराया तन क्या जाने मेरी पीड"

"बडी मुशकिल से उसे 'हिन्दोस्तानी' ज़बान सिखाई है"...

"अब तो बेटे लाल!...इशारे पे नाचता है...इशारे पे"..


"तौलिया?"...

"नाचता है?"...

"इशारे पे?"दोस्त एक झटके से कई सवालों को चेहरे पे लिए उठ खडा हुआ


"हाँ!...मेरे प्यारे 'बंटुक नाथ'..

"इशारे पे"...


"और आज इसी के दम पे ठान लिया है कि...

चाहे लाख तूफाँ आएँ...

चाहे जान भी अब तेरी चली जाए...

तुझे नहला के ही लेंगे हम दम...

ऐ सनम"...


"क्या कहा?"...

"ज़रा फिर से तो कहना"


"अच्छा!...नहीं नहाओगे?"...


"देखो!..हर फैसला यूँ जल्दबाज़ी में लेना ठीक नहीं"...

"अच्छी तरह सोच-विचार लो"


"फिर वो ही बात?"...

कह रहे हो कि....

"हमको नहला सके ...ये ज़माने में दम नहीं...

हमसे है ज़माना...ज़माने से हम नहीं"


"कोई माई का लाल पैदा नहीं हुआ तुम्हें नहला सकने वाला?"


"ठीक है!...आज ही और अभी ही फैसला हो जाए फिर तो"...


"कल किसने देखा है?"...

"क्या मालुम कल को तुम ही...हो न हो"


"देखो!...दोस्त हो तुम मेरे,इसीलिए कह रहा हूँ फिर से"...

"मेरी बात मान लो और अच्छे बच्चों की तरह जा के चुपचाप से नहा लो"



"मालुम था मुझे!..."...

"हाँ!...मालुम था मुझे"


"तो फिर!...नहीं मानोगे तुम?"


"अच्छा!...एक बार....

बस एक बार...नज़र भर देख तो लो 'तौलिए'को"


"फिर ये न कहना कि मौका नहीं दिया 'राजीव'ने बचाव का"


"बच्चू!...किस फिराक में हो तुम?"

"भागने का मौका तक ना मिलेगा"...

"किस हवा में उडे-उडे फिर रहे हो तुम?"कि...

मैँ ये कर दूंगा...

मैँ वो कर दूंगा"


"बेटे लाल!...देसी नहीं...

खालिस सोलह ऑने शुद्ध विलायती तौलिया है...खालिस विलायती"

"बडों-बडों को तिगनी का नाच नचा दे ये तो"...

"तुम किस खेत की गाजर-मूली हो?"...


"ये क्या?...तुमने तो लपेटना चालू कर दिया?"

"अरे!...फैंक नहीं रहा हूँ मैँ..जो तुम लपेटे चले जा रहे हो"


"पता चल जाएगा कुछ ही पल में कि मैँ सच्ची बात कर रहा हूँ कि झूठी"...

"हाथ कँगन को आरसी क्या...पढे लिखे को फारसी क्या"

"खुद ही देख लो और भली भांति जाँच लो"...


"ठण्डे-ठण्डे पानी से नहाना चाहिए...

ओ पुत्रा!..लिखना आए या ना आए...लिखना चाहिए"...


"अब ये!...लिखना-लिखाना तो तुम्हारे बस का है नहीं"


"तो!...क्या कहते हो?"...

"कर आऊँ गीज़र ऑन?"


"नहाना तो तुम्हें है ही"..

"दो मिनट पहले सही...दो मिनट बाद में सही"

"कहीं यही बहाना न मिल जाए बाद में तुम्हें कहीं कि...

"ठण्ड लग रही है"..

"अगली दिवाले पे नहा लूंगा"...

"पक्का!...'गॉड प्रामिस'


***राजीव तनेजा***











"मेरी कहानी नवभारत टाईम्स पर"

"मेरी कहानी नवभारत टाईम्स पर"

22.10.2007 को नवभारत टाईम्स में मेरी कहानी छपी है "बताएँ तुम्हे बच्चा कैसे होता है" के नाम से

www.navabharattimes.com -पाठकपन्ना-कहानियाँ - बताएँ तुम्हें बच्चा कैसे होता है
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/2480094.cms




जिसे एक ब्लॉगर बन्धु श्री पवन कुमार मल्ल जी ने जस का तस कॉपी-पेस्ट कर डाला है अपने ब्लॉग पे ...
http://pawankumarmall.blogspot.com/
उनका मैँ अत्यंत आभारी हूँ कि उन्होने कहानी के साथ मेरा नाम नहीं लिखा..जिसके लिए मैंने उन्हें कमैंट भी किया और उन्होंने इसके लिए सॉरी भी कहा ...




लेकिन अभी भी वहाँ से मेरा नाम नदारद है ...


चलो इसी बहाने एक पोस्ट और लिखने का मौका मिला और मेरी कहानी एक बार फिर से आप सभी ब्लॉगर बन्धुओं के सामने पेश है


बताएं तुझे कैसे होता है बच्चा...


बड़े दिन हो गए थे। खाली बैठे बैठे , कोई काम-धाम तो था नहीं, बस कभी-कभार कंप्यूटर खोला और थोडी-बहुत ' चैट-वैट ' ही कर ली। सच पूछो तो यार बेरोज़गार था मैं और इसमें अपनी सरकार का कोई दोष नहीं , दरअसल अपनी पूरी जेनरेशन ही ऐसी है। अब कोई छोटी-मोटी नोकरी तो हम करने से रहे। अब यार हर किसी ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे को घड़ी-घड़ी कौन सलाम बजाता फिरे ? कोई छोटा- मोटा धंधा करना तो अपने बस की बात नहीं। बाप-दादा जो थोडी-बहुत पूंजी छोड गए थे , वो भी आहिस्ता-आहिस्ता खत्म होने को आ रही थी। आखिर वह भी भला कब तक साथ देती ? बीवी के तानों का तो शुरू से ही मुझ पर कोई असर होता नहीं था। उसकी हर बात को मैं एक कान से सुनता और दूसरे से बाहर निकाल देता। कई बार तो कान में घुसने तक ही ना देता।
पहले नकदी खत्म हुई फिर , गहने-लत्तों का नंबर भी आ गया। एक-एक करके चीज़ें खत्म होती जा रही थीं लेकिन मेरी अकड़ ढीली होने का नाम ही नहीं ले रही थी। एक दिन मज़े से टीवी पर ' नो-एंट्री ' फिल्म देखते-देखते अचानक खुशी के मारे उछल पडा। इसलिए नहीं कि फिल्म अच्छी थी बल्कि...अपुन के भेजे मे आइडिया आ गया था नोट कमाने का। अरे नोट कमाने का क्या, वह तो नोट छापने का आइडिया था। जैसे ही बीवी को बताया कि एक आइडिया मिला है नोट छापने का तो वह गश खा कर गिरी और वहीं बेहोश हो गई।

होश मे आने के बाद बोली, " बस जेल जाने की कसर ही बाकी रह गई थी .... नोट छाप कर वह भी पूरी करने का इरादा है जनाब का? "
मेरी हंसी रोके ना रुकी। बोला, " अरी भागवान , नोट छापने का असली मतलब सचमुच में नोट छापना नहीं है। "
" तो फिर ?"
" देखा नहीं, फिल्म में उस ज्योतिषी को ?.... कितनी सफाई से सलमान से पैसे ऐंठ लेता है और अनिल कपूर बेवकूफ बनाता है। "
" तो क्या हुआ ?"
" अपुन का भी बस यही आइडिया है। "
" तुम्हारे पूरे खानदान में भी कोई ज्योतिषी हुआ है जो तुम बनोगे ?"
" है तो नहीं लेकिन हमारी आनेवाली नस्ल ज़रूर राज ज्योतिषी कहलाएगी। "
" पर ये सब करोगे कैसे ?"
" अरे कुछ खास नहीं, बस थोड़ा-बहुत त्याग तो मुझे करना ही होगा। "
" वह भला कैसे ?"
अरे ये हीरो-कट बाल छोड़ सीधे-सीधे लम्बे बाल रखूंगा। "
" उसमें तो नाई का खर्चा भी बचेगा, " बीवी चहक उठी ।
" कर दी ना तुमने दो कौड़ी वाली बात .... अरे मैं लाखों में खेलने की सोच रहा हूं और तुम इन छोटी-छोटी बातों पर नज़र गड़ाए बैठी हो। "
" लेकिन आता-जाता तो कुछ है नहीं, खाली वेष बदलने से क्या होगा ?" बीवी फिर बोल पड़ी।
" अरे यार, पहले पूरी प्लानिंग तो सुन ले। "
" जी बताऒ, " बीवी आतुर नज़रों से मेरी तरफ ताकते हुए बोली।
" हां, तो मैं त्याग करने की बात कह रहा था। तो दूसरा त्याग यह करना पडेगा कि....ये गोविंदा-छाप कपड़े छोड़ धोती-कुरता पहनना पड़ेगा। "
" वह तो शादी का पड़ा-पड़ा अभी तक सड़ रहा है अलमारी में, " बीवी चहकते हुए फिर बोल पड़ी।
" चलो, यह काम तो आसान हुआ. अब कोने वाले कबाड़ी की दुकान से रद्दी छांटनी पड़ेगी। "
" आय-हाय। अब क्या रद्दी भी बेचोगे ?"
" जब पता नहीं होता , तो बीच में चोंच मत लड़ाया कर, " मैं आँखे तरेरता हुआ बोला, " बेवकूफ, पुराने अखबारों में जो भविष्यफल आता है, उसकी कतरनों को सम्भालकर रखूंगा, वक्त-बेवक्त काम आएंगी और अगर एस्ट्रॉलजी से रिलेटेड कोई किताब मिल गई तो... पौ-बारह समझो। "
" पौ-बारह मतलब ?"
" अरे बेवकूफ, पौ-बारह मतलब लॉटरी लग गई समझो। "
" लेकिन यह जन्तर-मन्तर कहां से सीखोगे भला ?"
" कोई खास मुश्किल नहीं है यह सब भी , बस...बल्ली सागू या फिर बाबा सहगल के किसी भी रैप सॉन्ग को कुछ इस अन्दाज़ से तेज़ी से होंठो ही होंठो मे बुदबुदाना होगा कि किसी के पल्ले कुछ ना पडे। बस हो गया.... ' जन्तर-मन्तर काली कलन्तर... "
" ऒह समझ गई.... समझ गई। "

