बुरा ना मानो...होली है-1

छोड़ गए बालम....

हाय अकेला छोड़ गए

rekha amitabh aish

कुछ चित्र

अच्छा...अच्छा...बहुत अच्छा

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चुनाव के इस माहौल में बिन माँगे धोती मिले
पहले माँगे से भी ना मिलता कभी था कच्छाpangebaj


अब तो हमारी हर माँग पर नेता जी बस इतना कहें
अच्छा...अच्छा...बहुत अच्छा
netagiri 

 

***राजीव तनेजा***

 

चित्र सौजन्य: पंगेबाज़,गूगल इमेज सर्च

नवभारत टाईम्स पर मेरी कविता-सौगंध राम की खाऊँ कैसे

नवभारत टाईम्स पर मेरी कविता-सौगंध राम की खाऊँ कैसे

 

नोट:कल नवभारत टाईम्स ऑनलाईन की सर्च में ऐसे ही अचानक जब मैँने अपना नाम टाईप किया तो इस कविता के लिंक के मुझे दर्शन हुए,तो सोचा कि क्यों ना इसे आप सभी के साथ शेयर किया जाए ताकि प्रसाद स्वरूप कुछ अतिरिक्त टिप्पणियाँ हासिल हो सकें। :-)

तत्कालीन घटनाओं पर आधारित मेरी यह कविता लगभग एक साल पहले नवभारत टाईम्स ऑनलाईन पर आई थी,जिसका मुझे तब पता नहीं चला क्योंकि नवभारत टाईम्स वाले अपनी व्यस्त्तता के चलते लेखकों को उनके लेख छपने की सूचना नहीं देते हैँ या फिर ऐसा करना वे उचित नहीं समझते।हाँ!..वैसे उनके पास इतना समय अवश्य होता है कि किसी लेख पर आपके द्वारा की गई टिप्पणी के छपने की सूचना आपको तुरंत ई मेल द्वारा भेज देते हैँ।

 


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सौगंध राम की खाऊं कैसे


3 Feb 2008, 1257 hrs IST 

राजीव तनेजा


करास्तानी कुछ बेशर्मों की
शर्मसार है पूरा इंडिया
अपने में मग्न बेखबर हो
वीणा तार झनकाऊँ कैसे


नव वर्ष की है पूर्व सन्ध्या
नाच नाच कमर मटकाऊँ कैसे


ह्रदयविदारक द्र्श्य देख बार बार
मीडिया की कमर थपथपाऊँ कैसे

झूठे नकली स्टिंग ऑप्रेशन देख
स्वच्छ मीडिया के गुण गाऊँ कैसे


बगल में कत्ल होता लोकतंत्र
सपुर्द ए खाक होती बेनज़ीर देख
दुखी हूँ भयभीत हूँ लाचार हूँ
जग जहाँ को बतलाऊँ कैसे


नन्दी ग्राम जलते देख
चीतकार करते मन को समझाऊँ कैसे
नतीजन...एकजुट हो
समर्थन में लाल झण्डे के हाथ उठाऊँ कैसे


करुणानिधी और बुद्धदेव की कथनी देख
तडपते दिल को समझाऊँ कैसे
राम सेतू रूपी आस्था को टूटता देख
गुजरात हिमाचल विजयी बिगुल बजाऊँ कैसे


अपने देश में अपनों से
अपनों को ही मिटता देख
मैँ खुश हो खुशी के गीत गाऊँ कैसे
हिन्दी हूँ मैँ वतन है हिन्दोस्ताँ मेरा
निष्ठा पे अपनी प्रश्न चिन्ह लगवाऊँ कैसे


लम्बा है सफर कठिन है डगर
अपनों के बीच स्वदेश में
सरेआम खुलेआम
सौगन्ध राम की खाऊँ कैसे


***राजीव तनेजा***

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"बिन माँगे मोती मिले"

***राजीव तनेजा***     

"बात सर के ऊपर से निकले जा रही थी...कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर!...माजरा क्या है?"
जिस बीवी को मैँ कभी फूटी आँख नहीं सुहाया,वो ही मुझ पर दिन पर दिन मेहरबान हुए जा रही थी। बहुत दिमाग लड़ाने के बाद भी इस सब का कोई  वाजिब कारण मुझे दिखाई नहीं दे रहा था|जो कल तक मुझे देख 'नाक-भों' सिकोडा करती थी,वही अब मौका देख जाने-अनजाने मुझसे लिपटने की कोशिश कर रही थी|मेरी पसन्द के पकवानों का तो मानो तांता लगा था|मेरी हर छोटी-बडी खुशी का ख्याल रखा जा रहा था|एक दिन आखिर सब राज़ खुल ही गया जब बीवी इठलाती हुई...बल खाती हुई चली आयी और बडे ही प्यार से बोली..."जी!...इस बार 'वैलैंटाईन' के मौके पर मुझे 'गोवा' घुमाने ले चलो|"

मेरा माथा तो पहले से ही सनका हुआ था।सो!...' वैलैंटाईन' के नाम से ही भड़क खडा हुआ|ऊपर से 'गोवा' जाने के नाम ने मानों आग में घी का काम किया।

{नोट:वैलैनटाईन के इस अवसर पर मैँने अपनी पुरानी कहानी "बिन माँगे मोती मिले" को आज के समय के हिसाब से संपादित किया है।उम्मीद है कि ये आपको पसन्द आएगी।}

 

"क्या बकवास लगा रखी है?"... 

"कोई काम-धाम है कि नहीं?"...

"अपनी औकात...मत भूल"...

"हिन्दुस्तानी है...हिन्दुस्तानी की तरह ही रह"

"पर इसमें!..आखिर गलत ही क्या है?"

"गलत?...अरे!...ये बता कि सही ही क्या है इसमें?"

"ये तो प्यार करने वालों का दिन है"...

"मनाने में आखिर हर्ज़ा ही क्या है?"

"अरे!...अगर मनाना ही है तो फिर...'लैला-मजनू'...'सस्सी-पुन्नू'... या फिर 'शीरही-फरहाद' को याद करते हुए उनके दिन मनाओ"

"ये क्या?...कि बिना सोचे-समझे सीधा मुँह उठाया और नकल कर डाली इन फिरंगियों की?"

बीवी कुछ ना बोली लेकिन मेरा ध्यान पुरानी यादों....पुरानी बातों की तरफ जाता जा रहा था।यही कोई दो-चार साल पुरानी ही तो बात थी जब 'वैलैंटाईन' आने वाला था और दिल में दुनिया भर की उमंगे जवाँ हुए जा रही थी कि पिछली बार तो मिस हो गया था लेकिन इस बार नहीं।अब की बार तो दिल की हर मुराद पूरी होकर रहेगी।कोई कसर बाकी नहीं रहने दूंगा लेकिन कुछ-कुछ डर सा भी लग रहा था कि अगर कहीं...भगवान' ना करे किसी भी तरह से बीवी को पता चल गया तो?"...

"मैँ तो कहीं का ना रहूँगा।...

मेरी हालत तो धोबी के कुत्ते जैसी हो जाएगी...ना घर का....ना घाट का"

"अरे यार!..किसी को कानों-कान भी खबर नहीं होगी"...

"तुम बस दिल खोल के खर्चा किए जाओ"....

"बाकी सब मेरे पे छोड़ दो"...

"एक से एक टॉप' की' आईटम' के दर्शन ना करवा दूँ तो मेरा भी नाम...'सूरमा भोपाली' नहीं"एक दोस्त बोला

अब दिन-रात...सोते-जागते...उठते-बैठते यही ख्वाब देखे जा रहा था मैँ कि सब की सब मुझ पर फिदा हैँ।दिल बस यही गाए जा रहा था कि...
"मैँ अकेला....मैँ अकेला...

मेरे चारों तरफ...हसीनों का मेला"

"हॉय!...हर तरफ बस लडकियाँ ही लडकियाँ...दूजा कोई नहीं"... 

"उफ!...कोई इधर से छेडे जा रही थी तो कोई...उधर से"

"अपनी बल्ले-बल्ले हो ही रही थी कि अचानक ऐसे लगा जैसे दिल के अरमाँ...आँसुओ में बह गए।सब के सब ख्वाब एक ही झटके में टूट के बिखर चुके थे।PICST3416 कुछ धर्म के ठेकेदार जो सरेआम...रेडियो'...टीवी चैनलों और... अखबारों' के जरिए अपना धमकी रूपी विज्ञापन दे रहे थे कि जिस किसी ने भी कुछ उलटा-सीधा करने की कोशिश की..उसकी वहीं पर मंतर पढवा...फेरे लगवा शादी करा दी जाएगी या फिर उसका मुँह काला कर'..गधे पे बिठा पूरे शहर का चक्कर कटवाया जाएगा" images

"गधे पे बिठाने की बात सुन दोस्त खुद ही अपना मुँह काला करता हुआ ऐसे गायब हुआ जैसे गधे के सर से सींग।और अपुन रह गए फिर...वैसे के वैसे...सिंगल के सिंगल....प्यासे के प्यासे लेकिन दिल ने हिम्मत ना हारी...खुद को जैसे-तैसे करके समझाया और बीवी'से ज़रूरी काम का बहाना बना..जा पहुँचा सीधा 'गोवा'।

'गोवा' माने!...जन्नत।यहाँ किसी का कोई डर नही...जैसे मर्ज़ी...वैसे घूमो-फिरो।जो मर्ज़ी करो...कोई देखने-सुनने वाला नही...कोई रोकने-टोकने वाला नहीं।सो!...मै भी पूरे रंग में रंग चुका था।इधर_ उधर...पूछताछ   करके पता लगाया कि 'सब कुछ दिखता है वाला बीच कहाँ है? जा पहुँचा!...सीधा वहीं।एक हाथ में बीयर की बोतल और दूसरे हाथ में गुलाब का फूल थामे मै अल्हड़ शराबी की तरह इस तलाश में कभी इधर डोल रहा था तो कभी उधर कि कहीं ना कहीं तो अपुन की चॉयस की मिलेगी ज़रूर।

लेकिन जिसे देखो...वही स्साली!....अपने लैवेल से नीचे की...याने के बिलो स्टैंडर्ड दिखाई दे रही थी। और मै था कि हाई क्लास से नीचे उतरने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।बस इसी चक्कर में सुबह से दोपहर और दोपहर से शाम होने को आई लेकिन जो अपुन की समझ में बैठती याने के इस दिल को जंचती...वो ऑलरैडी किसी का हाथ थामे नज़र आती।

हाय री!...फूटी किस्मत...सब की सब...पहले से ही बुक्कड थी।काम बनता ना देख निराश हो मैने ये एहम फैसला लिया कि..अब की बार कोई नखरा नहीं...जैसी भी मिलेगी...काम चला लूंगा।अपना किस्मत में जो होगा...मिल जाएगा...बेकार में हाथ-पैर मार के क्या फायदा?अभी ये सब सोच ही रहा था कि...देखा तो स्विम सूट पहने तीन नीग्रो लडकियाँ अपनी मर्ज़ी से खुशी-खुशी सबके साथ फोटू खिंचवा रही हैँ।

क्या गज़ब की ऑईटम थी रे बाप?

लार टपकाता मैँ भी लग गया लाईन में।थोडी-बहुत...टूटी-फूटी अंग्रेज़ी आती थी...सो!...उसी से काम चलाते हुए बात आगे बढाई और उनसे दोस्ती कर डाली।थोड़ी ही देर में मैँने उनको अगले दिन डेट पे चलने के लिए इनवाईट कर डाला।हैरानी की बात ये कि मेरी तमाम आशंकाओं के विपरीत वो तीनों झट से मान गयी।ये तो वही बात हुई कि... बिन माँगे मोती मिले...माँगे मिले ना भीख।

कहाँ एक तरफ तो मैँ तरसता फिर रहा था लेकिन कोई भाव देने को तैयार नहीं और कहाँ ये बिना कोई खास मेहनत किए ही अपने आप ही बे-भाव टपक पडी।शायद!...मेरी डैशिंग(धाँसू)पर्सनैलिटी का कमाल था ये।हे प्रभू!...तेरी लीला अपरम्पार है।थोडी काली हुई तो क्या हुआ? अपने'श्री कृष्ण महराज भी कौन सा गोरे थे?

"काले ही थे ना?"

