बहुत दूर गुलमोहर- शोभा रस्तोगी

जब कभी भी हम अपने समकालीन कथाकारों के बारे में सोचते हैं तो हमारे ज़हन में बिना किसी दुविधा के एक नाम शोभा रस्तोगी जी का भी आता है जो आज की तारीख में किसी परिचय का मोहताज नहीं है। लघुकथाओं के क्षेत्र में उन्होंने उल्लेखनीय काम किया है। ऐसे में जब पता चला कि इस बार जनवरी के पुस्तक मेले में उनकी एक नई किताब "बहुत दूर गुलमोहर" आ रही है तो उसे लेना तो बनता ही था। 

अब फुरसत के इन पलों में जब उनकी किताब को पढ़ने के लिए उठाया तो सुखद आश्चर्य के तहत पाया कि इस किताब में उनकी लघुकथाएँ नहीं बल्कि कुछ  छोटी कहानियाँ हैं। लिखते समय शोभा रस्तोगी जी धाराप्रवाह शैली में ग़ज़ब की किस्सागोई के साथ बहुत ही सहज ढंग से स्थानीय तथा प्रांतीय शब्दो  का इस्तेमाल करते हुए शब्दों से खुल कर खेलती हैं। शहरी, ग्रामीण तथा क़स्बाई संस्कृति के किरदार आमतौर पर उनकी कहानियों के मुख्य पात्र बनते हैं। 

उनकी कहानियों में एक तरफ पढ़े लिखे किरदार दिखाई देते हैं तो दूसरी तरफ वेश्या जैसा किरदार भी उनकी कहानी में मुख्य जगह बनाता है। किसी कहानी में अपने ही रिश्तेदारों द्वारा प्रताड़ित एक विधवा है जिसे साज़िशन डायन का तमगा दे उसके अपने ही घर से बेदखल कर दिया जाता है। किसी कहानी में घर की बड़ी बेटी को उसके ही अभिभावकों द्वारा महज़ नोट कमाने की मशीन समझ उसके अरमानों का गला घोंटने की बात है। 

इसी संकलन की एक कहानी टूटते रिश्तों की कहानी है कि किस तरह रिश्तों की अहमियत के बीच जब पैसा आड़े आने लगता है तो उनके बिखरने में देर नहीं लगती। इसी संकलन की एक  अन्य कहानी में ट्रेन के सफ़र के दौरान कामातुर अधेड़ और एक युवती की कहानी है कि किस तरह वह युवती उस अधेड़ को शर्मिंदा करते हुए ट्रेन से उतरने पर मजबूर कर देती है। 

इसी संकलन की एक कहानी इस बात को ले कर लिखी गयी है कि किस तरह खुद के उज्ज्वल भविष्य की चाह में कई बार गरीब माँ बाप अपनी किसी संतान को गोद तो देते हैं लेकिन फिर उसकी कोई पूछ खबर नहीं रखते। इसी संकलन की एक कहानी में इस बात का जिक्र है कि किस तरह बाल मन, घर और स्कूल की डाँट से त्रस्त हो आत्महत्या तक की बात सोचने लगता है। इसी संकलन की एक कहानी में घर वैभव सब कुछ के होते हुए भी अपने पति की उपेक्षा झेल रही एक विवाहिता, अवैध कहे जाने वाले संबंध की गर्त में उलझ तो जाती है लेकिन फिर तुरंत ही पछताते हुए लौटने का प्रयास करती है मगर क्या वो इसमें सफल हो पाती है?

इसी संकलन की एक अन्य कहानी ऐसी युवती की कहानी है जिसके पति को विवाह होते ही पुलिस एक ऐसे जुर्म में गिरफ्तार कर जेल में डाल देती है जिसमें उसे उम्रकैद होने की संभावना है। ऐसे में वक्त के साथ समझौता करते हुए बहु पूरे मनोयोग से लाख झिड़कियाँ सहती हुई भी अपनी सास की सेवा करती रहती है। ऐसे में सास भी उसे अपनी बेटी मान उससे स्नेह जताते हुए उसके अन्यत्र कहीं विवाह को हामी भर घरजमाई बनाने की मंशा जताती है मगर तभी उसका बेटा बाइज़्ज़त छूट कर घर लौट आता है।

अंत में एक सुझाव है कि...कुछ जगहों पर स्थानीय/ प्रांतीय भाषा के इस्तेमाल होने की वजह से कई बार पढ़ने में थोड़ी असुविधा भी हुई। बेहतर होगा कि इस पुस्तक के अगले  संस्करण तथा आने वाली पुस्तकों में ऐसे वाक्यों  के हिंदी अनुवाद भी साथ में दिए जाएँ। एक जगह और तथ्यात्मक ग़लती दिखी कि वहाँ पर "रामानंद सागर की मंदाकिनी" लिखा गया है जिसे "राजकपूर की मंदाकिनी" होना चाहिए। 

कुल 88 पृष्ठों की इस उम्दा क्वालिटी की संग्रणीय स्तर की किताब के पेपरबैक संस्करण को छापा है शिल्पायन बुक्स ने और इसका मूल्य रखा गया है ₹175/- जो मुझे कम पृष्ठ संख्या होने की वजह से थोड़ा ज़्यादा लगा। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

10 comments:

डॉ. जेन्नी शबनम said...

शोभा जी बहुत अच्छी लेखिका हैं. आपने उनकी पुस्तक की बहुत अच्छी समीक्षा की है. बधाई.

रेखा श्रीवास्तव said...

बहुत अच्छी समीक्षा लिखी ।

अजय कुमार झा said...

वाह राजीव भाई आपने आजकल पढ़ी हुई पुस्तक और उनकी समीक्षा लिखने का जो शानदार काम शुरू किया है उसे बदस्तूर जारी रखें हम जैसे पाठकों के लिए यह एक बोनस जैसा है बहुत-बहुत शुभकामनाएं आपको इसे जारी रखिए

राजीव तनेजा said...

शुक्रिया

राजीव तनेजा said...

शुक्रिया

राजीव तनेजा said...

शुक्रिया

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

सुन्दर समीक्षा।

दिगम्बर नासवा said...

वाह राजीव भाई ... अच्छी sameeeksha एक अच्छी पुस्तक की ... किताब की आत्मा लिख सी आपने ...

राजीव तनेजा said...

शुक्रिया

राजीव तनेजा said...

शुक्रिया

 
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