बस फिर क्या था मोटी कमाई के चक्कर में बीवी के बटुए का मुंह खुल चुका था। ज़रूरी सामान इकट्ठा करने के बहाने पैसे ले मैं चल पड़ा बाज़ार। पहले ठेके से दारू की बोतल खरीदी और फिर जा पहुंचा बाज़ू वाले कबाड़ी की दुकान पर। एक-दो पेग मरवाए उसे और अपने मतलब की रद्दी छांट लाया।
अब दिन-रात एक करके हम मियां-बीवी उन कतरनो का एक-एक अक्षर चाट गए और इस नतीजे पर पहुंचे कि " पूरी दुनिया में इससे आसान काम तो कोई हो ही नहीं सकता। " अब आप पूछोगे कि , " वो भला कैसे ?"
तो ये मैं आपको क्यों बताऊं ? और अपने पैर पर ख़ुद ही कुलहाड़ी मार लूं ? कहीं मुझसे ही कॉम्पिटीशन करने का इरादा तो नहीं है आपका ?
क्या कहा ?.... चिंता ना करूँ ?
तो सुन लीजिए...कुछ ख़ास मुश्किल नहीं है यह सब.... बस सिम्पल-सी कुछ बातें गांठ बांध लो कि... " हर बंदा अपने को अच्छा और बाक़ी सबको बुरा समझता है। "
हर-एक को यही लगता है कि वह सही है और बाक़ी सब ग़लत, कोई उसे सही ढंग से समझ ही नहीं पाया आज तक, वह अपनी तरफ़ से कड़ी मेहनत करता है लेकिन उसका पूरा फल नहीं मिलता, सबके सब उसकी कामयाबी से जलते हैं, कोई उसका भला नहीं चाहता ... दोस्त-यार ... रिश्तेदार .. भाई-बहन ... पड़ोसी ... सब के सब मतलबी हैं ... कोई उसकी ख़ुशी से ख़ुश नहीं हैं...वह सब पर तरस ख़ाता है, लेकिन कोई उस पर नहीं खाता ... किसी ने उस पर कोई जादू-टोना किया हुआ है ... या फ़िर उसकी दुकान या मकान बांध दिया है...
बस कुछ सामने वाले का चौख़टा देख कर अंदाज़ा लगाओ कि उस पर कौन-कौन से डायलॉग फ़िट बैठेंगे। बस चौखटा देखो और मार दो हथौड़ा। अगर तीर सही निशाने पर लगा तो समझो कि अपनी तो निकल पड़ी।
" और अगर निशाना ग़लत लगा तो ?"
फिकर नॉट... घुमा-फिरा कर 2-4 डायलॉग और मार दो बस... " कोई ना कोई तो अटकेगा ज़रूर। और हाँ... अगर ऊं चे लेवल का गेम खेलना है, तो दो-चार चेले-चपाटे भी साथ रख लो, एकाध चेली हो तो कहना ही क्या। अगर कोई ना मिले तो चौक से ही दिहाड़ी पर पकड़ लाओ।
बड़े बे-रोज़गार हैं , कोई ना कोई अपने मतलब का मिल ही जाएगा पर इतना ज़रूर ध्यान रखना कि....चेला रखना है गुरु नहीं ... । कहीं अगले दिन ही वह तुम्हारे सामने तेल की शीशी और चटाई लिए बैठा तुम्हारा ही बंटाधार करता न मिला। चौक पर बिकने वाला तोता अगर मिल जाए, तो धंधे में और रौनक आ जाएगी।
बस तोते को भूखा रखना है और... भविष्य की पर्चियों पर अनाज का दाना चिपका देना है। पंछी बेचारा तो भूख के मारे अनाज के दाने वाली पर्ची उठाएगा और बकरा बेचारा बस यही समझेगा कि मिट्ठू महाराज ने उसका नसीब बांच दिया है।
" और उस पर्ची के अंदर लिखा क्या होगा ?" बीवी बोल पड़ी।
" हे भागवान, पूरी रामायण खत्म होने को आई और यह पूछ रही है कि ... सीता , राम की कौन थी ?"
" अरी भागवान, अभी ऊपर सारे मंतर तो बताता आया हूँ...कोई ना कोई तो फ़िट बैठेगा ज़रूर।"
" हुं! " बीवी की समझ मैं बात आ चुकी थी।

सो एक दिन ऊपरवाले का नाम लिया और जा पहुंचा बीच बाज़ार और बरगद के पेड़ के नीचे डेरा जमाया। " कोई न कोई कोई असामी रोज़ टकराने लगी। किसी को कुछ , तो किसी को कुछ इलाज बताता उसकी हर तक़लीफ़ या बीमारी का। एक से तो मैने एक ही झटके में पूरे बारह हज़ार ठग डाले थे। बड़ी आई थी मज़े से कि " महाराज बच्चा नहीं होता है , कोई उपाय बताओ। "
मैंने सोचा, अरे नहीं होता है तो कुछ ' ओवर-टाइम ' लगाओ , ' माल-शाल खाओ और अगर फिर भी बात नहीं बने तो किसी डॉक्टर-शॉक्टर के पास जाओ। यह क्या कि सीधे मुंह उठाया और ज्योतिषी के पास चली आई। अब यार, अपने घर की ड्यूटी तो बजाई नहीं जाती अपुन से, ओवरटाइम कौन कंबख्त करता फिरे ? लेकिन धंधा तो धंधा है सो , उस बेचारी को कुछ उलटी-पुलटी चीज़ें बताई लाने के लिए जैसे ' काली शेरनी का दूध... जंगली भैंसे का सींग ... शुतुर्मुर्ग का कलेजा और न जाने क्या-क्या...
मुंह उतर आया उस बेचारी का कि मैं अबला नारी... " कहाँ से लाऊंगी ये सब ?"
मैंने कहा, " आप चिंता ना करें। परसों मेरा शागिर्द नेपाल से आनेवाला है, उसको फ़ोन किए देता हूँ , वही सब इंतज़ाम कर देगा। " उसने हामी भर दी।
और चारा भी क्या था उसके पास ?
नकद गिन के पूरे बारह हज़ार धरवा लिए मैने। फिर जाने दिया उसे।
मोटी-कमाई हो चुकी थी, सो मैने अपना झुल्ली बिस्तरा संभाला और चल पड़ा घर की ओर।
रास्ते में विलायती की पेटी ले जाना नहीं भूला।

ख़ुश बहुत था मैं, बस पीता गया, पीता गया। कुछ होश नहीं कि कितनी पी और कितनी नहीं पी। होश आया तो बीवी ने बताया , " पूरे तीन दिन तक टुल्ली थे आप। ख़ूब उठाने की कोशिश की लेकिन कोई फ़ायदा नहीं। "
" तो क्या पूरे तीन दिन दुकान बन्द रही ?"
" और नहीं तो क्या ?"
मैं झट से खड़ा हुआ और भाग लिया सीधा दुकान की ओर। पूरे रास्ते यही सोचे जा रहा था कि तीन दिन में पता नहीं कितने का नुक़सान हो गया होगा ?
कई बार तो पता नहीं कैसे मेरा तुक्का सही लगने लगा था और किसी-किसी को थोड़ा-बहुत फ़ायदा भी होने लगा लेकिन 8-10 बार शिकायत भी आई कि " महाराज आपकी तरकीब तो काम न आई, कोई और जुगाड बताओ। " ऐसे बकरों का तो मुझे बेसब्री से इंतज़ार रहता था। एक ही पार्टी को 2-2 दफा शैंटी-फ्लैट करने का मज़ा ही कुछ और है। उसके द्वारा किए गये इलाज में कोई न कोई कमी ज़रूर निकलता और नये सिरे से बकरा हलाल होने को तैयार। पुरानी कहावत भी तो है कि " खरबूजा चाहे छुरी पर गिरे या फ़िर छुरी खरबूजे पर , कटना तो खरबूजे को ही पड़ता है।

अपुन का कॉन्फिडेंस ' टॉप-ओ-टॉप बढता ही जा रहा था कि एक दिन एक ' जाट-मोलढ ' टकरा गया ....
पूरी कहानी सुनने के बाद मैंने उससे , उसकी परेशानी का इलाज बताने के नाम पर 2 हज़ार माँग लिए। जाट सौदेबाज़ी पर उतर आया। आख़िर में सौदा 450 रुपये में पटा। उसने धोती ढीली करते हुए जो नोट निकाले, तो मेरी आंखें फटी की फटी रह गईं। नज़र धोती में बंधी नोटों की गड्डी पर जा अटकी, लेकिन अब क्या फ़ायदा, जब चिड़िया चुग गयी खेत। मैं तो यही सोचे बैठा था कि बेचारा ग़रीब मानुस है, इसे तो कम से कम बख्श ही दूं। आख़िर ऊपर जाने के बाद वहां भी तो हिसाब देना पड़ेगा। लेकिन यह बांगड़ू तो मोटी आसामी निकला। यहीं तो मार खा गया इंडिया।

साढ़े चार सौ जेब के हवाले करते हुए मुंह से बस यही निकला, " ताऊ काम तो करवा रहे हो पूरे ढाई-हज़ार का और नोट दिखा रहे हो टट्टू ।"
" बेटा टट्टू तो तुमने अभी देखा ही कहाँ है ?"
" वो तो अब मैं तुम्हें दिखाऊंगा, " कहते हुए उसने किसी को इशारा किया और तुरंत ही मेरे चारों तरफ़ पुलिस ही पुलिस थी। " साले! पब्लिक का फुद्दू खींचता है। अब बताएंगे तुझे...चल थाने। बड़ी शिकायतें मिली हैं तेरे खिलाफ़। साले! वो S.H.O साहेब की मैडम थीं, जिससे तूने बारह हज़ार ठगे थे । चल अब हम तुझे बताते हैं कि बच्चा कैसे होता है।
राजीव तनेजा

"मंगल-कामना"


"मंगल-कामना"

***राजीव तनेजा***

"दिपावली की शुभ मंगल-कामनाएँ आप सभी को....