सो!...मैने भी यही सोचा कि इस वैलैनटाईन के पावन अवसर पर इन तीनों के साथ रास-लीला मना ही ली जाए।अब!...मजबूरी का नाम  'महात्मा गाँधी' है तो...यही सही।खैर!...अगले दिन मिलने की जगह फिक्स हुई और वो अपने होटल चली गयीं।आफकोर्स!..रात का खाना मेरे साथ खाने के बाद।अब ये भी कोई पूछने वाली बात है कि नोट किसने खर्चा किए? समझदार हो!....खुद जान जाओ।

पूरी रात नींद नहीं आई।कभी इस करवट लेटता...तो कभी उस करवट।घडी-घडी...उठ कर घडी देखता कि अभी कितनी देर है सुबह होने में? अल्सुबह ही उठ गया था मैँ लेकिन इंतज़ार की घडियाँ तो जैसे खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी।खैर!..किसी तरीके से वो आ पहुँची।एक की तबियत कुछ ठीक नहीं थी  सो!...नाश्ता करने के बाद उसने साथ चलने से इनकार कर दिया।अच्छा हुआ!...स्साली ने खुद ही मना कर दिया वर्ना मुझे ही कोई ना कोई बहाना गढना पड़ता...चौखटा जो कुछ खास नहीं था उसका।

उसे होटल में आराम करने की कह हम तीनों चल दिए अपनी मंज़िल याने के बीच की ओर।वहाँ पहुँचते ही मेरी तो निकल पडी।दोनों की दोनो सीधा पानी में कूद पड़ी और इशारे कर-कर मुझे बुलाने लगी।मै भी झट से हो लिया उनके पीछे-पीछे मगर बुरा हो इस कम्भख्त मारी यादाश्त का...उतावलेपन के चक्कर में कास्ट्यूम लाना तो मैँ भूल ही गया था।

अब दिल उदास हो ही चला था कि अचानक उम्मीद की एक किरण दिखाई दी।देखा तो नज़दीक ही रंग-बिरंगे कास्ट्यूम बिक रहे थे।जा पहुँचा सीधा वहीं...शायद मेरा चेहरा पढ लिया था पट्ठे ने....तभी उसने हर एक पीस उल्टे-सीधे दाम बताए लेकिन मैँ कहाँ पीछे हटने वाला था?...जितने माँगे...पकडा दिए चुपचाप....और चारा भी क्या था मेरे पास?....अकेला होता तो थोड़ी-बहुत बॉरगेनिग वगैरा भी करता लेकिन यहाँ?...इनके सामने?....सौदेबाज़ी?....मतलब ही नहीं पैदा होता।लड़कियों के सामने ऐसी छिछोरी हरकते करने से अच्छा है कि बन्दा डूब के ही मर जाए।इसलिए मैँने चुप हो जाना ही बेहतर समझा।

तुरंत तौलिया लपेटा और फटाफट कपडे बदल छलांग लगा सीधा कूद पडा पानी में।बस!...यही एक छोटी सी बहुत बड़ी गलती हो गयी मुझसे।शायद!..ना चाहते हुए भी कुछ ज़्यादा उतावला हो उठा था मैँ। पर्..रर...र्रर्र'...की सी आवाज़ आई...देखा तो...एक तरफ से मेरी निक्कर जवाब दे चुकी थी।खैर!...मैने परवाह नहीं की क्योंकि ऐसे छोटे-मोटे हादसे तो अक्सर होते ही रहते थे अपुन के साथ।एक हाथ से निक्कर थाम मैँ बेफिक्र अन्दाज़ में जा पहुँचा सीधा उनके पास।

मज़े आने अभी शुरू ही हुए थे कि दूसरी तरफ से भी निक्कर ने साथ छोड दिया।मजबूरन!...मुझे उनसे कुछ दूर जाना पडा क्योंकि मैँ अच्छी तरह जानता था कि 'सावधानी हटी तो दुर्घटना घटी' लेकिन कोई गम नहीं...अभी कुछ दिन पहले ही तो मैँने हाई इंडैक्स का फ्रेम लैस चश्मा बनवाया था।सो!...दूर से भी सब कुछ साफ-साफ दिखाई दे रहा था।राज़ की बात तो ये कि ऐसी दिलचस्प चीज़े तो मैँ घुप्प अँधेरे में भी बिना किसी मुश्किल के ढूढ लूँ।फिर यहाँ तो ऊपरवाले की दया से खूब धूप खिली हुई थी।

अजीब हालत हो रही थी मेरी....बाहर से तो ठण्ड लग रही थी मुझे लेकिन अन्दर ही अन्दर गर्मी से मैँ परेशान था।बुरा हो इस कम्भख्त मारी निक्कर का....आज ही जवाब देना था इसे?....उफ!...दोनों हाथों से इसे थामे-थामे कितना थक चुका था मैँ?...जिस हाथ को ज़रा सा भी आराम देने की सोचूँ निक्कर फट से स्प्रिंग माफिक ऊपर उछले और झट से तैरने लगे।सो!...हाथ वापिस...वहीं का वहीं पुरानी पोज़ीशन पर।तसल्ली थी कि कुछ कर नहीं पा रहा तो क्या हुआ?...आँखें तो सिक ही रही हैँ ना कम से कम?मजबूरीवश सोचा कि चलो!...अभी इसी भर से ही काम चला लिया जाए...बाद की बाद में देखी जाएगी।

अभी ठीक से आँखे सेंक भी नहीं पाया था कि एक बावली को जाने क्या सूझी कि उसने बॉल से खेलते-खेलते अचानक उसे मेरी तरफ उछाल दिया।पता नहीं कहाँ ध्यान था मेरा?...जाने कैसे गल्ती हो गयी और मैँ पागलों की तरह निक्कर छोड़ दोनों हाथो से गेंद की तरफ लपक लिया।वही हुआ...जिसका अँदेशा था।फिर से 'पर...र्..र..र.र्र'...की चरमराती सी आवाज़....और फिर सब कुछ शांत।

काम खराब होना था सो!...हो चुका था।निक्कर' ने ऐन मौके पे बीच मंझधार के मुझे अकेला छोडते हुए अपने हाथ उर्फ दोनों पाँयचे खडे कर दिए थे।सारी की सारी सिलाई उधड चुकी थी।अब वो निक्कर कम स्कर्ट ज़्यादा दिखाई दे रही थी और वो भी मिनी(छोटी)वाली नही बल्कि माइक्रो(सूक्ष्म)वाली।

सही कहा है किसी नेक बन्दे ने कि मुसीबत कभी अकेले नही आती...आठ-दस को हमेशा साथ लाती है।दरअसल!..हुआ क्या कि अब इस निक्कर ऊप्स सॉरी स्कर्ट के नीचे तो अपुन ने कुछ पहना नहीं था..हमेशा की तरह।तो जैसे ही मैँ पानी में आगे बढा....स्साली!...खुद बा खुद तैर के ऊपर आ गयी और नीचे......

"अब!...अपने मुँह से कैसे कहूँ?"

"जवान पट्ठे हो!....खुद ही अन्दाज़ा लगा लो मेरी हालत का" 

"यूँ तो मैँ पक्का बेशर्म हूँ  लेकिन यहाँ?...खुले आम?"....

"बाप..रे...बाप"
"अरे यार!...हिन्दुस्तानी हूँ मैँ...कोई काली या गोरी चमड़ी वाला फिरंगी नहीं कि आव देखूँ ना ताव और झट से बीच बज़ार ही कर डालूँ एक....दो...तीन।

अब तरसती निगाहों से सिर्फ और सिर्फ ताकते रहने के अलावा कोई और चारा भी तो न था मेरे पास।अभी सोच ही रहा था कि...क्या करूँ?...और..क्या ना करूँ? कि अचानक शरारती मुस्कान चेहरे पे लिए वो दोनों मेरी तरफ बढी।... 

ओह!...कहीँ मेरी हालत का अन्दाज़ा तो नही हो गया था उन्हें?"...

उन्हें अपनी तरफ बढता देख मैँ कुछ घबराया...कुछ शरमाया...कुछ सकुचाया और फिर बिना सोचे समझे भाग लिया सीधा किनारे की तरफ।कुछ होश नहीं कि क्या दिखाई दे रहा है और क्या नहीं।बाहर पहुँचते ही झटका लगा।

देखा तो!...कपडे गायब।कोई हराम का  *&&ं%$#$%&   उन पर हाथ साफ कर चुका था।पीछे मुड़ के देखा तो दोनों हँसती-खिलखिलाती हुई मेरी ही तरफ चली आ रही थी।उनकी परवाह न करता हुआ मैँ दोनों हाथों से अपनी निक्कर थामे सरपट भाग लिया सीधा होटल की ओर।मुसीबतो का खेल अभी खत्म कहाँ हुआ था?पहुँचते ही एक झटका और लगा।वो 'कल्लो' मेरे सामान पे झाडू फेर चुकी थी।सब कुछ बिखरा-बिखरा सा था....
मेरा 'कैश'....
मेरे 'कपडे-लत्ते'...
मेरा 'क्रैडिट कार्ड'...
मेरा 'ए-टी-एम कार्ड'..

कुछ भी तो नहीं बचा था।सब का सब लुट चुका था।उन दोनों का नम्बर ट्राई किया तो मोबाईल स्विचड ऑफ की आवाज़ मानों मेरा मुँह चिढा रही थी।ऐसा लग रहा था जैसे तीनों की मिलीभगत थी इसमें।दिल तो कर रहा था कि अभी के अभी निकालूँ कहीं से रिवाल्वर और दाग दूँ पूरी की पूरी छै इनके सीने में।

मैँ लुटा-पिटा चेहरा लिए उस घडी को कोस रहा था जब मुझे वैलैनटाईन मनाने की सूझी।बड़ी मुश्किल  से होटल वालो से पीछ छुडा मैँ भरे मन और बोझिल दिल से वापिस लौट रहा था।

अगर मै ऐश नहीं कर सकता तो और भला कोई क्यूँ करे?

सही हैँ!...ये धर्म के ठेकेदार।ये वैलैंटाईन-शैलेंटाईन' अपने देश के लिए नहीं बने हैँ।

ढकोसला है ढकोसला...सब का सब।

देखते ही देखते मैँ भी पेंट का डिब्बा और ब्रश हाथ में लिए प्यार करने वालों का मुँह काला करने को बेताब भीड में शामिल था। _41416508_bajrang203ap

***राजीव तनेजा***

मेरी सातवीं कहानी नवभारत टाईम्स पर

पहली कहानी- बताएँ तुझे कैसे होता है बच्चा

दूसरी कहानी- बस बन गया डाक्टर

तीसरी कहानी- नामर्द हूँ,पर मर्द से बेहतर हूँ

चौथी कहानी- बाबा की माया

पाँचवी कहानी- व्यथा-झोलाछाप डॉक्टर की

छटी कहानी-काश एक बार फिर मिल जाए सैंटा

सातवीं कहानी-थमा दो गर मुझे सत्ता

 

नोट: इस कहानी के एक हिस्से को लिखने के लिए मुझे 'बामुलाहिज़ा' वाले श्री क्रितिश भट्ट जी के नैनो वाले कार्टूनों से प्रेरणा मिली।मैँ उनका तहेदिल से शुक्रगुज़ार हूँ कि उन्होंने मुझे अपने कार्टूनों को तथा आईडिए को इस्तेमाल करने की इज़ाज़त दी।

Printed from


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थमा दो गर मुझे सत्ता


2 Feb 2009, 1259 hrs IST,नवभारतटाइम्स.कॉम 

राजीव तनेजा

' ओफ्फो ! पता नहीं , कब अक्ल आएगी तुम्हें ? चलते वक्त देख तो लिया करो कि पैर कहां पड़ रहे हैं और नज़र कहां ?' बीवी चिल्लाई , ' कुछ तो शर्म करो ! दिखाई नहीं देता कि तुम्हारी बच्ची की उम्र की है। किसी को तो बख्श दिया करो कम से कम। तुम्हें तो बस लड़की दिखनी चाहिए , भले ही जैसी भी हो। क्यों , है ना ?

' लड़की दिखी नहीं कि बस , चल दिए नाक की सीध में मुंह उठाकर। उसने मुस्कुरा कर क्या देख लिया , हो गए झटाक से फ्लैट। पहले नज़र फिसला करती थी जनाब की , अब तो खुद ही फिसलने लगे हैं। माशा अल्लाह , क्या तरक्की हो रही है ! आ गए मज़े ? गिर पड़े ना धड़ाम से !

' अब उसी को बुला लेना यह गोबर से लिपे - पुते जूते साफ करने के लिए ,' बीवी बोले चली जा रही थी , जैसे आज रुकने का नाम न लेना चाहती हो। ' मैं पूछता हूं कि इन गाय - भैंसों को मैंने कहा है कि यूं रास्ते में गोबर करती फिरे ?' मुझे भी ताव आ गया , अच्छी - भली डेरियां बसा कर दी हैं सरकार ने। अपना आराम से दुहो और लोड कर ले आओ दूध शहर में। लेकिन नहीं , लोगों को कीड़ा जो काटता है कि ' प्यॉर ' माल होना चाहिए।

खाक मिलता है प्योर ! पता है , कितना पानी पहले से मौजूद रहता है इन दूधियों के डोल्लू में ? पब्लिक को तो बस थन से धार निकलती दिखाई देनी चाहिए। डिरेक्ट फ्रॉम द सोर्स। भले ही सुबह - शाम इंजेक्शन ठुकवा - ठुकवा कर क्यों न भैंस बेचारी का पिछवाड़ा सूजा पड़ा हो। इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। पता नहीं , अपनी मेनका कहां गायब हो जाती है ऐसे वक्त ?

शायद उसे भी डिरेक्ट फ्रॉम द सोर्स की आदत पड़ी हो। बीवी उसकी भद्द पीटती हुई बोली। इंसान भी ना , पैसों के लालच में कितना अंधा हो गया है। पता नहीं क्या - क्या ( स्टेरॉयड ) मिलाते हैं चारे में दूध बढ़ाने के वास्ते। कोई शराफत नाम की चीज़ ही नहीं बची है दुनिया में। दूध तो बच्चों को पीना होता है , उनके भविष्य के साथ तो खिलवाड़ न करें कम से कम , बीवी तमक कर बोली।

बस , तुम्हें कोई टॉपिक मिलना चाहिए , हो जाती हो शुरू। अब , गाय - भैंस को क्या पता कि कहां गोबर करना है और कहां नहीं। बस हूक उठी और उन्हें पूंछ उठा देनी है। तुम गाय - भैंस का रोना रो रहे हो , सामने देखो दीवार कैसी सनी पड़ी है , बीवी इशारा करती हुई बोली।

साले ! न दिन देखते हैं न रात , जहां खाली दीवार देखी कि बेशर्मों की तरह पैंट की ज़िप पर हाथ गया , मैंने हां में हां मिलाई। कोई कंट्रोल - शंट्रोल भी होता है कि नहीं ? बीवी खुंदक भरे स्वर में बोली। लाख लिखवा दो कि यहां पेशाब करना मना है , लेकिन बेवकूफ वहीं खड़े होकर शुरू हो जाएंगे। मैं भी शुरू हो गया।

औरत - मर्द में कोई फर्क ही नहीं करते। यह भी नहीं देखते कि कौन गुज़र रहा है पास से। शर्म - वर्म तो बेच खाई है सबने , मुंह बनाते हुए बीवी बोली। इन्होंने तो पूरे देश को खुले शौचालय में तब्दील कर रखा है। किसी और देश में कर के दिखाएं ऐसा , तो पता चले , मैं भी भड़कता हुआ बोला। काट कर नहीं रख देगा वहां का कानून , बीवी हंसते हुए बोली। बिना डंडे के कोई नहीं सुधरता है। इन्हें बस डंडे का डर दिखे , तभी सीधे होंगे। मेरा पारा भी लाल हो चला था। तुम भी कौन सा कम हो ? तुम भी तो कई बार ...