"ऊप्स!...सॉरी...

'मंगल' सिर्फ लड्कियों के लिए और....

'कामना' सिर्फ लडकों के लिए"


"बिकाझ उल्टी गंगा इझ नॉट अलाउड हीयर इन मॉय ब्लॉग"


"हिन्दी हैँ हम...वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा"


"समझा करो यार"...

"वैसे भी उलटे बाँस बरेली कहाँ जाता है आजकल?"

"देसी है हम...विलायती नहीं"...


"सुनो लडकियो!...पते की बात"..

"फिर न कहना कि मौका नहीं दिया और कर डाला झट से एक दो तीन"


"बेशक!...खुशी से सारे के सारे 'मंगल' तुम ले लो"...

"जी भर ले लो"...

"झोली भर-भर ले लो"...


"आखिर!..भाई है हमारा"...

"तुम्हारे काम नहीं आएगा तो फिर क्या 'ताडका' के काम आएगा?"


"याद है ना?...कि ताडका'के लिए तो अपने'लक्षमण जी'भी नकार दिए थे"

"लेकिन!..मजाल है जो ये अपना'मँगल'ज़रा सी भी चूँ-चपड कर जाए"...

"बखिया न उधेड डालेंगे पट्ठे की?"



"देख लेना!...उफ तक नहीं करेगा"...

"बहुत दम है पट्ठे में"

"आखिर बचपन का पिया 'बौर्नवीटा-शौर्नवीटा' किस दिन काम आएगा?"


"लेकिन हाँ!...एक बात कान खोल के सुन लें आप भी कि...

इन 'कामनाओ' की तरफ भूले से भी भूलकर नहीं ताकना है आपने"...

"वर्ना!..."...

"समझदार को इशारा कॉफी"...


"गुड!....

पल्ले पड गई आपके भेजे में भेजी हुई बात"...


"अच्छा है...

नहीं तो!...वहीं के वहीं कर डालते शैंटी फ्लैट क्योंकि...

ये 'मेनकाएँ'...ये 'कामनाएँ'हमारी है"...

"सिर्फ हमारी"


"अब ये अगला पैगाम सभी लडकों के नाम...

"चाहे ये 'पिंकी-शिंकी'...

'चेतना-वेतना'...

'सीता-गीता'...

'रेशमा-सेशमा'...

'हेमा-शेमा'...

'विनीता-सुनीता'...

'मोनिका-शोनिका'सब ले लो"

लेकिन!...

किंतु....

परंतु....

बाजू वाली'कामना'को मेरे लिए छोड देना प्लीज़!...."


"सुनो गौर से तुम भी लडको सारो...

बुरी नज़र न इस 'कामना' पे डालो"

"चूँकि ...सबसे आगे हूँ मैँ"...

"हाँ!...मैँ"...


"देखो!...इनकार न करना"..

"वो मेरी है!....सिर्फ मेरी"...

"समझा करो यार!...भाभी लगती है तुम्हारी"


"अच्छा बाबा!...ओ.के"....

"बाकि सब तुम्हारी"...

"हाँ!...गॉड प्रामिस"

"ठीक रहेगा ना?"

"कोई ट्ण्टा नहीं ना अब?"

"तो डील रही पक्की?"

"कोई गिला?"...

"कोई शिकवा तो नहीं ना?"


"ओ.के!...तो फिर तुम...

अपनी 'बिप्स-शिप्स'...

'मल्लिका-शल्लिका'..

के साथ 'ऐश-वैश'करो"...


"ऊप्स!..सॉरी अगेन"...

"इस 'ऐश'को तो आप बक्ष ही दें अब खरबूजा खा के"


"करने दो 'अभिषेक' को भी 'ऐश'के साथ ऐश"

"अपना ही बन्दा है"...

"कौन सा पराया है?"


"जाएँ अब आप भी अउर...

ई दिपावली की मौजवा के समुन्द्र में गोते लगाएँ एकदम से खुल के..."


"खुश रहें"...

"आबाद रहें"...

"बेशक!...यहाँ रहें या 'फरीदाबाद' रहें"


"आप चाहें तो बेशक 'मुरादाबाद' या फिर 'बरेली' में भी अपना तम्बू का बम्बू गाड लें"

"बेकाझ ई आज़ाद भारत में कौनु रोकने-टोकने वाला नहिंए है ना"


"एक ठौ बार फिर से दिपावली की शुभ व मँगल कामानाएँ आपके लिए"


"कर दी ना बुरबक वाली बात?"

"अरे बाबा!...हर वक्त थोडे ही चलता है मज़ाक-शज़ाक"


"अबकि बार सचमुच में दिपावली की शुभकामनाएँ आप ही के लिये शुद्ध व खालिस देसी घी में तैयार"

"अब विश्वास नहीं है ना आपको इस 'राजीव' की बात पर?"

"तो!..चख कर देख ही लें आप खुद ही"


"मज़ा न आए तो पूरे पैसे वापिस"


"अरे बाबा!...ई गूगलवा के एडसैस पे चटखा लगा के पहिले पैसा तो दिलवा दीजिए"

फिर कीजिए ना आप हमसे पैसे वापसी की खुल के बात"


"भय्यी देखिए...सीधी-सच्ची बात तो ये है बन्धुवर के...

अगर आप ई 'एड-वैड' पे 'क्लिक' नाही करेंगे तो समझ लीजिए कि...

आपका तो कुछ जाएगा नहीं और अपना कुछ रहेगा नहीं ई 'ब्लोगिंग-व्लॉगिंग' के चक्कर में"


"सो!..मार दीजिए ना दो-चार 'क्लिक'..

झोली भर-भर दुआएँ दूँगा आपको"...


"सच्ची!...सच्ची-मुच्ची"


"ओ.के बाबा!..."

"काले कुत्ते की कसम"...


"क्यूँ!..ठीक है ना?"



विनीत:

राजीव तनेजा

"कुछ जतन करो मेरे भाई"


"कुछ जतन करो मेरे भाई"


***राजीव तनेजा***

ना रहा अब दिन को चैन
ना रही अब रातों की नींद
सुख-चैन लुट गया है मेरा
कब-कब आओगे तुम रघुवीर

पढने वाले पढ-पढ रहे
समझ रहा ना कोई
कुछ जतन करो मेरे भाई
कुछ जतन करो मेरे भाई

पहले मैने इसे पिया
अब ये मुझे पीने लगी
ज़िन्दगी पहले सी कहाँ
बोझिल अब होने लगी

कुछ जतन करो मेरे भाई
कुछ जतन करो मेरे भाई


खुशी-खुशी मैँ इसे पीता था
हर गम भी सह-सह जाता था
बे-स्वाद बे-असर है अब
ना बचा इसमें कुछ बाकी है

कुछ जतन करो मेरे भाई
कुछ जतन करो मेरे भाई

क्यों जान इसी में अटकी है
क्यों तलवार गले पे लटकी है
समझ रहे मुझे किस जैसा
मैँ नहीं रहा कभी उन जैसा

कुछ जतन करो मेरे भाई
कुछ जतन करो मेरे भाई

सोच तुम्हारी है उल्ट-पुल्ट
बात है जबकि सीधी सच्ची
रास्ते हमारे अलग-अलग है
विचार हमेशा रहे जुदा-जुदा

कुछ जतन करो मेरे भाई
कुछ जतन करो मेरे भाई

बात सुरा की तुम करते हो
मैँ पान सुधा का करता हूँ
तुम विष का सेवन करते हो
अमृत का प्याला मैँ छकता हूँ


कुछ जतन करो मेरे भाई
कुछ जतन करो मेरे भाई

चाय की प्याली प्यारी मुझे
अद्धा-पव्वा है न्यारा तुम्हे
चाय को मन मेरा भटक रहा
पैग तुम्हारा अब छलक रहा


कुछ जतन करो मेरे भाई
कुछ जतन करो मेरे भाई

राधा-स्वामी नाम लिया है
जीवन उनके नाम किया है
छोड के तुम सारे व्य्सन
इष्ट का अपने जाप करो

कुछ जतन करो मेरे भाई
कुछ जतन करो मेरे भाई

***राजीव तनेजा***

"हाँ मैँ सरदार हूँ"

"हाँ मैँ सरदार हूँ"


***राजीव तनेजा***

"अब यार!...इन लडकियों को हम सरदार पसन्द क्यों नहीं आते हैँ भला?"

"ये बात तो आज तक अपने पल्ले नहीं पडी"

"आखिर!..क्या कमी है हम में?"

"पता नहीं उन्हें हम सरदारों के नाम से ही करैंट क्यों लगने लगता है?"

"अब यार!..इन कमबखत मारियों से लाख छुपाने की कोशिश की कि मैँ सरदार हूँ लेकिन कोई फायदा नहीं"

"पता नहीं इनको कैसे खबर हो जाती है और...

वो ऐसे पागल घोडी के माफिक बिदकती हैँ कि फिर कभी ऑनलाईन होने का नाम ही नहीं लेती"

"यहाँ तक कि मैने भी कई बार 'आई डी' बदल-बदल के 'ट्राई' मारी लेकिन....

हाल वही जस का तस"

"इन बावलियों को पता नहीं कहाँ से खुशबू आ जाती है कि सामने वाला सरदार है"

एक दिन हिम्मत कर के एक से पूछ ही लिया कि....

चलो माना कि मैँ सरदार हूँ लेकिन आपको कैसे पता चला इसका?"

"मैने तो अभी तक आपको अपने चौखटे के दर्शन भी नहीं करवाए हैँ"


"वैरी सिम्पल"..उसका जवाब था


"पर कैसे?"

"पता तो चले"


"इंटीयूशन ....बेबी ...इंटीयूशन"

"कुछ लोग तो शक्ल से ही सरदार होते हैँ और कुछ अक्ल से भी"वो जैसे मज़ाक उडाते हुए बोली

"तुम दूसरी वाली 'कैटेगरी' के हो"


"हाँ!...मैँ सरदार हूँ"...

"सरदार हूँ"...

"सरदार हूँ"...मुझे गुस्सा आ चुका था


"आपके लिए ये हँसी-ठिठोली की बात हो सकती है लेकिन मेरे लिए ये फख्र की बात है कि मैँ एक सरदार हूँ"


"आप सबकी ज़िन्दगी में रौनक लाने वाला कौन?"


"एक सरदार"...ना?"


"आपके 'बैण्ड' बजे चेहरे पे हँसी लाने वाला कौन?"


"एक सरदार!...ना?"

"'कशमीर' से 'कन्याकुमारी' तक...

'पँजाब' से 'नागालैण्ड' तक...

'आस्ट्रेलिया' से 'यू.एस' तक...

चाहे 'जापान' हो या हो 'फिज़ी'....

या फिर 'अफ्रीका' का कोई छोटा-मोटा देश"..

"हर जगह हमारा अपनी कामयाबी का झण्डा गाड चुके हैँ"

"अरे!...हम सरदार वो चीज़ हैँ जो रोते हुए चौखटों पे भी हँसी की बौछार ला दें"

"अब ये!..'लतीफे' या 'जोक्स' कहाँ से बनते हैँ?"


"अपने ही समाज से!...ना?"

"और अगर इस काम में हमारे जुड जाने से आपको इस 'टैंशन' भरे माहौल में...

खुशी के दो पल मिलते हैँ तो ये हमारे लिए गर्व की बात है...

फख्र की बात है"


"हमारे जैसा मेहनत-कश इंसान आपको पूरी दुनिया में ढूंढे ना मिलेगा"

"अरे!..हम वो हैँ जो अपनी मेहनत से रेगिस्तान में भी फूल खिला उसे गुलज़ार बना दें"

"हम वो हैँ जो पत्थर को भी पिघला दें"

"खास बात ये कि हम किसी भी काम को छोटा या बडा नहीं मानते"

"इसीलिए आज हमारे पास....

'दौलत' है...

'शोहरत' है...

'रुत्बा' है ...

'ताकत' है...

'पोज़ीशन' है"


"इंडिया का प्राईम मिनिस्टर कौन?"....

"एक सरदार!...ना?"

"उनके जैसा पढा-लिखा इंसान तो ढूढे से भी ना मिलेगा"

"आज़ादी की लडाई में भी हम सरदार ही सबसे आगे थे"

"पूर्व राष्ट्रपति कौन?"

"एक सरदार!...ना?"

"अब यार!...ये अच्छे-बुरे तो हर कौम में हो सकते हैँ"..

"इसके लिए हमारा सरदारों पर ही भला तोहमत क्यों?"

"ठीक है!...माना कि हमारा में कुछ गल्त भी हैँ लेकिन...

ऐसे बन्दे किस कौम में नहीं हैँ भला?"

"ज़रा बताओ तो"

"उसके लिए क्या सबको गल्त ठहरा देना जायज़ है?"


"नहीं ना?"

"तो फिर!...?"

"आज जो कुछ....

'आसाम'..

'बिहार'....

'बंगाल'....

'आन्ध्रा प्रदेश' या फिर किसी पडोसी मुल्क में हो रहा है....

"उसे कौन अंजाम दे रहा है?"

"क्या सरदार?"

"नहीं ना!..."

"कोई कौम या मज़हब गल्त नहीं होती"...

"गल्त होती है विचारधारा"

"अच्छे या बुरी विचारधारा वाला इंसान किसी भी कौम या मज़हब का हो सकता है"

"कोई ज़रूरी नहीं कि वो....

'हिन्दू' हो के 'मुस्लिम' हो....

'सिख' हो के 'इसाई' हो...

या फिर हो कोई और"

"मैँ लगातार बिना रुके बोलता चला गया"

"वो बेचारी सकपकाई सी चुपचाप सुनती रही सब का सब"


फिर बस उसने यही लिखा कि ...

"आई एम सॉरी"


"मैँ बडा खुश था कि चलो एक मोर्चा तो फतह हुआ"...

"लेकिन जंग जीतना अभी बाकि है"

"तो आओ सरदारो!...

आगे बढें और कहाँ दें दुनिया वालों से कि...

"हाँ!...हम सरदार हैँ"

"कोई शक?"


***राजीव तनेजा ***

नोट:अगर मेरे इस लेख से किसी की भावनाएँ आहत होती हैँ तो मैँ इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ-राजीव तनेजा

"बधाई हो बधाई"

"बधाई हो बधाई"

***राजीव तनेजा***

"बधाई हो बधाई....आप बाप बनने वाले हो"...

"ऊप्स सॉरी!..."..

पता नहीं कैसे जब भी किसी को बधाई देनी होती है तो इस मुँह से बस यही निकलता है मानो...

सामने वाला बाप ही बनने वाला हो"...

"और तो कोई काम हो ही नहीं सकता ना जैसे इसके अलावा बधाई के लायक?"


"अब आपको तो पता ही है इस ...

छोटी सी...

नन्ही सी...

प्यारी सी चमडे की ज़बान का"...

"मौका भर मिले सही इसे और मज़े से ठुमके लगाते हुए इसका कुछ भी उल्टा-सीधा बके चले जाना शुरू"


"अपने में ही मदमस्त हो...

कभी-कभार फिसल भी जाती है बेचारी"


"उफ!...

एक तो कम जगह....

ऊपर से ये मुय्या फिसलन भरा रास्ता"...

"और लगे हाथ!..ये जन्मजात ऊछल-कूद की आदत"

"तो फिसलना तो पक्का ही पक्का समझो...

भले ही आज फिसले...

या फिर कल...

या फिर किसी और दिन"


"अमाँ यार!..आप भी कहाँ मेरी ज़बान के साथ-साथ ठुमके लगाने लगे?"..


"कोई काम-धाम है कि नहीं?"

"खैर!...अब ये कमर लचकाना छोड...मेरी बात ध्यान से सुनो"...


"हाँ!..तो मैँ क्या कह रहा था?"


"उफ!..

लगता है मुझे भी ये नेताओं की भूलने वाली बिमारी होती जा रही है...दिन पर दिन"...


"लेकिन यार!...अब तो इलैक्शन आने वाले हैँ कुछ ही महीनों में"...


"ऐसे आडे वक़्त में भूल जाना तो....गुनाह है...पाप है"


"इन दिनो तो...

छोटे से छोटे...

बडे से बडे...

टुच्चे से टुच्चे और...

छुटभिय्ये नेताओं तक को भी कुछ नहीं भूलता है जैसे....

गली-मोहल्लों के बाईस-बाईस चक्कर लगाना"....

"सडकछाप गुण्डों की फौज पालना"...

"दंगे करवाना"...

"भिखारियों की तरह हाथ में कटोरा ले गली-गली वोटों की भीख मांगना"...

"झुग्गी बस्तियों में नोटों और दारू की बारिश करवाना वगैरा-वगैरा"


"सो!..मैँ कैसे भूल गया?"


"अरे यार!...ये हम किनकी बातें ले के बैठ गये?"

"ये ना कल सुधरे थे...

ना आज सुधरे हैँ और...

ना ही आने वाले कल में इनके सुधरने की कोई संभावना है"...


"अब ये 'संभावना'से कहाँ याद आ गयी 'भावना'...

"अरे वही'भावना'जिसने कभी मेरी भावनाओं को नहीं समझा"


"हाँ-हाँ वही!..जो कभी मेरे साथ पहले स्कूल और फिर कॉलेज में पढा करती थी"...


"वो दिन भी क्या दिन थे"...

"हमारा एक दूसरे से बातें करना"...

"वो साथ कैंटीन में वक़्त गुज़ारना"..

"बातों ही बातों में पैदल कहीं दूर निकल जाना"


"कमाल है!...आज भी उसकी यादें हैँ मेरे साथ"..


"वैसे भूला भी कब था मैँ उसे?"

"हर पल...हर घडी..वो मेरे साथ ही तो थी"...


"लेकिन फिर!..पता नहीं क्या हुआ और वो मुझसे दूर होती चली गयी"...

"अगर मेरा साथ गवारा नहीं था उसे....

तो खुद ही कह देना था ना"...

"किसी और से मैसेज भिजवानी की क्या ज़रूरत थी?"...


"खैर!...वो न थी हमारी किस्मत"


"ज़रूर एकतरफा चाहत रही होगी मेरी"..


"उफ!...कर दिया ना सैंटी मुझे"....


"आप भी ना...


"खैर छोडो!...

क्या रखा है कल की बातो में?"...

"कल की बात पुरानी...नए दौर में लिखेंगे...मिलकर नई कहानी"


"हाँ तो!...हम बात कर रहे थे बधाई की ...

तो यार!...'बधाई हो बधाई' बनायी थी अनिलकपूर ने"...


"वैसे फिल्लम तो कुछ खास नहीं लगी थी मुझे लेकिन...

फिर भी अपने अनिल कपूर बधाई के पात्र तो हैँ ही"...

"इतना जोखिम उठा कर लीक से हट के फिल्म बनाने का माद्दा हर किसी में कहाँ होता है?"

"कलाकार तो एक्दम उम्दा क्वालिटी के हैँ अपने अनिल कपूर"

'नो एंट्री'में क्या गज़ब की परफार्मेंस दी है पट्ठे ने"


"नो एंट्री से याद आया कि इस दिवाली...

उनकी बेटी 'सोनम'भी उन्ही के नक्शे कदम पे चलते हुए फिल्मों में एंट्री ले रही है"...