अरे ! तब तो मेरी तबियत ठीक नहीं थी। मैं झेंपता हुआ बोला। एक - आध दिन की बात हो तो अलग है , यहां तो रोज़ की आदत बना रखी है इन्होंने। ऊपर से ज़ुबान पर गालियां ऐसी छाई रहती है कि बस पूछो मत। छोटी - मोटी गाली देना तो शान के खिलाफ समझते हैं ये लोग। बीवी का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था। मां - बहन की गाली तो आजकल प्रसाद स्वरूप देने लगे हैं लोग , मैं हंसता हुआ बोला।

रहने दो , तुम भी कुछ कम नहीं हो , बीवी ताना मारते हुए बोली। तुम तो हर चीज़ में मुझे ही घसीट लिया करो। क्या , मैं कहता - फिरता हूं लोगों से कि यूं सड़क पर कूड़ा फेंकते फिरो या थूक - थूक कर पूरी दिल्ली को यूं थूकदान बना डालो ? अपने ऊपर आरोप लगता देख मेरा भड़कना जायज़ था।

क्या मैं कहता फिरता हूं , इन पैसों के लालची गुटखा - खैनी वालों से कि बच्चे - बच्चे को चस्का लगवाकर नशेड़ी बना दो ? मेरा बस चले तो सब सालों को जेल की चक्की पीसने पर मजबूर कर दूं। दूसरों पर कीचड़ उछालना कितना आसान है ? तुम्हारे हाथ में पावर हो तो तुम ही क्या उखाड़ लोगे ?

मैं ? हां तुम ! बीवी मखौल उड़ाते हुए बोली। अरे , मैं तो दो दिन में सुधार कर रख दूं पूरी दिल्ली को। एक बार मुझे सत्ता थमा कर तो देखो , उम्मीदों पर खरा न उतरूं तो कहना। यूं ! चुटकी में। हां ! चुटकी में दिल्ली का चौखटा ठीक न कर दूं तो मेरा भी नाम राजीव नहीं। ये , इन्हें तो मैं एक ही दिन में सिखा दूं कि दिल्ली में कैसे रहा जाता है। कैसे सड़कों पर चला जाता है ? कैसे सड़कों पर थूका जाता है ? कैसे कचरा फैलाकर दिलवालों की दिल्ली का बेड़ा गर्क करते हैं ये लोग ? मैं बोलता चला गया।

कैसे सरेआम कानूनों की धज्जियां उड़ाई जाती हैं ? कैसे खुलेआम सिगरेट - बीड़ी के कश लगाकर सबकी नाक में दम किया जाता है ? मैं आखिरी कश लगाकर सिगार पैर से मसलते हुए बोला। सालों को नाम के लिए भी ट्रैफिक सेंस नहीं है। न पैदल चलने की अक्ल है , ना गाड़ी - घोड़ा दौड़ाने की। बस मुंह उठाते हैं और चल देते हैं सीधा नाक की सीध में। भले ही कोई पीछे सौ - सौ गाली बकता फिरे , इन्हें कोई मतलब नहीं। कोई सरोकार नहीं कि पीछे , कोई इनकी गाड़ी के नीचे आते - आते बचा।

या ये खुद ही किसी गाड़ी से कुचले जाते अभी , बीवी ने बात पूरी की। ऊपर से ये पैदल चलने वाले ... उफ ! तौबा। पता नहीं , कौन सी दुनिया में खोए रहते हैं ? ये तो ग्यारह नम्बर की बस पर सवार होते हैं , यानी कि पैदल चलते हैं और गलती तो हमेशा बड़ी गाड़ी की ही मानी जाती है। मैं व्यंग्यपूर्वक चिढ़ता हुआ बोला। उल्टा , मुआवज़ा और ले मरते हैं साले। बीवी का पारा भी हाई हो चला था।

अरे ! हाथ में सत्ता आ जाए एक बार , इन्हें तो दिल्ली का रुख करना तक भुलवा दूं। हुंह ! थोथा चना , बाजे घना। क्या ? हां , क्या कर लोगे तुम ? बीवी मानो मुझे जोश दिलाने पर तुली थी। मेरा बस चले तो सबसे पहले इन फाइनैंस कम्पनियों को ही ताला लगवा दूं , जहां न बंदा देखते हैं , न बंदे की जात। बस फाइल बनवाओ और ले जाओ। साले , पांच - पांच हज़ार में स्प्लैंडर बांटते फिरते हैं कि ले बेटा , मौज कर। बाकी के देते रहियो किश्तों में। नहीं दे पाएगा तो फिक्र नॉट कर। हमने गुंडे - पहलवान भी पाल रखे हैं।

उफ ! रिकवरी एजंट पाले हुए हैं इसी खातिर। पता भी है कुछ ? अब तो नया स्यापा खड़ा होनेवाला है। बीवी तपाक से बोल पड़ी। वह क्या ? इस टाटा की ' नैनो ' ने तो और नाक में दम कर दिया है। वह कैसे ? इतना अच्छा काम कर रहा है और ऊपर से दुनिया की सबसे सस्ती कार। वही तो ! बीवी के चेहरे पर असमंजस का भाव था। जिसे देखो , वही ' नैनो ' पर सवार दिखाई देगा। फिर बुरा क्या है इसमें ?

भला क्या फर्क रह जाएगा अमीर और गरीब में ? बीवी अपनी मंहगी साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए बोली , दोनों एक ही गाड़ी में घूमते नज़र आएंगे। कोई स्टेटस भी होता है कि नहीं ? काम वाली बाइयां तक घरों में काम करने गाड़ी से ही आया करेंगी , मैं मुस्कुराता हुआ बोला। नए बहाने मिल जाएंगे उन्हें कामचोरी के , कभी टायर पंक्चर तो कभी ट्रैफिक जाम। बीवी बुरा सा मुंह बनाते हुए बोली।

ऊपर से पुलिस का चलान हो गया तो समझो दो दिन की छुट्टी , मैंने मन ही मन सोचा। अभी तो हर किसी को नया - नया चाव चढ़ रहा है ना ' नैनो ' का। पता तब चलेगा बच्चू , जब पार्किंग की समस्या सर चढ़कर बोलेगी , बीवी मानो भविष्य की तरफ ताकती हुई बोली। अभी से बुरे हाल हैं , आगे रखने के लिए जगह तक नहीं मिलेगी। इस मामले में ये जापान वाले सही हैं , पूरी दुनिया को गाड़ियों पर सवार कर दिया और खुद घूमते हैं साइकिल पर।

ऊपर से तुर्रा ये कि सेहत ठीक रहती है। साले , कंजूस कहीं के ! मैं बीच में ही बोल पड़ा। सुना है ! वहां बन्दे को गाड़ी तब मिलती है जब वह पक्का सबूत दे कि इसे रखेगा कहां। पर , बीवी के चेहरे पर प्रश्नवाचक चिन्ह मंडरा रहा था। और नहीं तो क्या ? मैं उसकी जिज्ञासा शांत करता हुआ बोला। अभी नौकरियों में रिजर्वेशन मांगा जा रहा है। आनेवाले समय में पार्किंग कोटा फिक्स करने की डिमांड उठने लगे तो कोई ताज्जुब नहीं , बीवी बोली।

ताजुब्ब नहीं कि कल को कोई जेबों में हाथ डाले मज़े से यूं ही टहलता - टहलता शो - रूम जा पहुंचे और जेब से दो तीन बंडल मेज़ पर रखते हुए बोले , दो नैनो देना डीलक्स वाली। जय शनिदेव , जय बजरंग बली का हुंकारा लगाते भिखारी तक नैनो में भीख मांगते नज़र आएंगे। आनेवाले समय का मंज़र मेरी आंखो के सामने नाचने लगा। कल को नज़र बट्टू के नाम पर दफ्तर - दुकानों में नींबू - मिर्च टांगने वाले भी नैनो पर आने लग जाए तो कोई अजीबोगरीब बात न होगी।

बस ! स्टाइल कुछ यूं होगा। गले में सोने की चेन , माथे पर गॉगल , धन्धे का नाम मॉडीफाई करके ' लैमन चिली ' हो जाएगा। बीवी मज़ाक में बोली। मुझे तो अपने पप्पू की चिंता हो रही है , बीवी परेशान होकर बोली। वह क्यों ? मेरे चेहरे पर सवाल था। कल को वह भी खिलौनों से आज़िज आकर नैनो की ही डिमांड न करने लगे , मेरी तरफ देख बीवी बोली।

कोई बड़ी बात नहीं। मैंने जवाब दिया। कहीं बच्चों के लिए सस्ते पेट्रोल की डिमांड भी न उठने लगे। उफ ! क्या ये नैनो का पंगा लेकर बैठ गए ? जब आएगी , तब की तब देखी जाएगी। तुम तो बात कर रहे थे दिल्ली सुधारने की , क्या हुआ उसका ? बस ! बातों - बातों में ही हवा कर दी बात। अरे , हवा कहां ? पहले मौका मिले तो सही। सिखा दूंगा इन्हें कि कैसे थूका जाता है खुलेआम। वहीं थूके हुए को चटवा न दिया , तो मेरा भी नाम राजीव नहीं।

अपने घरों में , दफ्तरों में थूक कर देखो तब पता चलेगा। खुद से ही घिन न आ जाए तो कहना। बता दूंगा इन ठेकेदारों को कि कैसे लूटा जाता है सरकारी माल। हथकड़ियां न लगवा दी तो कहना। डंडा चलेगा जब मेरा तो बड़े - बड़े सीधे हो जाएंगे। किसे सुधारोगे तुम ? सारा ढांचा ही बिगड़ा पड़ा है दिल्ली का। अब , इन रिक्शे को ही लो , रोज़ तो जब्त करते - फिरते हैं एमसीडी वाले इसे।

मगर , अगले दिन फिर सड़क पर नाचते नज़र आते हैं ये। रिक्शेवालों की मनमानी से त्रस्त एक आम भारतीय नारी की आवाज़ थी यह। सुना है , पूरा माफिया होता है इस गोरखधन्धे के पीछे। रजिस्ट्रेशन के नाम पर एक - एक पर्ची पर बीस - बीस रिक्शे को रजिस्टर करवा रखे हैं सालों ने। अरे , लाखों का खेल है ये। एक - एक के पास हज़ार - हज़ार रिक्शे हैं।

बीस रुपए प्रति रिक्शे के हिसाब से लगा लो कि कितने का गेम बजता होगा हर रोज़। लेकिन , जो हो गया सो हो गया। सारी माफियागिरी धरी की धरी रह जाएगी , जब मेरा कटर चलेगा। कटर चलेगा ? बीवी चौंकती हुई पूछी। हां , कटर। कटर चलवा दूंगा , इन अवैध रिक्शों पर। ये नहीं कि जब्त कर गोदाम में फिकवा दूं सड़ने के लिए , ताकि कुछ ले - देकर सड़कों पर फिर से वे उछल - कूद मचाते फिरें।

एक ही बार में टंटा खत्म कर दूंगा इनका। न रहेगा बांस और न ही बजने दूंगा इनकी बांसुरी। काट के इतने टुकड़े करवा दूंगा कि कबाड़ी भी दो रुपए किलो से ऊपर का भाव न लगाए। यह सब तो ठीक है , लेकिन इन पैदल चलने वालों का क्या करोगे ? कैसे सिखाओगे इन्हें तमीज़ से चलना।

लठैत पहलवानों की भर्ती करूंगा , इन साले सड़क पार करने वालों के लिए। इधर गलत तरीके से सड़क पार की कि उधर लट्ठ बरसा , दे दनादन। पट्ठों को हथकड़ी लगवाकर वहीं रेलिंग से ही बंधवा न दिया तो मेरा नाम भी राजीव नहीं। फोटो अलग से खिचवाई जाएगी ऐसे नमूनों की , ताकि जान ले पूरा इंडिया।

पूरा इंडिया ? फिर बीवी के चेहरे पर सवाल था। हां , पूरा इंडिया। देख लो , जान लो कि क्या हश्र होने जा रहा है अब बददिमागों का। इससे फायदा ? फायदा तो बहुत है। पड़ेगी एक को , लगेगी सबको। सभी सीधे हो जाएंगे। बहुत देख लिया आराम से समझा - समझाकर। हम लातों के भूत बातों से भला कब माने हैं , जो अब मानेंगे ?