"वो भी छोटे 'कपूर' यानी'रणवीर कपूर'के साथ"

"अरे!..वही 'रणवीर'....

हाँ...हाँ...वही 'रणवीर'

जो अपने'ऋषी कपूर'का बेटा...

'राज कपूर'का पोता.....

'प्रिथ्वीराज कपूर'का पडपोता...

शशि कपूर,रणधीर कपूर,करिशमा कपूर,करीना कपूर,बबिता कपूर,कर्ण कपूर,जनिफर कपूर ,

शम्मी कपूर और ना जाने किस-किस 'कपूर' का क्या-क्या है"


"अब किस-किस के नाम और रिश्ता गिनवाऊँ?"...

"पूरा खानदान ही तो घुसा पडा है फिल्म इंडस्ट्री में"


"तो इस दिवाली ...खूब धमाचौकडी का इरादा है इन फिल्लम वालों का"

"दो-दो महारथी जो टकरा रहे हैँ"

"अपने किंग खान और भंसाली साहब"

"ओम शांति ओम और साँवरिया के माध्यम से"

"दोनों का अपना-अपना रुत्बा है"

"कोई किसी से कम नहीं"

"देखो...

किसकी दिवाली मनती है और किसका दिवाला?"


अपनी तो दुआ है ऊपरवाले से के इस दिवाली....

दोनों ही दिवाली मनाएं खूब धूम-धडाके से"

"अपुन को क्या फर्क पडता है?"

"अपुन ने कौन सा नोट खर्चा कर के देखनी है फिल्लम?"

"नोट खर्चा करें मेरे दुश्मन"

"अपुन ने तो नैट से ही डाउनलोड कर लेनी है जी"...

"हफ्ते भर में ही नैट पे धांसू से धांसू फिल्लम भी'अवेलेबल' जो हो जाती है 'टौरेंट' के जरिए"

"तो फिर खर्चा कौन कम्भख्त करता फिरे?"


"टारेंट ज़िन्दाबाद"...

"पाईरेसी ज़िन्दाबाद"

"खर्चा वो करें जिसे कंप्यूटर की समझ नहीं है या फिर वो जिसे...

माशूका के साथ कोई एकांत जगह नहीं मिलती"


"अपुन का क्या है?"....

"अपुन ठहरे रमते जोगी"...

"ऊपरवाले की दया और अपनी लेखनी के दम पे...

ना अपने पास जगह की कमी है और ना ही पैसे की"

"अब ज़्यादा क्या कहूँ?...


"किसी नेक बन्दे ने कहा भी तो था कि बन्धुवर आपकी लेखनी बडी सशक्त है"

"इस उल्टा-पुल्ता लिखने भर से ही पता नहीं कितनी सैंटी हो चुकी हैँ"

"जब सीरियसली लिखना शुरू करूँगा तो सोचो...क्या-क्या जलवे बिखेरूँगा"


"नाम बताऊँ?"


"छड्ड यार!...अब किस-किस का नाम और काम याद करता फिरूँ?"


"कोई और काम-धाम है कि नहीं मुझे?"



"क्या यार!...?"...

"आप भी ना बस!.."...

"तौबा हो...बस तौबा"


"वैसे कहते फिरते हो कि टाईम नहीं है और ...

अब इन बेफिजूल की बातों से खुद ही अपना और मेरा टाईम खराब कर रहे हो"...


"ऊपर से सौ झूठ हमसे भी बुलवाते हो सुबह-सुबह"

तौबा...तौबा"


"आपका तो पता नहीं लेकिन मेरा समय बहुत कीमती है"

"अब बेफिजूल की बातें करने की आदत तो है नहीं अपनी कि...

कोई बात हो न हो लेकिन लिखना ज़रूर है"...


"बडे-बूढों से सुन जो रखा है कि...

"टाईम वेस्ट इझ मनी वेस्ट"


"मनी की तो अपुन को कौनू चिंता नाही लेकिन...

"टाईम कहाँ है अपुन के पास?"

"कभी इसे डेट के लिए प्र्पोज़ करुं तो कभी उसे"


"और आपने कर दिया ना वैल्यूएबल टाईम वेस्ट मेरा?"


"खैर छोडो!...

अब क्या रखा है इन बातों में"...

"जो बीत गया सो बीत गया"


"हाँ!..तो मैँ कह रहा था कि "बधाई हो बधाई"...

"आपका ईनाम निकला है...ईनाम"

"ईनाम...वो भी छोटा-मोटा नहीं...तगडा निकला है"...


"क्या कहा?"...


"उम्मीद से दुगना?"..


"अरे यार!...वो तो बांटा करते थे अपने 'बच्चन जी' किसी ज़माने में"


"वो समय कुछ और था...ये समय कुछ और है"


"अपने 'बच्चन जी' का दौर तो कब का खत्म हो गया"

"उसके बाद तो'किंग खान'आए-गए हो लिए कब के"...


"उदती-उडती खबर सुना हूँ कि शायद वो फिर से आने वाले हैँ"...


"अउर आपको ईनाम भी देंगे टीवी पर"...

"वो भी तब जब...

आप घंटो तक उस के लिए बावलों की तरह फोन मिलाते रहो"...

"नॉलेज की किताबों पे चढी धूल फांकते रहो और....

अखबारों की रद्दी कबाडी को बेचने के बजाय संभाल के रखो कि...

पता नहीं 'बच्चन साहब'...

ऊप्स सॉरी...

अपने किंग खान कौन सा सवाल कर डालें"...


"अगर किस्मत गल्ती से मेहरबान हो भी गयी और फोन मिल भी गया तो ये डर कि...

कहीं ये साले!...'एम.टी.एन.एल' या फिर....

'बी.एस.ए.एल' वाले दगा ना दे जाए बीच मंझधार में अकेला छोड"

"सरकारी जो ठहरे"...

"आज हैँ"...

"कल की खबर नहीं"

"क्या मालुम कल हो ना हो"


"सरकारी काम है"...

"सरकारी ढंग से ही होगा ना?"


"तो फिर इतने औखे क्यूं हुए जा रहे हैँ आप?"


अब आप कहेंगे कि "इस मुय्ये बेसिक फोन को मारो गोली"....

"मोबाइल है ना?"...

"तो भैय्या मेरे....

फिर लगे रहना 'एयरटैल' वालों की मिनट दर मिनट के हिसाब से झोली भरने"

"अब यार!...किसी भले मानस ने किसी मेल या अखबार में पोल तो खोली तो थी इनकी कि....

कितने के वारे न्यारे करते हैँ ये एक-एक एपीसोड में"...

"अब अखबार के पन्ने तो आप पलटने से रहे तो कभी-कभार फुरसत निकाल के मेल-वेल ही चैक कर लिया करो"..


"कोई ज़रूरी नहीं कि हर वक़्त टीवी पे इन नंगी-पुंगी ठुमके लगाती लडकियों को ही ताक-ताक के ही टाईम खोटी करो"


"कोई शर्मो-लिहाज बाकि है कि नहीँ?"

"या वो भी मंदे बाज़ार में बेच खाई?"


"क्या यार?...

आप भी ऐसा सोचने लगेगी ना कि ये अच्छे भले 'राजीव' को क्या होता जा रहा है?"


"आप तो ऐसे न थे"

"वैसे मैँ बन्दा बडा ही ग्रेट हूँ ...बस पैदा हुआ थोडी लेट हूँ"

"अब लेट से आप ही कहीं मेरा ये ब्लाग पढना छोड बोर हो लेट ही नहीं जाना बिस्तर पे"

"आपके लेटने से अपुन को तो याद आ गई अपनी भारतीय रेल"...

"वाह!...क्या लेट हुआ करती है अपनी भारतीय रेल"

वाह!....वाह"


"अब आप घर से बेशक ऊँघते-ऊँघाते दो घंटे देरी से निकलें लेकिन...

ट्रेनवा के छूटने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता ना"


"अपने बडे-बुज़ुर्ग भी तो कहाँ गए हैँ कि...

जो वेले हैँ वो ही जल्दी पहुँचा करते हैँ"...


"कोई काम-धाम तो होता नहीं है इन्हें"...


"हुँह!...नहाना तो दूर की बात है...

ना ठीक से मुँह धोया और ना ही कुल्ला किया ढंग से "


"बस सडा सा मुँह उठाया और पहुँच लिए सीधा रेलवे स्टेशन"


"अरे भाई!..ज़रा बन के निकलो...

ज़रा ठन के निकलो"...

"क्या मालुम तुम्हें तुम्हारी 'बिप्स'...

और आपकी'ऐश'मिल जाए रेलवे स्टेशन पे?"


"जल्दी पहुँचने से कौन सी फीतियाँ लग जाएँगी तुम्हारे कन्धो पर?"

"अरे भाई...हाम्फते-हाँफते जो गाडी पकदने में मज़ा है...वो आराम से तसल्ली से...पकदने में कहाम?"

वो तुम्हारा हाँफते-हाँफते गाडी पकडना...

वो उसका तरस खाते हुए हाथ बढा तुम्हेँ चलती गाडी के अन्दर खीँचना"


"उफ!...किसकी याद दिला दी यार?"

" ये अपनी काजोल भी ना!...

पता नहीं कितनों की जान ले के छोडेगी"

"शादी हो गई...लेकिन जलवा वही का वही"

"अरे भय्यी!...बहुत हो गया"

"अब तो बक्श दो"...

"खाली-खाली झुनझुना क्यों दिखा ललचा रही हो ?"


"बच्चे की जान लोगी क्या?"



"लाहोल विला उलकुव्वत ...

बहुत हो गया ये लेट-शेट का ड्रामा"...


"बाकि किसी और वक्त...किसी और घडी"...

"फिलहाल कहीं ये ना हो कि मौका हाथ से निकल जाए और आप...

अतना टाईम खोटी करने के बाद भी ईनाम से वंचित रह जाएँ...

महरूम रह जाएँ"


"देखी मेरी उर्दू!...?"...

"इसे कहते हैँ सही मायनों में....