बिल्कुल , यही इलाज है इनका। डंडा सर पर हो तो बड़े - बड़े सीधे हो जाते हैं। यहां न डर है और न ही कानून की परवाह है किसी को। यहां साला जुर्म आज करो , सज़ा का कोई पता नहीं होता कि कब मिले ? मिले या न भी मिले , कोई गारंटी नहीं। सालों तक लंबे केस चलते हैं , किसी को सज़ा होते देखा है ? नहीं न ? इसी से तो बेड़ा गर्क हुए जा रहा है , पूरे हिन्दुस्तान का।

आम जनता भी तो इन्हीं नेताओं से सबक लेती है। देखती है कि जब इनका बाल भी बांका नहीं हो पा रहा , तो अपना क्या बिगड़ेगा। बीवी भी मेरे रंग में रंग चुकी थी। मुझे तो अरब देशों का कानून बहुत पसन्द है जी। जैसा जुर्म , वैसी सज़ा। चोरों के हाथ काट दिए जाते हैं। बीवी की आवाज़ में आवेग था। नशे के सौदागरों को पूरी ज़िन्दगी जेलों में सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है और बलात्कारियों को ... मैंने बात अधूरी छोड़ दी।

पता नहीं , क्या मिलता है लोगों को अच्छी खासी चल रही लाइफ को बिगाड़ कर। किसकी बात कर रही हो ? अब प्रश्न मेरे चेहरे पर नजर आ रहा था। बेड़ा गर्क करके रख दिया है , इन मसाज पार्लरों ने। मेरी बात सुने बिना ही बीवी बोलती चली गई। दिन पर दिन ये कुकुरमुत्तों की तरह गली - गली उगते जा रहे हैं। कोई गली , कोई मोहल्ला तक अछूता नहीं है इनसे। पता नहीं , कहां से ये फिरंगी कल्चर इंडिया का नाश करने पर तुला है।

पता नहीं , क्या आग लगी है आज के नौजवानों को ? बीवी का आवेश बढ़ता ही जा रहा था। पार्लर की आड़ में सारे उल्टे काम। मेरे हाथ में पावर आ जाए तो पुलिस का पहरा न बिठवा दूं , इन मसाज पार्लरों पर। एक - एक की ऐसी ठुकाई करवाऊंगा कि आनेवाली सात नस्लें तक जान जाएंगी कि मसाज कैसे करवाई जाती है।

मेरा बस चले तो सबसे पहले यह सब लेटेस्ट मोबाइल बन्द करवाऊंगी। बड़े गंदे - गंदे एमएमएस बनाने का चलन चल निकला है आजकल। हर बंदा मोबाइल में कुछ न कुछ पुट्ठा सामान लिए फिरता है। मैंने बात पूरी की। जिसे देखो चोरी से किसी न किसी लड़की की छिपाकर फोटो खींच रहा होता है। सही है , मैंने सहमति जता दी। तुम कौन सा कम हो , तुमने भी तो उस दिन ... बीवी आंखे तरेर मुझसे बोली।

वो ? वो तो बस ! ऐसे ही मज़ाक - मज़ाक में ... मैं झेंपता हुआ बोला। बस ऐसे ही ? सभी मज़ाक - मज़ाक में ही खींच लिया करते हैं। यह तो सोचो कि कोई इसी तरह तुम्हारी भी मां - बहन या बीवी एक कर रहा होगा। बीवी भड़कते हुए बोली। ये साले , सभी मर्द एक से होते हैं। लड़की देखी नहीं कि लार टपकना शुरू। काबू में नहीं रख पाते अपने जज़्बात। अरे ! तुम भी कौन सी बात लेकर बैठ गई ?

अगर सामने से थोड़ी - बहुत लिफ्ट मिलती है , तभी हम मर्दों की हिम्मत होती है। वर्ना हमारे जैसा दब्बू , पूरे जहां में कोई नहीं मिलेगा। मैं बिगड़ी बात संभालता हुआ बोला। तुम भी न , उल्टे - सीधे टॉपिक बीच में छोड़कर असली बात ही गोल कर देती हो। बात हो रही थी दिल्ली सुधारने की। तो सुनो , सब साले कामचोर बाबुओं को सस्पेंड कर बता दूंगा कि कैसे बिना ड्यूटी पर आए हाज़री लगवाई जाती है।

वो सब तो ठीक है , पर इन नेताओं का क्या करोगे ? जीना हराम कर रखा है , इन्होंने आम पब्लिक का। इन्हें तो बस पैसेवाले ही नज़र आते हैं। इनकी तो मैं ... बिना बोले मैंने बात अधूरी छोड़ दी। जेल की रोटी खाने और चक्की पीसने पर मजबूर ना कर दिया तो कहना। सब सीख जाएंगे कि कैसे बड़ी - बड़ी मॉलों को लाइसेंस देकर , छोटे दुकानदारों से जीने का लाइसेंस ही छीन लिया जाता है।

कैसे बडे़ - बडे़ लाल , हरे , नीले स्टोरों को कोठियों में खोलने की इज़ाज़त देकर आम आदमी की रोज़ी - रोटी पर लात मारी जाती है। सिखा दूंगा कि कैसे गिने - चुने निशानों का डिमॉलिशन कर पूरी पैसे वाली जमात को बचाया जाता है। सिखा दूंगा कि कैसे अपने धूल फांकते उजाड़ बंजर खेतों पर सरकारी पैसे से हॉट बज़ार या सुभाष चन्द्र बोस स्मारक बनवाकर अपनी तिजोरियां भरी जाती हैं।

कैसे सरकारी गोपनीय दस्तावेजों का नाजायज़ इस्तेमाल कर गरीब किसानों से कौड़ियों का दाम लेकर उसी जमीन से बाद में लाखों करोडों नहीं , बल्कि अरबों रुपए कमाए जाते हैं। कैसे अपने नेम - फेम की खातिर मेट्रो का रूट तब्दील करवाया जाता है। बीवी भी पिल पड़ी। कैसे सौ के ऊपर , सीधा पांच सौ का टैक्स लगाकर ट्रैफिक चलान की फीस को बढ़ाया जाता है। कैसे सरकारी जमीन पर रातों - रात झुग्गी बस्तियां बसवा कर अपना वोट बैंक मज़बूत किया जाता है।

कैसे सरकारी ड्रॉ में मलाईदार प्लॉट अपनों के नाम किए जाते हैं। बीवी का गुस्सा कम होने को ही नहीं था। कैसे पैसे ले लेकर कुक्करमुत्ते की भांति उगने वाली जाली फ्रॉड कंपनियों को राज्य में काम करने की छूट दी जाती है। कैसे प्राइवंट बिजली कम्पनी को नए तेज़ भागते मीटर लगाने की छूट देकर करोड़ों के वारे - न्यारे किए जाते हैं। कैसे ऑटो , टैक्सी के इलेक्ट्रॉनिक मीटरों के जरिए पब्लिक की जेब से पैसा खींचा जा सकता है , बिना रुके मैं भी बोलता रहा।

इतना सबकुछ हो रहा है , लेकिन पब्लिक कुछ कहती ही नहीं। अरे ! पिद्दू पब्लिक है , ये कुछ नहीं जानती है। हमारे यहां डर नहीं है , न किसी को कानून का और न ही समाज का डर है। मौका मिले कि हर बंदा कानून तोड़ने से परहेज नहीं करता। मज़ा आता है , शेखी दिखाई देती है इसमें। भीड़ में सबसे अलग , सबसे जुदा होने की चाहत होती होगी शायद। अब ये ट्रैफिक पुलिस वालों का आलम तो देखो - हर एंट्री के नाम पर जहां पचास का पत्ता झटकते थे , टैम्पो वालों से सरकारी चालान बढ़ने के कारण इन्होंने भी अपना रेट बढ़ा दिया है।

ऊपर से सीनाजोरी देखो इनकी , कहते हैं कि हम यहां क्या मुफ्त में ... मेरा बस चले तो इन सभी रिश्वतखोरों के एमएमएस बनवा कर इनके दूध धुले चेहरों का लाइव टेलीकास्ट करवा दूं। खुदा समझते हैं अपने आपको। जिसे देखो ! वही दिल्ली की कब्र खोदने पर उतारू हैं।

अब इन ब्लूलाइन वालों को ही लो , बंदे की जान की कोई कीमत ही नहीं है इनकी नज़र में। जब चाहे रौंद डालते हैं। ब्लूलाइन वालों की तो मैं ... । सुना है , सब बड़े नेताओ की करनी है। इसीलिए लाख इनके खिलाफ आवाज़ें उठने के बावजूद भी बसें रौंदे चली जा रही हैं पब्लिक को। बस एक बार मेरे हाथ में ताकत आ जाए। सारे परमिट कैंसल करवा के दिल्ली से बाहर फिंकवा दूंगा कि चलो अब यूपी , बिहार। अरे ! तब तो बहुत दिक्कत हो जाएगी। इतनी भीड़ , इतनी पब्लिक ... । बाप रे !

होती रहे मेरी बला से। कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी ज़रूरी होता है। इतना भी नहीं जानती ? तुम तो बुद्धू हो। अरे ! एक ही झटके में नहीं साफ होगा पत्ता इन ब्लूलाइनों का , बल्कि सिलसिलेवार ढंग से कुछ ही महीनों में सबकी बत्ती गुल कर दूंगा दिल्ली से।

तब तक पब्लिक क्या घर बैठी रहेगी ? अरी बेवकूफ ! कॉर्पोरट सिस्टम लागू करूंगा मुम्बई के माफिक। एक ही कम्पनी की दो - दो हज़ार बसें होंगी कम से कम। पब्लिक भी खुश , कम्पनी भी खुश और लगे हाथ हम भी खुश। अब कौन हर बस से अलग - अलग मंथली इकट्ठी करता फिरे ? हमें तो बस एक मुश्त रकम मिल जाए पूरे साल भर की तो ही जा के चैन पड़े।

एक बार में ही पूरे मिल जाए तो कहीं ढंग से ठिकाने भी लगे। छोटे - मोटे बंडल तो वैसे ही बियर बार - बालाओं को ही खुश करने में साफ हो जाएंगे। मेरे चेहरे पर वासना चमक उठी थी। ये क्या कि खेत का खेत जुता , फसल की फसल कटी और अनाज कब चूहे ले गए पता भी नहीं चला। मैं दिखाउंगा पूरी दिल्ली को कि कैसे खेला जाता है खेल।

कैसे सबकी नज़रें बचाकर लाखों करोड़ों के वारे - न्यारे किए जाते हैं। मेरी आंखों की शैतानी चमक सारी कहानी खुद बयां कर रही थी। कैसे हर छोटी - बड़ी ठेकेदारी में अपना हिस्सा फिट किया जाता है। सही कह रहे हो , बीवी की आंखों में भी लालच का परचम लहरा चुका था। कैसे पुलिस और ट्रैफिक की कमाई में अपनी गोटी फिट की जाती है ! कैसे नौकरी जाने के साथ - साथ जेल जाने का डर दिखा बेईमान अफसरों से अपनी मंथली सेटिंग की जाती है ! कैसे हर फैक्ट्री वाले की बैलन्स शीट के हिसाब से अपना परसेंट तय किया जाता है।

बातें तो तुम सारी एकदम सही कर रहे हो , लेकिन सत्ता हाथ आएगी कैसे ? इसके लिए तो बहुत नोटों की ज़रूरत पड़ेगी और वो तो है नहीं ना अपने पास। ज़्यादा उड़ो मत , बड़ी पावर की बातें किए जा रहे हो। यहां रिलायंस की पावर खरीदने लायक पैसे भी नहीं हैं , बीवी बैंक की पासबुक देख निराश होते हुए बोली। बस यही तो एक कमी रह गई। बाकी सारा मास्टर प्लैन तो मुंहज़बानी रटा पड़ा है हम दोनों को। मेरी आवाज़ में हताशा का पुट था।

काश ! कहीं से पैसा आ जाए इलेक्शन लड़ने के लिए , मैं ठंडी आह भरता हुआ बोला। बस पैसा आ जाए किसी तरह , बाकी सब दांवपेच पता है कि कैसे लड़ा जाता है चुनाव ? कैसे झटके जाते हैं विरोधी खेमे के वोट ? कैसे दूसरे के वोट बैंक में सेंध लगाई जाती है ? अरे ! बैंक से याद आया , अपने गुप्ता जी तो बैंक में ही हैं न ! पता करो , कोई लोन - शोन का ही जुगाड़ बन जाए शायद। आजकल तो धड़ाधड़ बांट रहे हैं ये बैंक वाले लोन। रोज़ ही तो लोन ले लो , लोन ले लो कह कर सिर खा रही होती हैं फोन पर।

दुनिया भर की तो छम्मक छल्लो भर्ती कर रखी हैं इन्होंने इसी खातिर। एक मिनट रुको , कहकर मैं अपने मोबाइल की फोन बुक खंगालने में जुट गया। अभी परसों ही तो फोन आया था रूबी का। अरे वही ! बैंक वाली , और कौन ?

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नवभारत टाईम्स की हिट कहानियों में मेरी पाँच कहानियाँ सम्मिलित

मुझे ये जानकर घोर आश्चर्यमिश्रित खुशी का एहसास हुआ जब कल नवभारत टाईम्स के किस्से-कहानियाँ सैक्शन में मैँने पाया कि उसकी हिट कहानियों में मेरी छै में से पाँच कहानियाँ सम्मिलित हैँ।इसके लिए मैँ अपने सभी पाठकों का तहेदिल से शुक्रिया अदा करता हूँ जिन्होंने अपना कीमती वक्त देकर मेरी कहानियों को पसन्द किया।  

 

पहली कहानी- बताएँ तुझे कैसे होता है बच्चा

दूसरी कहानी- बस बन गया डाक्टर

तीसरी कहानी- नामर्द हूँ,पर मर्द से बेहतर हूँ

चौथी कहानी- बाबा की माया

पाँचवी कहानी- व्यथा-झोलाछाप डॉक्टर की

छटी कहानी-काश एक बार फिर मिल जाए सैंटा

 

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मेरी छटी कहानी नवभारत टाईम्स पर

पहली कहानी- बताएँ तुझे कैसे होता है बच्चा

दूसरी कहानी- बस बन गया डाक्टर

तीसरी कहानी- नामर्द हूँ,पर मर्द से बेहतर हूँ

चौथी कहानी- बाबा की माया

पाँचवी कहानी- व्यथा-झोलाछाप डॉक्टर की

छटी कहानी-काश एक बार फिर मिल जाए सैंटा

 

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Navbharat Times - Breaking news, views. reviews, cricket from across India

 

काश एक बार फिर मिल जाए सैंटा


25 Dec 2007, 1027 hrs IST,नवभारतटाइम्स.कॉम 

राजीव तनेजा , दिल्ली

बात पिछले साल की है। चार दिन बचे थे , त्योहार आने में। मैं मोबाइल से दनादन एसएमएस किए जा रहा था। क्रिसमस का त्योहार सिर पर था , लेकिन ये एसएमएस मैं अपने खुदगर्ज़ दोस्तों को या फिर मतलबी रिश्तेदारों को नहीं कर रहा था। इसे मैं उन रेडियो वालों को भेज रहा था , जो गानों के बीच - बीच में अपनी टांग अड़ाते हुए बार - बार एसएमएस करने की गुजारिश कर रहे थे। कह रहे थे कि फलाने - फलाने नम्बर पर ' जैकपॉट ' लिख कर एसएमएस करो तो सैंटा आपके घर आ सकता है ढेर सारे इनामात लेकर।

सो मैंने भी चांस लेने की सोची कि यहां दिल वालों की दिल्ली में लॉटरी तो बैन है ही , चलो एसएमएस ही सही। क्या फर्क पड़ता है ? बात तो एक ही है न। एक साक्षात जुआ है , तो दूसरा मुखौटा ओढ़े उसी के पदचिन्हों पर खुलेआम चलता हुआ उसी का कोई भाई - भतीजा। साले, यहां भी रिश्तेदारी निभाने लगे।

खैर , अपुन ने भी खूब सारा एसएमएस पर एसएमएस किया। सोचा , खुद ऊपरवाला आकर छप्पर फाड़ रहा है अपने तम्बू का और बम्बू समेत ही हमें ले जा रहा है शानदार व मालदार भविष्य की तरफ कि लै पुत्तर ! कर लै हुण मौजा ही मौजा। हो जाण गे हुण तेरे वारे - न्यारे। अब यह कोई ज़रूरी नहीं कि हमेशा तीर ही लगे निशाने पर। कभी-कभार तुक्के भी तो लग जाया करते हैं निशाने पर।

कोई हैरानी की बात नहीं है इसमें , जो इस कदर कौतूहल भरा चेहरा लिए मेरी तरफ ताके चले जा रहे हैं आप। क्या किस्मत के धनी सिर्फ आप ही हो सकते हैं ? मैं नहीं ? उसके घर देर है अंधेर नहीं। कुछ तो उसकी बे - आवाज़ लाठी से डरो। अब यूं समझ लो कि अपुन को तो सोलह आने यकीन हो चला है कि अपनी बरसों से जंग खाई किस्मत का दरवाज़ा अब खुलने ही वाला है। दिन में पच्चीस - पच्चीस दफा कैलिंडर की तरफ ताकता कि अब कितने दिन बचे हैं , पच्चीस तारीख आने में।

पच्चीस तारीख ?

अरे ! बुरबक्क , लगा दी ना टोक। हां ! पच्चीस तारीख। कितनी बार कहा है कि यूं सुबह - सुबह किसी के शुभ काम में अड़ंगा मत लगाया करो , लेकिन तुम्हें अक्ल आए तब न। पच्चीस बार पहले ही बता चुका हूं कि पच्चीस दिसम्बर को ही तो मनाया जाता है ' बड़ा दिन ' दुनिया भर में। आप हैं कि हर बार इसे ' बड़ा खाना ' समझकर लार टपकाने लगते हैं। पेटू इंसान कहीं के। ' बड़ा खाना ' तो होता है फौज में , लेकिन तुम क्या जानो ये फौज - वौज के बारे में। कभी राइफल हाथ में पकड़ कर भी देखी है ? छोड़ो ! अब लड़कियों की सी नाज़ुक कलाइयों को थामने को बेताब तुम्हारे हाथ क्या राइफल - शाइफल पकड़ेंगे ?

यू बेवकूफ सिविलियन , इन मेनकाओं का मोह त्याग दे और देश की फिक्र कर बंधुवर। हां, तो मैं कह रहा था कि जैसे - जैसे पच्चीस तारीख नज़दीक आती जा रही थी, मेरे एसएमएस करने की स्पीड में भी तेज़ी से इज़ाफा होता जा रहा था। कई हज़ार के तो मैं रीचार्ज करवा चुका था अभी तक। मालूम जो था कि जितने ज़्यादा एसएमएस , उतना ही ज्यादा होगा जीतने का चांस। सो भेजे जा रहा था धड़ाधड़ एसएमएस पर एसएमएस। अब तो मोबाइल में भी बैलंस कम हो चला था , लेकिन फिक्र किस कम्बख्त को थी ? लेकिन , सच कहूं तो थोड़ी टेंशन तो थी ही कि सब यार - दोस्त तो पहले से ही बिदके पड़े हैं अपुन से। फाइनैंस का इंतज़ाम कैसे होगा ? कहां से होगा ?

ऐसे वक्त पर अपने जीत बाबू की याद आ गई। बड़े सज्जन किस्म के इंसान हैं। किसी को ' ना ' नहीं कहा है उन्होंने आज तक। भले ही कितनी भी तंगी चल रही हो , लेकिन कोई उनके द्वार से खाली नहीं गया कभी। किसी पराए का दुख तक नहीं देखा जाता उनसे। नाज़ुक दिल के जो ठहरे। जो आया , जब आया हमेशा सेवा को तत्पर। इतने दयालु कि कोई गारंटी भी नहीं मांगते। बस तसल्ली के लिए घर , दुकान , प्लॉट या गाड़ी - घोड़े के कागज़ात भर रख लेते हैं अपने पास।

वैसे औरों से तो दस टका ब्याज लेते हैं महीने का , लेकिन अपुन जैसे पर्मानंट कस्टमर के लिए विशेष डिस्काउंट दे देते हैं। बस , बदले में उनके छोटे - मोटे काम करने पड़ जाते हैं , जैसे भैंसो को चारा डालना , उनके टॉमी को सुबह - शाम गली - मोहल्ले में घुमा लाना आदि। काम का काम हो जाता है और सैर की सैर भी। इसी बहाने अपुन का भी वॉक - शॉक हो जाता है। वैसे अपने पास अपने लिए भी टाइम कहां है ? यह तो बाबा रामदेव जी के सोनीपत वाले शिविर में उन्हें कहते सुना था कि सुबह - सुबह चलना सेहत के लिए फायदेमंद है। फायदे की बात और मैं न मानूं ? ऐसा हरजाई नहीं मैं। ऐसी गुस्ताखी करने की मैं सोच भी कैसे सकता था ?

सो अपुन ने भी सोच-समझकर अंगूठा टिकाया और अपने जीत बाबू से पांच टके ब्याज पर पैसा उठाकर धड़ाधड़ झोंक दिया इस एसएमएस की आंधी में। अब दिल की धड़कनें दिन - प्रतिदिन तेज़ होने लगी कि क्या होगा ? कैसे संभाल सकूंगा इतनी दौलत को ? कभी देखा नहीं था ना ढेर सारा पैसा एक साथ। क्या - क्या खरीदूंगा ? क्या - क्या करूंगा ? ऐसे सैकड़ों सवाल मन में उमड़ रहे थे।

मैं अकेली जान ! कैसे मैनिज करूंगा सबका सब ? हां, अकेली ही कहना ठीक रहेगा। बीवी को तो कब का छोड़ चुका था मैं। वैसे ! अगर ईमानदारी से कहूं तो उसी ने मुझे छोड़ा था। अब पछताती होगी। उस बावली को मेरे सारे काम ही जो फालतू लगते थे। हमेशा पीछे पड़ी रहती थी कि बचत करो , बचत करो। कोई काम नहीं आया है और न कोई आएगा। काम आएगा तो सिर्फ गांठ में बंधा पैसा ही। दोस्त , रिश्तेदार सब बेकार होते हैं , ये फालतू का जमघट है। बच के रहो इनसे।

उस बावली को क्या पता कि ज़िन्दगी कैसे जिया करते हैं ? उसे तो बस यही फिक्र रहती है हमेशा कि बच्चों की फीस का इंतज़ाम हुआ ? ये नेट का कनेक्शन कटवा क्यों नहीं देते ? कार साफ करने वाला पैसे मांग रहा था। गाड़ी की किस्त जमा करवा दी ? वह बोल - बोल के परेशान हुए रहती थी फालतू में। शायद इसी चक्कर में दुबली भी बहुत हो गई थी।

अरे ! अगर फीस नहीं भरी तो कौन सी आफत आ जाएगी ? ज़्यादा से ज़्यादा क्या करेंगे ? नाम ही काट देंगे ना ? तो काट दें साले ! कौन रोकता है ? सरकारी स्कूल बगल में ही तो है। एक तो फीस भी कम , ऊपर से पैदल का रास्ता। बचत ही बचत। बल्कि, जो पैसे बच जाएंगे तो उनसे कार की किस्त भी टाइम पर भर दी जाएगी। वेरी सिम्पल।

ये आना - जाना तो चलता ही रहता है। कभी इस स्कूल तो कभी उस स्कूल में। कहती थी कि नेट कटवा दूं। हुंह ! बड़ी आई नेट कटवाने वाली। इतनी जो फैन मेल बनाई है दो बरसों में , सब छू - मंतर नहीं हो जाएगी ? गुरु ! यहां तो चढ़ते सूरज को सलाम है। दिखते रहोगे तो बिकते रहोगे। दिखना बन्द तो समझो बिकना भी बन्द। बैठे रहो आराम से।

फैन्स का क्या है ? आज हैं , कल नहीं। आज शाहरुख के कर रहे हैं , तो कल रितिक के पोस्टर रौशन करेंगे लड़कियों के बेडरूम। टिकाऊ नहीं होती है ये प्रसिद्धि - व्रसिद्धि। बड़े जतन से संभाला जाता है इसे। अपने कुमार गौरव का हाल तो मालूम ही है न ? वन फिल्म वंडर। एक फिल्म से ही सर आंखों पर बिठा लिया था पब्लिक ने उसे और अगले ही दिन दूसरी फिल्म से उसी दीवानी पब्लिक ने उसे ज़मीं पर भी ला पटका था।

टाइम का कुछ पता नहीं। आज अच्छा है , कल रहे या ना रहे। क्या यार ! यहां तो पहले ही इतना टेंशन है। मोबाइल में बैलन्स बचा पड़ा है और दिन कम होते जा रहे हैं। कैसे भेज पाऊंगा सारे पैसे के एसएमएस ? मैं सोच में डूबा हुआ ही था कि घंटी बजी और लगा कि जैसे मेरे सभी सतरंगी सपनों के सच होने का वक्त आ गया। मेरे बारे में मालुमात किया उन्होंने। पूछने पर पता चला कि रेडियो वाले ही थे और मेरा नम्बर उन्होंने सिलेक्ट कर लिया है बम्पर इनाम के लिए। बांछें खिल उठी मेरी।

उधर इंतज़ार की घड़ियां खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। प्यास के मारे हलक सूखा जा रहा था , लेकिन पानी पीने की फुर्सत किसे थी ? डर जो था कि कहीं सैंटा जी गलती से किसी और के घर न जा घुसें। खासकर , बाजू वाले शर्मा जी के यहां। अजीब किस्म के इंसान हैं , सामने कुछ और पीठ पीछे कुछ और। ऊपर से तो बेटा - बेटा करते रहते थे और अन्दर ही अन्दर मेरी ही बीवी पर नज़र रखते थे।

बड़ा समझाते रहते थे मुझे दिन भर कि बेटा ऐसे नहीं करो , वैसे नहीं करो। अरे ! मेरा घर , मेरी बीवी , मेरी मर्जी जो जी में आए करूं। तुम होते कौन हो बीच में टांग अड़ाने वाले ? कहीं बीवी ही तो नहीं सिखा गई उन्हें ये सब ? क्या पता ! पीठ पीछे क्या - क्या गुल खिलते रहे हैं यहां ? यह सब सोच - सोच कर मैं परेशान हो ही रहा था कि सैंटा जी आ पहुंचे। उनका ओज से भरा चेहरा देखते ही मेरे सभी दुख , सभी चिंताएं हवा हो गए। लम्बा तगड़ा कसरती बदन। सुर्ख लाल दमकता चेहरा। झक लाल कपड़े। उन्होंने बड़े ही प्यार से सर पर हाथ फिराया। मस्तक को प्यार से चूमा। चेहरा ओज से परिपूर्ण था। नज़रें मिलीं तो मैं टकटकी लगाए एकटक देखता रह गया। आंखें चौंधिया - सी रही थीं। सो ज़्यादा देर तक देख नहीं पाया।

फौरन निद्रा के आगोश ने मुझे घेर लिया था। आंखें बंद होने को थीं। मुंह में आए शब्द मानो अपनी आवाज़ खो चुके थे। चाहकर भी मैं कुछ कह नहीं पा रहा था। शायद किसी पवित्र आत्मा से मेरा पहला सामना था इसलिए। ऐसा न मैंने पहले कभी देखा था और न ही कभी इस बारे में कुछ सुना था। शायद आत्मा से परमात्मा का मिलन इसे ही कहते होंगे। ये आम इंसान से परम ज्ञानी बनने के सफर के बीच ही उन्होंने पूछ लिया, 'बता वत्स ! क्या चाहिए तुझे ? बता , क्या इच्छा है तेरी ?' मेरे कंठ से आवाज़ ही नहीं निकल पाई। उन्होंने फिर प्रेम से पूछा , ' बता ! तेरी रज़ा क्या है ?'