हिन्दी फिल्लमों का आम जनजीवन पे असर"


"अब!..खरबूजे को देख खरबूजा रंग नहीं बदलेगा तो क्या कद्दू रंग बदलेगा?"


"उफ!...

क्या होता जा रहा है मुझे?"

"उतार दी ना फिर पटरी से रेल?"

"लगता है!...अगली कहानी में ये रेलवे बिना अपनी ऐसी-तैसी करवाए नहीं मानेगी"


"फिलहाल इन बातों को यहीं विराम देते हुएसबसे पहले ईनाम ही बाँट लिया जाए तो बेहतर "


"ये रेलवे-शेलवे की कहानी कभी और बाँच लेंगे"


"अपुन का क्या है...वेले के वेले"


"हाँ!..तो बात हो रही थी ईनाम की...

"तो यार!...इस बार क्रिसमस और दिवाली के बंपर मौके पे....

खुशी से मैने भी अपनी दिल रूपी तिजोरी का मुँह खोल दिया है और...

आप सब के लिए एक-एक जैकपॉट.....


...

...

....


"अब अपने मुँह से कैसे ब्याँ करूँ अपनी दिलदारी का?"

वरना सब कह उठेंगे कि "ये पट्ठा ईनाम बाँट रहा है या अपनी दिलदारी का ढिंढोरा पीट रहा है?"


"अब यार!...आप मेरी तरह यूँ टुकुर-टुकुर ताकने के बजाए खुद ही देख लो ना"...


"अब अगर!..जैकपॉट पसन्द आ जाए तो ...

वैल एण्ड गुड...

नय्यी ते ....

वडो 'ढट्ठे खू'विच







"जय हिन्द"

***राजीव तनेजा***

"सलाम-नमस्ते"


"सलाम-नमस्ते"


***राजीव तनेजा***


"हॉय!...."..

"हैलो!...."..

"सलाम!...."..

"नमस्ते!..."...

"आदाब!...."

"इन सब में से दोस्तों!...मैँ आपको कुछ भी नहीं कहने वाला"...

"वो दर असल बात कुछ यूँ है कि अब ये अपने हिन्दी ब्लॉग तो ऊपरवाले की दया से और....

आप जैसे दोस्तों की कडी मशक्कत से दिन दूनी रात चौगुनी तेज़ी से बढते ही जा रहे हैँ और...

अपुन के ब्लॉग पे भी ट्रैफिक कुछ बढता ही जा रहा है"


"ब्लागज़ पे ट्रैफिक यूँ ही बढता रहेगा गर...तुम पढोगे प्यार से लेकिन...

एक चीझ नोट किया हूम ने कि सिर्फ 'तीने ठौ डॉलर' भर ही इकट्ठा हो पाया है...

पूरे तीन महीने कीबोर्ड पे उंगलियाँ चटखाने के बाद"...


"उसके बाद भी भेजवा में कुलबुलाती हुई कशम्कश जारी के...

"ई 'गूगल' वाले 'चैक' भेजेंगे के 'कैश' भेजेंगे?"

"कौनु खबर नाही"...

"के बेरा घर के पते पे भेजेंगे के आफिसवा के पते पे?"


"और अगर नहीं भेजेंगे तो हम उनका!...कॉ उखाड लेंगे?"


"बहुत ना इंसाफी करत हैँ ई गूगल वाले तो...

किसी को रबडी और मॉल-पुआ तो...किसी के पल्ले सूखी जलेबी भी नहीं"

"तो भैय्या मेरे!...गाँठ में तनिक सी बात बाँध लो कि जहाँ भी जाओ...

'एडसैंस' की 'ऐडज़' पे चटखा ज़रूर लगाओ और अपुन जैसे महारथियों से भी लगवाओ"


"कहीं इन एडज़ को'एडस'बिमारी समझ के ही ना बिदक लेना दूर से"

"क्योंके!..क्या कर बैठो..कुछ पता नहीं तुम्हारा"


"समझा करो यार!...पापी पेट का सवाल जो है"

"कहाँ तक अपुन अकेला बोझा ढोता फिरेगा अपने सभी खर्चो का?"


"भाई-बन्दी भी कोई चीज़ होती है कि नहीं?"


"एक अकेला थक जाएगा...मिलकर बोझ उठाना". ..

"साथी हाथ बढाना...साथी रे!..."


"और ऊपर से मुय्ये दिन रात हैँ कि...

दिन पर दिन छोटे होते जा रहे हैँ अपनी बॉलीवुड सुन्दरियों के कपडों की तरह"


"अब!..ये सिर्फ बॉलीवुड सुन्दरियों को ही नाहक बदनाम क्योंकर करें अपुन लोग?"...

"ये सीरियल वाली मेनकाएँ भी तो इसी ढर्रे पे चल निकली हैँ" ...

"और तो और उनके पीछे-पीछे अपने गली-मोहल्ले की बालिकाएँ भी...

इन खरबूजियों को देख-देख उन्हीं के माफिक रंग बदलते हुए हम मर्दों की ऐसी-तैसी करने पे उतारू हैँ... .

खम्बा उखाड के"


"अब यार!...अगर मैँ यूँ ही मुफ्त में ज्ञान बाँटता फिरा तो फिर हो ली कमाई इस ब्लॉग-व्लॉग से"


"और फिर बाकि बचे हुए कामों को क्या गुरूद्वारे से ग्रंथी आ के करेगा?"


"वैसे भी यार!...ब्लॉग-व्लोग पे इस पोस्ट-वोस्ट के चक्कर से अपनी रोज़ी-रोटी चलने से रही "...

"कई बार तो!..बीवी भी तुनक के कह उठती है कि....

अब इस मुय्यी 'रोज़ी'से ही पकवाओ रोटी"

"मैँ तो चली मायके"

"लौट के न आऊँगी ...जब तक ये मुय्या नैट नहीं कटवाओगे"


"खैर छोडो मियाँ!...किसकी याद दिला दी?"

"अब इस रोज़ी के चक्कर में...

ऊप्स!...

सॉरी...

रोटी के चक्कर में कोई ना कोई काम-धाम तो करना ही पडेगा"


"हाँ!..तो मैँ कहाँ रहा था कि अब ये 'सलाम-नमस्ते'आप हमसे ना ही करवाओ तो बेहतर"...

"पूछो भला क्यूँ?"

"तो भैय्या मेरे!...

पहले आप हमसे नमस्ते बुलवाओगे...

फिर कोई जान-पहचान निकालोगे...

फिर फोन-शोन...

फिर एस.एम.एस....

फिर डेटिंग-शेटिंग"


"हॉय!..मैँ मर जावाँ गुड खा के"


"अब!..अगर अपोज़िट ग्रुप के निकले तो ठीक...

काम चल जाएगा लेकिन...भगवान ना करे अगर कहीं...

गल्ती से भी सेम ग्रुप के निकल गए तो?"...


")*&(ं%$##@@#$$)"


"आखिर!...समझ क्या रखा है आपने मुझे?"...


"हिम्मत कैसे हो गई आपकी...ऐसा सोचने भर की?"


"अरे भाई!...

हिन्दी हूँ मैँ और....

वतन है'हिंदोस्ता'हमारा"...


"कोई चलता-फिरता फिरंगी नहीं कि...

ये भी ठीक है और वो भी ठीक है"...


"हुँह!...बिना किसी लाग-लपेट के जो आता है...आने दूँ? और..

जो जाता है...जाने दूँ?"..


"वैसे...एक बडा ही फैंटास्टिक आईडिया भेज डाला है ऊपरवाले ने अपुन के भेजे में अभी-अभी "

"आप कहें तो!...बतलाऊँ?"


"अब यार!...आप सब तो सोचते ही रह जाओगे...

लगता है मुझे ही पहल करनी पडेगी"

"और!...करूँ भी क्यों ना?"....


"मेरा...ब्लॉग"...

"मेरा...टाईम"...

"मेरा...कम्प्यूटर"...

"मेरा....की-बोर्ड"

"लेकिन!..शायद समय तो आपका भी ज़ाया जा रहा है ना?"...

"सॉरी यार!...इसका तो मुझे ध्यान ही नहीं रहा"

इसी को सही मायने में कहते हैँ...

"छोटी सी...बहुते बडी गल्ती"


"दर असल वैसे तो मैँ *&ं%$#@ हूँ नहीं लेकिन...

कभी-कभार &ं%$#@ बनने में कुछ बुराई भी नहीं"


दिल ये कहता है कि...

"वो भी अपने ही हैँ...पराए नहीं"

"थोदा चेंज-वेंज भी होता रहना चाहिए लाईफ में"


"तो फिर '*&ं%$#@@' बनने में आखिर हर्ज़ा ही क्या है?"


"अब यार!...सच्ची बात तो ये है कि...

'मेरे'....

'आपके'...

'बडे के'...

'छोटे के'...

'काले के'...

'गोरे के'...

'मोटे के'..

'पतले के'...

यानी हम सब के कभी ना कभी तो '@#$%ं' ज़रूर ही बजते हैँ"...

"भले ही कोई माने या ना माने"

"तो फिर!...यूँ समझ लो मेरे प्यारे 'बंटुकनाथ' कि अपुन के तो '@#$%ं'बज ही गए"

"लेकिन...चिंता करने की कौनू ज़रूरत नाही"...

"अब चाहे 'चिंता' और 'चिता' में सिर्फ बिन्दी भर का ही फर्क हो लेकिन...

मतलब में ज़मीन-आसमान का फर्क है बाबू!..."


"चिंता जो है..वो सोने नहीं देती और...चिता जो है....वो हमेशा के लिए सुला डालती है"


"कहत राजीव...सुनो भी साधो...

"लकडी जल..कोयला भय्यी,कोयला जल...भय्या राख...

चिंता न कर रे बन्धु मेरे ..हो जाएगा तू पल भर में ही राख"


"ये जो चिंता नाम की चिडिया होती है,वो है चिता नाम के घोंसले की जननी"...

"जननी का मतलब जानत हो ना बाबू?के....

वो भी हम हीं खुल के बतलाएँ इसी पोस्ट में?"


"छडडो यार!...क्या रखा है इन बेफिजूल के बातों में?"

"काम की बाता करते हैँ"

"तो आपके भी ऊपरवाले की दुआ से जल्द ही '@#$%ं'बजेंगे"...

"मेरा आशीर्वाद और ऊपरवाले की दुआएँ आपके साथ है"

"इंशा अल्लाह!...आपकी ये दिली तमन्ना ज़रूर पूरी होगी"

"अरे!..घबरात काहे हो?"...

"हमेशा थोडी ही बजेंगे आपके?"

"बस कभी-कभार..यूँ ही जब थोडा ऊपर-नीचे हो जाएगा...तब"


"समझे!..मेरे बबलू मियाँ?"

"अब यार!...इतना तो लाईफ में एडजस्ट करना सीख ही लो अब"

"कौन जाने कब कैसा वक्त आन पडे"


"धत तेरे की!..."

"आप भी ना!...बस तौबा हो...तौबा"...


"बात हो रही थी सलाम-नमस्ते की और पहुँच गई कहाँ की कहाँ?लेकिन...

मजाल है जो आपने तनिक सी भी चूँ तक की हो"


"सब्र की भी इंतहा है ये तो"...

"लेकिन एक शिकायत तो आपसे ज़रूर है दोस्त!...के...

आप भी मुझे नादान को रोकने के बजाय ये बेफिजूल की बातें पढने में ऐसे मस्त हुए जा रहे थे जैसे...

मॉबदोलत सिहांसन पे विराजमान हों और साक्षात मल्लिका ठुमके लगा रही हो आपके सामने"


"अरे बाबा!..हमारी तुम्हारी तरह ही हाड-माँस की आम इंसान है वो भी"

"कौनु आसमान से नहीं टपकी है वो कि आप पलक-पावडे बिछाते फिरें उसके लिए"...

"छत्तीस टकराएँगी रोज़...बस अपनी पारखी नज़र दौडाते फिरो...चहूँ ओर(चारों तरफ)"

"उफ!...बहुत हो गया ये मल्लिका-वल्लिका का चक्कर" ...

"सीधे ही पते की बात पे आए देत हैँ बिकाझ...

"टाईम वेस्ट इझ मनी वेस्ट"


"तो पते की बात ये है मित्रवर मेरे कि...

बिना किसी लाग-लपेट और औपचारिकता से निर्वाह करते हुए सीधे -सीधे यही बोले देता हूँ मैँ कि...


"सत श्री अकाल एण्ड ....सिंगल-सिंगल फोटोकॉपी टू ऑल "


"जय हिन्द!..."...

"भारत माता की जय"


***राजीव तनेजा***

"चौथा खड्डा"

"चौथा खड्डा"



बंता:संता सिंह जी!..ये खड्डा किसलिए खोदा जा रहा है?"

संता:ओ!..कुछ नहीं जी मुझे अमेरिका जाना है ना...इसलिए"

बंता:अमेरिका जाना है?"

संता:हाँ जी!.."

बंता:अमेरिका जाने के लिए खड्डा खोदना जरूरी है?

संता:ओ!..कर दी ना तूने सरदारों वाली गल्ल...

बेवाकूफ पॉसपोर्ट बनवाने के लिए फोटो चाहिए होती है कि नहीं?

बंता:फोटो तो चाहिए होती है लेकिन...फोटो से खड्डे का क्या कनैक्शन है?

संता:अरे बेवाकूफ!पॉसपोर्ट फोटो में कमर के ऊपर का हिस्सा आना चाहिए...

इसलिए कमर तक गहरे खड्डे खोद रहा हूँ ताकि नीचे का हिस्सा कैमरे में न आए

बंता:लेकिन यहाँ तो आप आलरैडी तीन खड्डे पहले ही खोद चुके हो...फिर ये चौथा क्यों?

संता:बेवाकूफ पॉसपोर्ट में चार फोटो लगानी पडती हैँ"

***राजीव तनेजा***

"गधे के पीछे गधा"

"गधे के पीछे गधा"

"सरदार संता सिंह अँग्रेज़ी का माना हुआ टीचर था"

"उनके विधार्थी हमेशा अव्वल आते थे"

"एक दिन स्कूल की इंस्पैकशन थी"....

"इंस्पैक्टर ने अँग्रेज़ी कक्षा का इम्तिहान लेने की सोची और...

वो चुपचाप क्लास के बाहर खडा होकर सुनने लगा कि...

संता सिंह क्या पढा रहा है?"


"इंस्पैक्टर बेचारा परेशान कि ये कैसी...किस तरीके की पढाई हो रही है?"

संता सिंह:"बोलो बच्चो!...'गधा'..."


सभी बच्चे:"गधा"...


संता सिंह:"बोलो बच्चो!...गधा..गधे के पीछे गधा"


सभी बच्चे:"गधा...गधे के पीछे गधा"


संता सिंह:"बोलो बच्चो!...गधा..गधे के पीछे गधा,गधे के पीछे मैँ"



सभी बच्चे:"गधा..गधे के पीछे गधा,गधे के पीछे मैँ"



संता सिंह:"बोलो बच्चो...गधा..गधे के पीछे गधा,गधे के पीछे मैँ...मेरे पीछे सारा देश"



सभी बच्चे:"गधा..गधे के पीछे गधा,गधे के पीछे मैँ...मेरे पीछे सारा देश"


"सुनकर दिमाग का दही होने लगा"...

"चक्कर खा गया कि ये पढई हो रही या मज़ाक?"...

"या!..ऐसे ही की जाती है पढाई?"

"ऐसे सैकडों सवाल उसके दिमाग में गुटरगूं करने लगे"

"जब रहा न गया तो वो गुस्से में दनदनाता हुआ सीधा...

प्रिंसिपल साहब के कमरे में जा घुसा और एक ही साँस में सारा वाक्या सुनाया"


"प्रिंसिपल साहब भी सुन कर हैरान-परेशान हो उठे"...

"उन्होने संता को नीचा दिखाने की सोची और बे-इज़्ज़ती करने के खातिर उसे तुरंत ही बुलवा लिया"

"संता के आते ही सीधा बिना रुके झाड पिलानी शुरू कर दी"...

"तुमने मज़ाक बना रखा है स्कूल का..वगैरा..वगैरा"...

संता"ऐसी कोई बात नहीं है जी"...

"आप गल्त सोच रहे हैँ"...

" मैँ तो बच्चों को पढा ही रहा था"...


"हुह!...ऐसे 'गधा-गधा'कर के होती है पढाई?"

"वाह!...क्या स्टाईल हमारे 'संता'का....वाह"


संता:"जी!...मैँ बच्चो को बस 'ASSASSINATION' के स्पैलिंग सिखा रहा था"


"ASS-ASS-I-NATION"


***राजीव तनेजा***

"शाही पनीर या फिर दाल मक्खनी"

"शाही पनीर या फिर दाल मक्खनी"

***राजीव तनेजा***


"बहुत दिनों बाद एक दोस्त मिला...

आँखे सूजी हुई....

चेहरा पीला पडा हुआ....

थकान के मारे बुरा हाल...

नींद के नशे में ऐसे चूर...मानों कई बोतल एक साथ चढा रखी हों"


"मैँ चकराया कि ये बन्दा तो ऊपरवाले ने बडा ही नेक बनाया था"...

"इसे क्या हो गया?"

"खैर!..आराम से बिठाया अपने पास"...

"फिर एक 'डबल डोज़'वाली कडक'कॉफी'बना के पेश की तो थोडी देर में आँखे खुलने लायक हुई"

मैने पूछ डाला"ये क्या हाल बना रखा है?"...

"कुछ लेते क्यूँ नहीं?"


वो चौंक के बोला"कैसा हाल बना रखा है?"...

"और..मैँ कुछ लूँ भी तो क्यूँ लूँ?"

"अगर कुछ लेना भी है तो...लें मेरे दुशमन"

"मैँ भला कुछ क्यूँ लेने लगा?"


अब मेरा दिमाग घूमा,बोला"अरे वाह!...

लडखडा रहे तुम,..

झूम रहे तुम,...

नशे में तुम,...

बावले हुए जा रहे तुम...और अगर कुछ लेना है तो...

वो मैँ लूँ?"

"वाह!...भाई वाह"


"अब उसके हँसने की बारी थी"....

ज़ोर से हँसता हुआ बोला"अरे...कुछ नहीं यार...

"अपुन का तो ये रोज़ का टंटा है"

"सुबह आँख बाद में खुलती है और....'कम्प्यूटर' पहले चालू होता है"


"कभी इस लडकी से 'चैट'करो तो कभी उस लडकी से"...

"किसी को अपना कुछ नाम बताओ तो किसी को कुछ"...

"किसी को कोई 'प्रोफैशन' बताओ तो किसी को कोई"


"बस इसी चक्कर में कब सुबह से दोपहर और...

दोपहर से शाम होते हुए रात हो जाती है पता ही नहीं चलता"


"जब चारों तरफ तितलियाँ ही तितलियाँ मंडरा रही हों तो....

नींद किस कम्भखत को आ सकती है भला?"मैँ बोल पडा


"बिलकुल सही बात"दोस्त हाँ में हाँ मिलता हुआ बोला


"किसी का नाम तो बताओ"मेरी उत्सुकता बढती ही जा रही थी


"बस यार!...क्या बताऊ?"..

"इन कम्भखत मारियों के नाम याद करते-करते और.....

इन्हें अपने अलग-अलग नाम बताते बताते लगता है कि...

कहीं किसी दिन मैँ अपना असल नाम ही ना भूल बैठूँ"...


"किसी को कोई शहर बताओ तो किसी को कोई"

"भले ही कभी अपुन ने कभी अपना मोहल्ला तक न लांघा हो लेकिन कहना तो यही पडता है कि...