चुप देख मुझे उन्होंने खुद ही एयर कंडिशनर की तरफ इशारा किया। मैंने सिर हिलाकर हामी भर दी। फिर टीवी की तरफ इशारा किया तो मैंने फिर सिर हिला दिया। उसके बाद तो फ्रिज , डीवीडी प्लेयर , होम थियेटर , हैंडीकैम सबके लिए मैं बस हां - हां करता चला गया। वैसे होने को तो ये सारी की सारी चीज़ें मेरे पास पहले से ही मौजूद थीं , लेकिन कोई भरोसा नहीं था इनका। बीवी के साथ मुकदमा जो चल रहा था कोर्ट में। क्या पता , वह सब वापस लिए बिना नहीं माने। इसलिए कैसे इन्कार कर देता सांता जी को ? इतनी तो समझ है मुझे कि अच्छे मौके बार - बार नहीं मिला करते। सो हाथ आया दांव , बिना चले कैसे रह जाता ?

पहली बार तो मेरी किस्मत ने पलटी मारी थी और वह भी तब , जब बीवी नहीं थी मेरे साथ। शायद ऊपरवाले ने भी यही सोचा होगा कि इसके घर की लक्ष्मी तो हो गई उड़न छू। तो क्यों न बाहर से ही कोटा पूरा कर दिया जाए इसका। नेक बन्दा है , कुछ न कुछ बंदोबस्त तो करना ही पड़ेगा इसका। मैं खुशी से पागल हुआ जा रहा था कि आवाज़ आई , ' वक्त के साथ - साथ मैं भी बूढ़ा हो चला हूं। इतना सामान कंधे पर उठा नहीं सकता और भला दिल्ली की सड़कों पर बर्फ गाड़ी यानी स्लेज का क्या काम ? इसलिए ! स्लेज छोड़कर , ट्रक ही ले आया हूं मैं। '

' वक्त के साथ - साथ खुद को भी बदलना पड़ता है। सो बदल लिया ', सांता जी मुस्कुराते हुए बोले। मैंने भी झट से कह दिया कि आप परेशान न हों , मैं हूं न ! उसी वक्त उनके साथ जाकर सारा सामान ट्रक से अनलोड किया ही था कि इतने में नज़र लगाने को शर्मा जी आ पहुंचे। बोले , ' यह क्या कर रहे हो ?'

मैं चुप रहा। वह फिर बोल पड़े। मुझे गुस्सा तो बहुत आया, लेकिन चुप रहा कि कौन मुंह लगे इनसे और अपना अच्छा - भला मूड खराब करे। वह फिर बोल पड़े , ' यह क्या कर रहे हो ?' अब मुझसे रहा न गया। आखिर बर्दाश्त करने की भी हद होती है। तंग आकर आखिर बोलना ही पड़ा कि मेरा माल है , मैं जो चाहे करूं। आपको मतलब ? शर्मा जी बेचारे तो मेरी डांट सुन कर चुपचाप अपने रस्ते हो लिए। सैंटा जी के चेहरे पर अभी भी वही मोहिनी मुस्कान थी। उनकी सौम्य आवाज़ आई, ' अब मैं चलता हूं। अगले साल फिर से मिलता हूं। ' वह पलक झपकते ही गायब हो चुके थे। मैं खुशी से फूला नहीं समा रहा था कि अगले साल फिर से आने का वादा किया है उन्होंने।

इस बार तो मिस हो गया , लेकिन अगली बार नहीं। अभी से ही लिस्ट तैयार कर लूंगा कि मुझे क्या - क्या मांगना है ? बार - बार सारे गिफ्ट्स की तरफ ही देखे जा रहा था मैं। नज़र हटाए नहीं हट रही थी। पता ही नहीं चला कि कब आंख लग गई। सपने में भी उस महान आत्मा के ही दर्शन होते रहे रात भर। जब आंखें खुलीं तो देखा कि दोपहर हो चुकी है। सर कुछ भारी - भारी सा था। उनींदी आंखो से सारे सामान पर नज़र दौड़ाई।

लेकिन ! यह क्या ? जो देखा , देखकर गश खा गया मैं। सबकुछ बिखरा - बिखरा सा था। न कहीं टीवी नज़र आ रहा था और न ही कहीं फ्रिज और होम थिएटर। हैंडीकैम का कहीं अता - पता नहीं था। कायदे से तो हर चीज़ दुगनी - दुगनी होनी चाहिए थी , पर यहां तो इकलौता पीस भी नदारद था। देखा तो तिज़ोरी खुली पड़ी थी। कैश , गहने , कपड़े - लत्ते , क्रेडिट कार्ड कुछ भी तो नहीं बचा था। सब का सब माल गायब हो चुका था। मैंने बाहर जाकर इधर - उधर नज़र दौड़ाई तो कहीं दूर तक कोई नज़र नहीं आया। कोई साला मेरे सारे माल पर हाथ साफ कर चुका था। मैं ज़ोर - ज़ोर से दहाड़ मार - मार कर रोने लगा। भीड़ इकट्ठी हो चुकी थी।

सबको अपना दुखड़ा बता ही रहा था कि शर्मा जी की आवाज़ आई। ' क्यों अपने साथ - साथ सबका दिमाग भी खराब कर रहे हो बेफिजूल में ? रात को सारा सामान खुद ही तो लाद रहे थे ट्रक में और अब चोरी का ड्रामा कर रहे हो। मैंने अपनी आंखों से देखा और आपसे पूछा भी तो था कि यह आप क्या कर रहे हैं ? आपने तो उल्टा मुझे ही डपट दिया था कि मैं अपना काम करूं।'

रेडियो स्टेशन से पता किया तो मालूम हुआ कि इनाम पाने वालों की लिस्ट में मेरा नाम ही नहीं था। अब लगने लगा था कि वह सैंटा ही एक नम्बर का झूठा था। किसी तरीके से मेरा नम्बर पता लगा लिया होगा उसने। शायद मुझे हिप्नोटाइज़ कर चूना लगा गया। अब तो यही उम्मीद बाकी है कि शायद वह अपना वादा निभाए और अगले साल फिर वापस आए। एक बार मिल तो जाए कम्बख्त , फिर बताता हूं कि कैसे सम्मोहित किया जाता है ? बस इसी आस में कि वह आएगा मैं इस बार भी एसएमएस किए जा रहा हूं , किए जा रहा हूं।

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रुकावट के लिए खेद है

***राजीव तनेजा***


"बात पिछले साल की है....चार दिन थे अभी त्योहार आने में... मैँ मोबाईल से दनादन 'एस.एम.एस'किए जा रहा था" "क्रिसमस का त्योहार जो सिर पर था लेकिन ये 'एस.एम.एस' मैँ..अपने खुदगर्ज़ दोस्तों को या फिर मतलबी रिश्तेदारों को नहीं कर रहा था" "ये तो मैँ उन रेडियो वालों को भेज रहा था जो गानों के बीच-बीच में अपनी टाँग अडाते हुए बार-बार फलाने व ढीमके नम्बर पे 'एस.एम.एस' करने की गुजारिश कर रहे थे कि फलाने-फलाने नम्बर पे 'जैकपॉट'लिख के 'एस.एम.एस' करो तो 'साँता' आपके घर-द्वार आ सकता है ढेर सारे ईनामात लेकर"

(रुकावट के लिए खेद है)

 

नोट: इस बार व्यस्ता कह लें या फिर आलस कह लें...के चलते कुछ नया नहीं लिख पाया...इसलिए अपनी पुरानी कहानी 'बड़ा दिन'

को ही फिर से नए नाम से पोस्ट कर रहा हूँ।उम्मीद है कि आपको पसन्द आएगी...क्योंकि उम्मीद पे ही तो ये दुनिया...ये कायनात कायम है।



"सो!...मैने भी चाँस लेने की सोची कि यहाँ दिल वालों की दिल्ली में लॉटरी तो बैन है ही तो चलो 'एस.एम.एस' ही सही" "क्या फर्क पडता है?" "बात तो एक ही है"..."एक साक्षात जुआ है तो दूसरा मुखौटा ओडे उसी के पद-चिन्हों पे खुलेआम चलता हुआ उसी का कोई भाई-भतीजा" "साले!...यहाँ भी रिश्तेदारी निभाने लगे" "सो!...अपुन भी किए जा रहे थे 'एस.एम.एस' पे 'एस.एम.एस' कि जब खुद ऊपरवाला आ के छप्पर फाड रहा है अपने तम्बू का और बम्बू समेत ही हमें ले चल रहा है शानदार-मालादार भविष्य की तरफ कि...
"लै पुत्तरर !..कर लै हुण मौजाँ ही मौज़ाँ" ..."हो जाण गे हुण तेरे वारे-न्यारे" "अब ये कोई ज़रूरी नहीं कि हमेशा तीर ही लगें निशाने पे"... "तुक्के भी तो लग ही जाया करते हैँ निशाने पे कभी-कभार"... "कोई हैरानी की बात नहीं है इसमें जो इस कदर कौतुहल भरा चौखटा लिए मेरी तरफ ताके चले जा रहे हैँ आप" "क्या किस्मत के धनी सिर्फ आप ही हो सकते हैँ?"
"मैँ नहीं"...
"उसके घर देर है ...अन्धेर नहीं"...
"कुछ तो उसकी बे-आवाज़ लाठी से डरो"
"अब यूँ समझ लो कि अपुन को तो पूरा का पूरा सोलह ऑने यकीन ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास हो चला है कि...
अपनी बरसों से जंग खाई किस्मत का दरवाज़ा...अब खुला कि....अब खुला"
"दिन में पच्चीस-पच्चीस दफा कलैंडर की तरफ ताकता कि अब कितने दिन बचे हैँ पच्चीस तारीख आने में"
"पच्चीस तारीख!...?"..
"अरे!...बुरबक्क...लगा दी ना टोक"
"हाँ!...पच्चीस तारीख"
"कितनी बार कहा है कि यूँ सुबह-सुबह किसी के शुभ काम में अढंगा मत लगाया करो लेकिन...
तुम्हें अक्ल आए तब ना"
"पच्चीस बार पहले ही बता चुका हूँ कि पच्चीस दिसम्बर को ही तो मनाया जाता है 'बडा दिन' दुनिया भर में"...
और आप हैँ कि हर बार इसे 'बडा खाना' समझ लार टपकाने लगते हैँ"
"पेटू इंसान कहीं के "...
"बडा खाना तो होता है फौज में लेकिन तुम क्या जानो ये फौज-वौज के बारे में"...
"कभी राईफल हाथ में पकड के भी देखी है या माउज़र चला के देखा है कभी?"
"छोडो!...अब ये तुम्हारे लडकियों की नाज़ुक कलाईयाँ को थामने को बेताब हाथ क्या राईफल-शाईफल पकडेंगे?"
"यू!..बेवाकूफ 'सिविलियन'..."
"इन मेनकाओं का मोह त्याग ...देश की फिक्र करो बन्धुवर...देश की"
"हाँ!..तो मैँ कह रहा था कि जैसे-जैसे पच्चीस तारीख नज़दीक आती जा रही थी...मेरी 'एस.एम.एस'करने की स्पीड में भी तेज़ी से इज़ाफा होता जा रहा था"..."कई हज़ार के तो मैँ रिचार्ज करवा चुका था अभी तक "
"पुराना चावल जो ठहरा"..."मालुम जो था कि जितने ज़्यादा 'एस.एम.एस'...उतना ही ज़्यादा चाँस जीतने का"..."सो!...भेजे जा रहा था धडाधड 'एस.एम.एस' पे 'एस.एम.एस'"

"अब तो मोबाईल में भी बैलैंस कम हो चला था लेकिन फिक्र किस कम्भखत को थी? लेकिन सच कहूँ तो थोडी टैंशन तो थी ही कि सब यार-दोस्त तो पहले से ही बिदके पडे हैँ अपुन से "..."फाईनैंस का इंतज़ाम कैसे होगा?".. ."कहाँ से होगा?"
"ऐसे आडॆ वक्त पे अपने  'जीत बाबू' की याद आ गयी"
"बडे सज्जन टाईप के इंसान हैँ"...
"किसी को न नहीं कहा आज तक"
"भले ही कितनी भी तंगी चल रही हो लेकिन कोई उनके द्वार से खाली नहीं गया कभी"
"किसी पराए का दुख तक नहीं देखा जाता उनसे"
"नाज़ुक दिल के जो ठहरे"
"जो आया...जब आया...हमेशा सेवा को तत्पर"
"इतने दयालु कि कोई गारैंटी भी नहीं माँगते"
"बस तसल्ली के लिए घर,दुकान,प्लाट या गाडी-घोडे के कागज़ात भर रख लेते हैँ अपने पास "
"वैसे औरों से तो दस टका ब्याज लेते है मंथली का लेकिन...
अपुन जैसे पर्मानैंट कस्टमरज़ के लिए विशेष डिस्काउंट दे देते हैँ"
"बस बदले में उनके छोटे-मोटे काम करने पड जाते हैँ जैसे...
भैंसो को चारा डालना....
उनके 'टोमी' को सुबह-शाम गली-मोहल्ले में घुमा लाना"
"काम का काम हो जाता है और सैर की सैर"
"इसी बहाने अपुन का भी वॉक-शॉक हो जाता है"...