"आई एम फ्रॉम कैलीफोर्निया"

"या फ्रॉम फलाना....या फ्रॉम ढीमका"


"किसी को 'अनमैरिड'तो किसी को 'मैरिड'...

"किसी के साथ'विज़िबल'तो किसी के साथ'अनविज़िबल'...

"किसी को'नो किडज़'तो किसी को..सौ 'किडज़'


"सौ किडज़?"...

"ये ध्रितराष्ट्र कब से बन गए तुम?"


"ऊप्स!...सॉरी...'टू किडज़'


"सच क्यों नहीं बता दिया करते?"मेरे चेहरे पे असमंजस का भाव था


"अब यार!...अपुन के तो ऊपरवाले की मर्ज़ी से पूरे के पूरे आठ हैँ"....

"तो क्या सब का सब सच-सच बता कर अपना बनता काम बिगाड दूँ?"

"भाग नहीं खडी होंगी क्या?"

"अब इतना भी बावला नहीं हूँ मैँ कि खुद ही अपना बेडागर्क कर डालूँ"



"पता नहीं इन लडकियों को ये शायरी का शौक क्यूँ चढा फिरता है आजकल?"

"जिसे देखो..सब काम-धन्धा छोड शायरी में मशगूल"

"जब से ये मुय्या घरों में 'फुल टाईम मेड'रखने का फैशन चल निकला है"..

"कोई काम-धाम ही नहीं रह गया है इन लडकियों के लिए"

"ये नहीं कि बैठ के झाडू पोंछ करें आराम से"....

"डायटिंग की डायटिंग...और ...काम का काम"

"झाडने चाहिए इन्हें दरवाज़े और खिडकियाँ...उल्टे झाडने लगती हैँ शायरी हरदम"


"सुना है कि कुछ को तो दिन-रात शायरी के ही सपने आते रहते हैँ"मैने कहा


"यहाँ साला!...अपुन के पूरे खानदान में कोई शायर तो क्या उसका दूर का रिश्तेदार तक पैदा नहीं हुआ और....

ऊपर से इन बावलियों को गोली देते फिरो कि...

"हमारी 'फेवरेट हॉबी'शायरी है"

"दिल बेशक करे न करे...फिर भी इनकी खातिर इधर-उधर से शायरी इकट्ठी करते फिरो जैसे...

ये छोटे-छोटे बच्चे गली-गली दिन-रात कचरा बीनते नज़र आते हैँ"...


"कुछ यहाँ से उठा और...कुछ वहाँ से मार"


"सच पूछो तो यार!..बडा ही कोफ्त भरा काम होता है ये"

"कई बार तो उन कचरा बीनने वालों में और इन 'चैट' करने वालों में कोई फर्क़ ही महसूस नहीं होता"

"लगता है जैसे वो और ये एक ही थैली के चट्ते-बट्टे हों"

"मानों कभी कुम्भ के मेले में बिछुड गये थे कभी ..सोलह साल पहले"


"यार!...क्या बात कर रहे हो?"..

"कहाँ वो छोटे-छोटे बच्चे और कहाँ ये मुस्सटंडे?"


"अब मुझे क्या पता?कि कैसे वो तो छोटे के छोटे रह गए और..

ये साले!...ऊपरवाले की मर्ज़ी से पूरे के पूरे लुच्चे बन गए"दोस्त झेंपता हुआ बोला


"अब यार ये चैट भी बडा थकाने वाला काम है"

"ऊपर से नीचे तक निचोड डालता है बन्दे को"


"वो कैसे?"


"यार!..जब कोई ऑनलाईन नहीं मिले तो नए शिकार की तलाश में एक के बाद एक....

'चैट रूम' खंगालते फिरो कि शायद कहीं कोई बात बन जाए"


"शिकार?"...

"कैसा शिकार?"...

"किसका शिकार?"मैने एक साथ कई सवाल दाग दिए


"अब ये तो पता नहीं कि कौन किसका शिकार करता है"

"हम उनका...या फिर वो हमारा?"


"जैसे ही 'चैट रूम'में कोई लडकी या उसकी परछाई दिखे भर सही...

दुनिया भर के कम्प्यूटरों पर बैठे हम मुसटण्डे....

बावले सांडो की तरह 'मैसेज' पे 'मैसेज' दागते हुए उस बेचारी का जीना हराम कर डालते हैँ"


"कई बार हमारी इन्ही हरकतों की वजह से दुम दबाते हुए'चैट रूम'छोडने पे मजबूर हो जाती हैँ बेचारी लडकियाँ"



"इसका मतलब पाँचो उंगलियाँ घी में हैँ आजकल?"


"बस सर के कढाई में जाने की कसर है"दोस्त कुछ बुझे-बुझे से स्वर में बोला


मेरे चेहरे पे सवालिया निशान देख दोस्त बोला

"अरे!...कई बार तो बडा ही बुरा हश्र होता है अपुन लोगों का जब...

पूरे आठ दिनों तक घंटो चैट करने करने के बाद पता चलता है कि...

"हम समझे कुछ और..वो निकले कुछ"


"मतलब?"

"अरे यार!...सीधी सी बाता है...इधर भी और उधर भी 'सेम टू सेम'...


समझ गए ना?"

मैने अपनी हँसी दबाते हुए धीमे से मुण्डी हिला दी


"अब पता नहीं इन नाकाबिल लडकों को जब कुछ बोलने का नहीं सूझेगा तो पूछ बैठेंगे कि...

"आज क्या बनाया है?"


"अरे!...तुम्हें टट्टू लेना है?"

"उसकी मर्ज़ी जो मर्ज़ी खाए पकाए "

"तुम्हें राशन डलवाना है तो बताओ"


"फिर उधर से क्या जवाब मिलता है?"


"उधर से जवाब में कम से कम 'शाही पनीर' या फिर'दाल मक्खनी'ही निकलता है"

"भले ही पिछले तीन दिनों से वही 'मूंग धुली'दाल...वो भी बिना तडके वाली"

"समझ गए ना?"

"या फिर दो दिन की बची हुई सूखी 'ब्रैड'खा रही होंगी तो यही कहेंगी कि...

"आई लाईक डामिनो पिज़्ज़ा"

"बस फोन घुमाओ और हाज़िर"


"बस यार!..बहुत हो गया"...

"अब चोंच बन्द"

"ज़्यादा बोलुंगा तो सभी नाराज़ हो जाएंगी"


"लेकिन सच तो सच ही रहेगा ना?"


मैँने हाँ में हाँ मिला दी


"एक ज़रूरी बात बताना तो मैँ भूल ही गया कि...

हर बन्दा या बन्दी कम से कम सात या फिर आठ 'आई डी'ज़रूर बनाता है अपनी"


"सात या आठ?"मैँ हैरान होता हुआ बोला

"हाँ भाई!..सात या आठ...कोई कोई तो पूरी दर्जन भर ही बना डालता है"


"वो किसलिए?"

"यार!...सिम्पल सी बात है...

"एक'मेन'वाली 'आई डी'तो रिश्तेदारों के लिए"...

"एक-दो आल्तू-फाल्तू लोगों के लिए"...

"दो-तीन 'टाईम पास'...


"अब यार!..इतनी 'आई डी'तो बनानी ही पडती है कि अगर कोई कभी-कभार बिदक भी जाए तो उसे...

नए नाम,...

नए शहर,...

नए प्रोफैशन और...

कम उम्र के जरिए फिर से लपका जा सके"


"सही फण्डा है ये तो"


"और हाँ!..जो जितना कमीना और लुच्चा होगा,वो अपनी 'आई डी' उतनी ही प्यारी बनाएगा मानों..

खुद को किसी नकाब या फिर 'मास्क' के पीछे छुपाने की कोशिश कर रहा हो"


"मतलब कि..जो जितना 'अनडीसेंट' होगा वो...

अपनी'आई डी'के आगे-पीछे ...

ऊपर-नीचे कहीं न कहीं 'डीसेंट'शब्द का इस्तेमाल ज़रूर करेगा ?"मैँ पूछ बैठा


"बिलकुल...अब सही पकड में आई तुम्हारे बात"


"और तो और...जिसे देख गली-मोहल्ले के बच्चे तक डरते हों....

वो अपनी'आई डी'के साथ 'क्यूट'या फिर'हैंडसम'शब्द लगाना कभी नहीं भूलता"..

"अपने आप ही समझ जाओ कि वो कितना 'क्यूट' और 'हैंडसम'होगा"


"अब अपने मुँह से कैसे कहूँ कि...ऐसा होगा या फिर वैसा होगा"


ये सब सुन मैंने कहा"मैँ तो चला"

"मेरे चेहरे पे शरारती मुस्कान थी"

उसने पूछा"कहाँ?"


"मैंने जवाब दिया"कम्प्यूटर खरीदने..और कहाँ"

"अब यार!कम्प्यूटर तो लेना ही पडेगा अब...

तुमने जो अपने साथ-साथ मेरे भी दिमाग का बंटाधार कर डाला है"


"अभी चलता हूँ ...

लौट के फिर पता नहीं कब मिलता हूँ"मैँ हँसता हुआ बोला


"बहुत काम करने हैँ"....

"कंप्यूटर खरीदना है"...

"नैट चालू करके 'मैसैंजर'डाउनलोड करना है"


"सात-आठ....नहीं-नहीं ...सात-आठ से मेरा क्या होगा?"


"पूरी एक दर्जन 'आई डी'बनाउंगा"यही बुदबुदाता हुआ मैँ अपने रस्ते हो लिया


"अब कुछ करो तो जी खोल के करो..

वैसे भी इसमें भला कौन सा'टैक्स'लग रहा है?"

"बस 'याहू'और 'गूगल'भाईयों का हाथ अपने सर पे रहना चाहिए"..


"देखें कौन किसका शिकार करता है?"



"समझा करो यार...चाहे खरबूजा छुरी पे गिरे या फिर छुरी खरबूजे पे...

कटना तो खरबूजे को ही पडता है"

यहाँ तो चित्त भी मेरी और पट्ट भी मेरी"


***राजीव तनेजा***
 
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