"वैसे इस बेफाल्तु से काम के लिए अपने पास अपने लिए भी टाईम कहाँ है?"
"ये तो बाबा रामदेव जी के सोनीपत वाले शिविर में उन्हें कहते सुना था कि...
सुबह-सुबह चलना सेहत के लिए फायदेमन्द है"
"फायदे की बात और वो मै ना मानूँ? ...
"ऐसा हरजाई नहीं"


"ऐसी गुस्ताखी करने की मैं सोच भी कैसे सकता था?"
"सो!..अपुन ने भी सोच-समझ के अँगूठा टिकाया और...
अपने जीत बाबू से पाँच ट्के ब्याज पे पैसा उठा धडाधड झोँक दिया इस 'एस.एम.एस' की आँधी में"
"अब दिल की धडकनें दिन प्रतिदिन तेज़ होने लगी ठीक कि ...
क्या होगा?...
"कैसे सँभाल पाउँगा इतनी दौलत को?"
"कभी देखा जो नहीं था ना ढेर सारा पैसा एक साथ"
"क्या-क्या खरीदूँगा?"...
"क्या-क्या करूँगा?"जैसे सैंकडो सवाल मन में उमड रहे थे"
"मैँ अकेली जान!..कैसे मैनेज करूँगा सब का सब?"
"हाँ!..अकेली ही कहना ठीक रहेगा"...
"बीवी को तो कब का छोड चुका था मैँ"
"वैसे!..अगर ईमानदारी से सच कहूँ तो उसी ने मुझे छोडा था"
"अब पछताती होगी "...
"उस बावली को मेरे सारे काम ही जो फाल्तू के लगते थे"..
"हमेशा पीछे पडी रहती थी के बचत करो...बचत करो"...
"कोई काम नहीं आया है और ना कोई आएगा"...
"काम आएगा तो सिर्फ गाँठ में बन्धा पैसा ही"
"दोस्त-यार...रिश्तेदार सब बेकार का...
फालतू का जमघट है"...
"बच के रहो इनसे"
"उस बावली को क्या पता कि ज़िन्दगी कैसे जिया करते हैँ"..
"उसे तो बस यही फिक्र पडी रहती हमेशा कि...
'फीस का इंतज़ाम हुआ बच्चों की?'...
'ये नैट कटवा क्यूँ नहीं देते?'...
'कार साफ करने वाला पैसे माँग रहा था'...
'गाडी की किश्त जमा करवा दी?'
"वो बोल-बोल के परेशान हुए रहती थी बे-फाल्तू में ही"
"शायद!...इसी चक्कर में दुबली भी बहुत हो गई थी"
"अरे!...अगर फीस नहीं भरी तो कौन सा आफत आ जाएगी?"...
"ज़्यादा से ज़्यादा क्या करेंगे?"...
"नाम ही काट देंगे ना?"
"तो काट दें साले!..."...
"कौन रोकता है?"...
"सरकारी स्कूल बगल में ही तो है"...
"एक तो फीस भी कम...
"ऊपर से पैदल का रास्ता"...
"बचत ही बचत"...
"उल्टा!..जो पैसे बच जाएंगे...
तो उनसे कार की किश्त भी टाईम पे भर दी जाएगी"
"वैरी सिम्पल"
"ये आना-जाना तो चलता ही रहता है"
"कभी इस स्कूल तो कभी उस स्कूल"
"कहती थी कि नैट कटवा दूँ"...
"हुँह!..बडी आई नैट कटवाने वाली"...
"इतनी जो फैन मेल बनाई है दो बरस में...
सब!..छू मंतर नहीं हो जाएगी?"
"गुरू!..यहाँ तो चढते सूरज को सलाम है"...
"दिखते रहोगे तो बिकते रहोगे"...
"दिखना बन्द तो समझो बिकना भी बन्द"
"बैठे रहो आराम से"
"फैनज़ का क्या है?"...
"आज हैँ...कल नहीं"...
"आज शाहरुख के कर रहे हैँ तो कल रितिक के पोस्टर रौशन करेंगे लडकियों के बैडरूम"
"टिकाऊ नहीं होती है ये प्रसिद्धी-वर्सिद्धी "...
"बडे जतन से संभाला जाता है इसे"
"अपने!..'कुमार गौरव' का हाल तो मालुम ही है ना?"
"वन फिल्म वण्डर"
"एक फिल्म से ही सर आँखों पे बिठा लिया था पब्लिक ने और...
अगले ही दिन दूजी फिल्म पे उसी दिवानी पब्लिक ने ज़मी पे भी ला पटका था"
"टाईम का कुछ पता नहीं"...
"आज अच्छा है"....
"कल का मालुम नहीं"....
"रहे...रहे"...
"ना रहे ...ना रहे"
"क्या यार!...यहाँ तो पहले ही टैंशन है इतना कि मोबाईल में बैलैंस बचा पडा है और...
दिन जो हैँ वो प्रतिदिन कम होते जा रहे हैँ"
"कैसे भेज पाउंगा सारे पैसे के 'एस.एम.एस'?"
"अब ये सब सोच-सोच के मैँ सोच में डूबा हुआ ही था कि घंटी बजी और लगा कि...
जैसे मेरे सभी सतरंगी सपनों के सच होने का वक्त आ गया"
"मेरे बारे में मालुमात किया उन्होंने ....
पूछने पे पता चला कि रेडियो वाले ही थे और मेरा नम्बर उन्होंने सलैक्ट कर लिया है बम्पर ईनाम के लिए "
"बाँछे खिल उठी मेरी"...
"इंतज़ार की घडियाँ खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी"
"प्यास के मारे हलक सूखा जा रहा था लेकिन पानी पीने का होश और फुरसत किसे थी?"
डर जो था कि कहीं 'साँता जी' गल्ती से ही किसी और के घर ना जा घुसें"...
"खास कर के बाजू वाले शर्मा जी के यहाँ"...
"साले!...दोगले किस्म के इंसान"..
"सामने कुछ और...पीठ पीछे कुछ"
"ऊपर-ऊपर से तो बेटा-बेटा करते रहते थे और अन्दर ही अन्दर मेरी ही बीवी पे नज़र रखते थे"
"बडा समझाते रहते थे मुझे दिन भर कि ...
"बेटा ऐसे नहीं करो...वैसे नहीं करो"
"अरे!...मेरा घर ...मेरी बीवी...
मेरी मरज़ी जो जी में आए करूँ"
"तुम होते कौन हो बीच में अडंगी लगाने वाले?"
"कहीं!...बीवी ही तो नहीं सिखा के गई उन्हें ये सब?"
"क्या पता!..पीठ पीछे क्या-क्या गुल खिलते रहे हैं यहाँ?"
"ये सब सोच-सोच के मैँ परेशान हो ही रहा था कि साँता जी आ पहुँचे"...
"उनका ओज से भरा चेहरा देख ही मेरे सभी दुख ....सभी चिंताएँ हवा हो गई"
"लम्बा तगडा कसरती बदन"...
"सुर्ख लाल दमकता चेहरा"...

"झक लाल कपडे"..
"उन्होंने बडे ही प्यार से सर पे हाथ फिराया"...
"मस्तक को प्यार से चूमा"
"चेहरा ओज से परिपूर्ण था "
"नज़रें मिली तो मैँ टकटकी लगाए एकटक देखता रह गया"
"आँखे चौंधिया सी रही थी"...
"सो!...ज़्यादा देर तक देख नहीं पाया मैँ"
"निद्रा के आगोश ने मुझे घेर लिया था"
"आँखे बन्द होने को थी"
"मुँह में आए शब्द मानो अपनी आवाज़ खो चुके थे"...
"चाह कर भी मैँ कुछ कह नहीं पा रहा था"
"शायद पवित्र आत्मा से मेरा पहला सामना था इसलिए"
"ऐसा ना मैंने पहले कभी देखा था और ना ही कभी इस बारे में कुछ सुना था"
"शायद!...आत्मा से परमात्मा का मिलन इसे ही कहते होंगे "
"ये आम इंसान से परम ज्ञानी बनने का सफर बहुत भा ही रहा था मुझे कि ...
उन्होंने पूछ लिया...
"चिंता ना कर वत्स !...बता क्या चाहिए तुझे?"
"अब से तेरे जीवन में बस मौजां ही मौजां"...
"मैँ कुछ बोलने से पहले सकुचाया"..
"शरमा मत...बता..क्या इच्छा है तेरी?"...
"मेरे कंठ से आवाज़ न निकली"
उन्होंने फिर प्रेम से पूछा"बता!...तेरी रज़ा क्या है?"
"चुप देख मुझे ...
उन्होंने खुद ही 'एयर कंडीशनर' की तरफ इशारा किया"
"मैंने मुण्डी हिला हामी भर दी"
"फिर टीवी की तरफ इशारा किया तो मैँने फिर मुण्डी हिला दी"
"उसके बाद तो फ्रिज...
'डीवीडी प्लेयर'...
'होम थियेटर'...
'हैण्डी कैम'...सबके लिए मैँ हाँ करता चला गया"
"वैसे होने को तो ये सारी की सारी चीज़े मेरे पास पहले से ही मौजूद थी लेकिन कोई भरोसा नहीं था इनका"
"बीवी के साथ कैसा जो चल रहा था कोर्ट में"
"क्या पता साली!...सब वापिस लिए बिना नहीं माने"
"इसलिए कैसे इनकार कर देता साँता जी को?"
"इतनी तो समझ है मुझे कि अच्छे मौके बार-बार नहीं मिला करते"
"सो!...हाथ आया दाव बिना चले कैसे रह जाता?"
"पहली बार तो मेरी किस्मत ने पलटी मारी थी और वो भी तब जब बीवी नहीं थी मेरे साथ"..
"शायद ऊपरवाले ने भी यही सोचा होगा कि इसके घर की लक्ष्मी तो हो गयी उडनछू....
तो क्यों न बाहर से ही कोटा पूरा कर दिया जाए इसका"
"नेक बन्दा है...कुछ ना कुछ बंदोबस्त तो करना ही पडेगा इसका"
"मैँ खुशी से पागल हुआ जा रहा था कि आवाज़ आई कि...
"वक्त के साथ-साथ मैँ भी बूढा हो चला हूँ"...
"इतना सामान कँधे पे उठा नहीं सकता और....
भला दिल्ली की सडकों पर बर्फ गाडी याने स्लेज का क्या काम?"
"इसलिए!...स्लेज छोड ट्रक ही ले आया हूँ मैँ"...

"वक्त के साथ-साथ खुद को भी बदलना पडता है...
"सो!...बदल लिया"साँता जी मुस्कुराते हुए बोले
"मैने भी झट से कह दिया कि आपक नाहक परेशान न हों...मैँ हूँ ना"
"उसी वक्त उनके साथ जा के सारा सामान ट्रक से अनलोड किया ही था कि इतने में नज़र लगाने को शर्मा जी आ पहुँचे"
बोले"ये क्या कर रहे हो?"...
"मैँ चुप रहा"..
"वो फिर बोल पडे"...
"मुझे गुस्सा तो बहुत आया लेकिन चुप रहा कि कौन मुँह लगे और अपना अच्छा-भला मूड खराब करे"
फिर बोल पडे"ये क्या कर रहे हो?"
"अब मुझसे रहा न गया"...
"आखिर बर्दाश्त की भी एक हद होती है"
"तंग आकर आखिर बोलना ही पडा कि...
"मेरा माल है"...
"मैँ जो चाहे करूँ"..
"आपको मतलंब?"
"शर्मा जी बेचारे तो मेरी डांट सुन के चुपचाप अपने रस्ते हो लिए"
"साँता जी के चेहरे पे अभी भी वही मोहिनी मुस्कान थी"
"उनकी सौम्य आवाज़ आई"अब मैँ चलता हूँ"....
"अगले साल फिर से मिलता हूँ"
"और वो पलक झपकते ही गायब हो चुके थे"
"मैँ खुशी से फूला नहीं समा रहा था कि अगले साल फिर से आने का वादा मिला है"...
"इस बार तो मिस हो गया लेकिन अगली बार नहीं"...
"अभी से ही लिस्ट तैयार कर लूंगा कि ये भी माँगना है और वो भी माँगना है"
"बार-बार सारे गिफ्टस की तरफ ही देखे जा रहा था मैँ"...
"नज़र हटाए नहीं हट रही थी कि पता ही नहीं चला कि कब आँख लग गयी"
"सपने में भी उस महान आत्मा के ही दर्शन होते रहे रात भर"
"जब आँख खुली तो देखा कि दोपहर हो चुकी थी"
"सर कुछ भारी-भारी सा था"
"उनींदी आँखो से सारे सामान पे नज़र दौडाई"..
"लेकिन!...ये क्या?"
"जो देखा...देख के गश खा गया मैँ"...
"सब कुछ बिखरा-बिखरा सा था"
"न कहीं टीवी नज़र आ रहा था और ना ही कहीं फ्रिज और होम थिएटर"
"हैण्डी कैम का कहीं अता-पता नहीं था"
"कायदे से तो हर चीज़ दुगनी-दुगनी होनी चाहिए थी पर यहाँ तो इकलौता पीस भी नदारद था"
"देखा तो तिजोरी खुली पडी थी"
"कैश....गहने-लत्ते...क्रैडिट कार्ड....
कुछ भी तो नहीं था"
"सब का सब माल गायब हो चुका था"
"मैंने बाहर जा के इधर-उधर नज़र दौडाई तो कहीं दूर तक कोई नज़र नहीं आया"
"कोई साला!..मेरे सारे माल पे हाथ साफ कर चुका था"
"मैँ ज़ोर-ज़ोर से धाड मार-मार रोने लगा"...
"भीड इकट्ठी हो चुकी थी "
"सबको अपना दुखडा बता ही रहा था कि शर्मा जी की आवाज़ आई...
"क्यों अपने साथ-साथ सबका दिमाग भी खराब कर रहे हो बेफिजूल में?"...
"रात को सारा सामान खुद ही तो लाद रहे थे ट्रक में और अब ड्रामा कर रहे हो चोरी का"
"मैने अपनी आँखो से देखा और आपसे पूछा भी तो था कि ये आप क्या कर रहे हैँ?"
"आपने ने तो उल्टा मुझे ही डपट दिया था कि मैँ अपना काम करूँ"
"रेडियो स्टेशन से पता किया तो मालुम हुआ कि ईनाम पाने वालों की लिस्ट में मेरा नाम ही नहीं था"
"अब लगने लगा था कि वो साला साँता फ्राड था एक नम्बर का "
"किसी तरीके से मेरा नम्बर पता लगा लिया होगा उसने"
"और शायद मुझे हिप्नोटाईज़ कर चूना लगा गया"


"अब तो यही के उम्मीद की किरण बाकि है कि शायद वो अपना वायदा निभाए और अगले साल वापिस आए"
"एक बार मिल तो जाए सही कम्भख्त,फिर बताता हूँ कि कैसे सम्मोहित किया जाता है"...फिर उसे बताऊँगा कि कैसे करते हैँ मौजां ही मौजां"
"बस इसी आस में कि वो आएगा मैँ इस बार भी 'एस.एम.एस' किए जा रहा हूँ...किए जा रहा हूँ"


"जय हिन्द"


***राजीव तनेजा***

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कभी तो माएके जा री बेगम(ऑडियो/पँजाबी)सहित

मुझे मेरे एक मित्र ने ये कविता मेरे मोबाईल में ब्लूटुथ के जरिए फॉरवर्ड की थी।मुझे सुनने में बहुत अच्छी लगी तो मैँने सोचा कि इसे सभी के साथ शेयर करना बेहतर रहेगा।ये कविता दरअसल पंजाबी में है और जिन सज्जन ने इसे लिखा है ..मैँ उनका नाम नहीं जानता।शायद वो पाकिस्तान से हैँ।अपने सभी पढने वालों के फायदे के लिए मैँने इसका हिन्दी में अनुवाद करने की कोशिश की है।

उम्मीद है कि आप सभी को पसन्द आएगी। असली रचियता से साभार सहित
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राजीव तनेजा

मेरी पाँचवी कहानी नवभारत टाईम्स पर

पहली कहानी- बताएँ तुझे कैसे होता है बच्चा

दूसरी कहानी- बस बन गया डाक्टर

तीसरी कहानी- नामर्द हूँ,पर मर्द से बेहतर हूँ

चौथी कहानी- बाबा की माया

पाँचवी कहानी- व्यथा-झोलाछाप डॉक्टर की


Navbharat Times - Breaking news, views. reviews, cricket from across India

 

'व्यथा-झोलाछाप डॉक्टर की'


10 Dec 2008, 1130 hrs IST,नवभारतटाइम्स.कॉम 

राजीव तनेजा


कसम ले लो मुझसे ' खुदा ' की या फिर किसी भी मनचाहे भगवान की। तसल्ली न हो तो बेशक ' बाबा रामदेव ' के यहां मत्था टिकवा कर पूरे सात के सात वचन ले लो, जो मैंने या मेरे पूरे खानदान में कभी किसी ने ' वीआईपी ' या किसी फैशनेबल लगेज के अलावा कोई देसी लगेज जैसे- थैला, बोरी, कट्टा, ट्रंक, अटैची या फिर कोई और बारदाना इस्तेमाल किया हो।

कुछ एक सरफिरे अमीरज़ादे तो ' सैम्सोनाइट ' का महंगा लगेज भी इस्तेमाल करने लग गए हैं आजकल। आखिर स्टैंडर्ड नाम की भी कोई चीज़ होती है कि नहीं। लेकिन, इस सब में भला आपको क्या इंट्रेस्ट ? आपने तो न कुछ पूछना है , न पाछना है और सीधे ही बिना सोचे - समझे झट से सौ के सौ इल्ज़ाम लगा देने हैं हम मासूमों पर। मानों हम जीते-जागते इंसान न होकर कसाई खाने में बंधी भेड़ - बकरियां हो गए कि जब चाहा जहां चाहा झट से मारी और फट से हांक दिया।
अच्छा लगता है क्या, किसी अच्छे भले सूटेड-बूटेड आदमी को ' झोला छाप ' कह उसकी पूरी पर्सनैलिटी पूरी इज़्जत की वाट लगाना ? मज़ा आता होगा न आपको हमें सड़क छाप कह कर हमारे काम, हमारे धंधे की तौहीन करते हुए ? सीधे-सीधे कह क्यों नहीं देते कि अपार खुशी का मीठा-मीठा एहसास होता है आपको, हमें नीचा दिखाने में ? वैसे यह कहां की भलमनसत है कि हमारे मुंह पर ही हमें हमारे छोटेपन का एहसास कराया जाए ?
यह सब इसलिए न कि हम आपकी तरह ज़्यादा पढ़े लिखे नहीं, ज़्यादा सभ्य नहीं, ज़्यादा समझदार नहीं ? हमारे साथ यह दोहरा मापदंड, यह सौतेला व्यवहार इसलिए न कि हमारे पास डिग्री नहीं, सर्टिफिकेट नहीं है ? मैं आपसे पूछता हूं कि हकीम लुकमान के पास कौन से कॉलिज या विश्वविद्यालय की डिग्री थी ? या धनवंतरी ने ही कौन सा मेडिकल कॉलिज से एमबीबीएस या एमडी पास आऊट किया था ? सच तो यही है दोस्त कि उनके पास कोई डिग्री नहीं थी। फिर भी वह देश के जाने-माने हकीम थे, वैद्य थे, लाखों करोड़ों लोगों का सफलतापूर्वक इलाज किया था उन्होंने। क्यों है कि नहीं ?
उनके इस बेमिसाल हुनर के पीछे उनका सालों का तजुर्बा था, न कि कोई डिग्री। हमारी कंडीशन भी कुछ-कुछ उनके जैसी ही है। यानी कि 'ऑलमोस्ट सेम टू सेम ' क्योंकि जैसे उनके पास कोई डिग्री नहीं, वैसे ही हमारे पास भी कोई डिग्री नहीं, सिम्पल। वैसे आपकी जानकारी के लिए मैं एक बात और बता दूं कि ये लहराते बलखाते बाल मैंने ऐसे ही धूप में सफेद नहीं किए हैं, बल्कि इस डॉक्टरी में पूरे पौने नौ साल का प्रैक्टिकल तजुर्बा है मुझे और खास बात यह कि यह तजुर्बा मैंने इन तथाकथित एमबीबीएस या एमडी डॉक्टरों की तरह किसी बेज़ुबान चूहे या मेंढक का पेट काटते हुए हासिल नहीं किया है, बल्कि इसके लिए खुद इन्हीं नायाब हाथों से कई जीते जागते ज़िन्दा इंसानों के बदन चीरे हैं मैंने।
है क्या किसी ' डिग्रीधारी ' डॉक्टर या फिर मेडिकल ऑफिसर में ऐसा करने की हिम्मत ? और यह आपसे किस गधे ने कह दिया कि डिग्रीधारी डॉक्टरों के हाथों मरीज़ मरते नहीं हैं ? रोज़ ही तो अखबारों में इसी तरह का कोई ना कोई केस छाया रहता है कि फलाने सरकारी अस्पताल में फलाने डॉक्टर ने लापरवाही से ऑपरेशन करते हुए वक्त सरकारी कैंची को गुम कर दिया। अब कर दिया तो कर दिया, लेकिन नहीं अपनी सरकार भी न, पता नहीं क्या सोच कर एक छोटी सी सस्ती कैंची का रोना ले कर बैठ जाती है। यह भी नहीं देखती कि कई बार बेचारे डॉक्टरों के नोकिया ' एन ' सीरीज़ तक के महंगे-महंगे फोन भी मरीज़ों के पेट में बिना कोई शोर-शराबा किए गर्क हो जाते हैं। लेकिन, शराफत देखो उनकी, वे उफ तक नहीं करते।

अब कोई छोटा-मोटा सस्ता वाला चायनीज़ मोबाइल हो तो बंदा भूल-भाल भी जाए, लेकिन नोकिया और वह भी ' एन ' सीरीज़ कोई भूले भी तो कैसे भूले ? अब इसे कुछ डॉक्टरों की किस्मत कह लें या फिर उनका खून-पसीने की मेहनत से कमाया पैसा कि उन्होंने अपने फोन को बॉय डिफॉल्ट ' वाईब्रेशन ' मोड पर सेट किया हुआ होता है। जिससे न चाहते हुए भी कुछ मरीज़ पेट में बार-बार मरोड़ उठने की शिकायत लेकर उसी अस्पताल का रुख करते हैं, जहां उनका इलाज हुआ था।
वैसे बाबा रामदेव झूठ न बुलवाए तो यही कोई दस बारह केस तो अपने भी बिगड़ ही चुके होंगे इन पौने नौ सालों में, लेकिन इसमें इतनी हाय तौबा मचाने की कोई ज़रूरत नहीं। आखिर इंसान हूं और इंसानों से ही गलती होती है। लेकिन, अफसोस सबको मेरी ही गलती नज़र आती है। क्या किसी घायल, किसी बीमार की सेवा कर उसका इलाज कर, उसे ठीक भला चंगा करना गलत है ? नहीं न ? फिर ऐसे में अगर कभी गलती से लापरवाही के चलते कोई छोटी-बड़ी चूक हो भी गई तो इसके लिए इतना शोर-शराबा क्यों ?

मुझमें भी आप ही की तरह देश सेवा का जज़्बा है। मैं भी आप सभी की तरह सच्चा देशभक्त हूं और सही मायने में देश की भलाई के लिए काम कर रहा हूं। कहने को अपनी सरकार हमेशा बढ़ती जनसंख्या का रोना रोती रहती है, लेकिन अगर हम मदद के लिए आगे बढ़ते हुए अपनी सेवाएं दें तो बात फांसी तक पहुंच जाती है। वे कहें तो पुण्य और हम करें तो पाप। वाह री मेरी सरकार, कहने को कुछ और, करने को कुछ और।
जहां एक तरफ इंदिरा गांधी के ज़माने में कांग्रेस सरकार ने टारगिट पूरा करने के लिए जबरन नसबंदी का सहारा लिया था और अब वर्तमान कांग्रेस सरकार जगह-जगह 'कॉन्डम के साथ चलें ' के बैनर लगवा रही है। दूसरी तरफ कोई अपनी मर्जी से अबॉर्शन करवाना चाहे तो जुर्माना लगा फटाक से अंदर कर देती है। यह भला कहां का इंसाफ है कि अबॉर्शन करने वालों को और करवाने वालों को पकड़कर जेल में डाल दिया जाए ?

कोई कुछ कहे न कहे, लेकिन मेरे जैसे लोग तो डंके की चोट पर यही कहेंगे कि अगर लड़का पैदा होगा तो वह बड़ा होकर कमाएगा धमाएगा, खानदान का नाम रौशन करेगा। ठीक है, मान ली आपकी बात कि आजकल लड़कियां भी कमा रही हैं और लड़कों से दोगुना-तिगुना तक कमा रही हैं, लेकिन ऐसी कमाई किस काम की, जो वह शादी के बाद फुर्र हो अपने साथ ले चलती बनें ? यह भला क्या बात हुई कि खर्च करते करते बेचारा बाप बूढ़ा हो जाए और जब पैसे कमाने की बारी आए तो पति महाशय क्लीन शेव होते हुए भी अपनी मूछों को ताव देते पहुंच जाएं ? मज़ा तो तब है जब, जो पौधे को सींचे वही फल भी खाए। क्यों ? है कि नहीं। खैर छोड़ो, हमें क्या ? अपने तो सारे बेटे ही बेटे हैं। जिन्हें बेटी है, वही सोचेगा।
आप कहते हैं कि हम इलाज के दौरान हाइजीन का ध्यान नहीं रखते। सिरिंजो को उबालना, दस्तानों का इस्तेमाल करना वगैरह, तो क्या आपके हिसाब से पैसा मुफ्त में मिलता है या फिर किसी पेड़ पर उगता है ? आंखे हमारी भी हैं, हम भी देख सकते हैं कि अगर सिरिंजें दोबारा इस्तेमाल करने लायक होती हैं, तभी हम उन्हें काम में लाते हैं वर्ना नहीं। ठीक है, माना कि कई बार जंग लगे औज़ारों के इस्तेमाल से खतरा बन जाता है और यदा कदा केस बिगड़ भी जाते हैं। तो ऐसे नाज़ुक मौकों पर हम अपना पल्ला झाड़ते हुए मरीज़ों को किसी बड़े अस्पताल या फिर किसी बड़े डॉक्टर के पास भी रेफर तो कर देते हैं।
अब अगर कोई काम हमसे ठीक से नहीं हो पा रहा है तो यह कहां का धर्म है कि हम उससे खुद चिपके रह कर मरीज़ की जान खतरे में डालें। आखिर, वह भी हमारी तरह जीता जागता इंसान है, कोई खिलौना नहीं।
ट्रिंग...ट्रिंग
- हलो
- कौन ?
- नमस्ते
- बस, यहीं आस-पास ही हूं।
- ठीक है, आधे घंटे में पहुंच जाऊंगा।
- ओके, सारी तैयारियां करके रखो। फायनली मैं आने के बाद चेक कर लूंगा।
- हां, मेरे आने तक पार्टी को बहला कर रखो कि डॉक्टर साहब ओटी में ऑपरेशन कर रहे हैं।
- एक बात और, कुछ भी कह सुन कर पूरे पैसे अडवांस में जमा करवा लेना। बाद में पेशंट मर-मरा गया तो रिश्तेदार तो ड्रामा खड़ा कर नाक में दम कर देंगे। पहले पैसे ले लो तो ठीक, वर्ना बाद में बड़ा दुखी करते हैं।

अच्छा दोस्तो, कहने-सुनने को बहुत कुछ है। फिलहाल, जैसा कि आपने अभी सुना, शेड्यूल थोड़ा व्यस्त है। फिर मिलेंगे कभी, शायद जब आप बीमार हों।

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याहू!.....10000 का आँकड़ा पार

याहू!....

हँसते रहो पर आने वालों की सँख्या 10000(दस हज़ार) के आँकड़े को पार कर गई है।

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मैँ राजीव तनेजा अपने सभी चाहने वालों का तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ कि उन्होंने इस नाचीज़ की छोटी-छोटी कहानियों को पढने के लिए अपना कीमती वक्त दिया।

एक बार फिर से आप सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया

राजीव तनेजा

 
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