मिसेज फनीबोन्स - ट्विंकल खन्ना

माना जाता है कि किसी को हँसाना सबसे मुश्किल काम है। इस काम को आसान बनाने के लिए कुछ लोगों द्वारा किसी एक की खिल्ली उड़ा, उसे हँसी का पात्र बना सबको हँसाया जाता है लेकिन यकीन मानिए ऐसे..इस तरह..किसी एक का माखौल उड़ा सबको हँसाने की प्रवृति सही नहीं है। ना ही ऐसे हास्य की लंबी उम्र ही होती है। बिना किसी को ठेस पहुँचाए खुद अपना मज़ाक उड़ा, दूसरों को हँसाने का तरीका ही सही मायनों में श्रेयस्कर होता है। किसी की वजह से अगर किसी को मुस्कुराने की ज़रा सी भी वजह मिल जाती है तो समझिए कि उसका दिन बन जाता है। ऐसे ही मुस्कुराने की ढेरों वजह दे जाती हैं ट्विंकल खन्ना अपनी पुस्तक "मिसेज फनीबोन्स" के माध्यम से जो कि इसी नाम से आयी उनकी अंग्रेज़ी पुस्तक का हिंदी अनुवाद है।

ट्विंकल खन्ना ने अंग्रेज़ी अखबारों में बतौर कॉलम लेखिका अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी की कुछ खट्टी मीठी बातों को इन कॉलमज़ के ज़रिए शेयर किया और इसमें प्रसिद्धि पा लेने के बाद इन्हीं छोटी छोटी बातों को पुस्तक का रूप दिया। इन कॉलमज़ में वह अपनी हताशा, अपनी कुंठा, अपनी मूर्खताओं, अपनी वर्जनाओं, अपनी खुशियों और परिस्तिथिजनक स्तिथियों पर खुद ही कटाक्ष कर, खुद को  ही हँसी का पात्र बना लेती हैं और उनकी इस हाज़िरजवाबी पर पढ़ने वाले मुस्कुराए बिना नहीं रह पाते।

हँसी के लिए उन्हें झूठे...काल्पनिक पात्रों या छद्म नामों को गढ़ने की ज़रूरत नहीं पड़ती बल्कि इस मामले में वह अपने घर के ही सदस्यों मसलन खुद ट्विंकल खन्ना, उनके पति (फ़िल्म स्टार अक्षय कुमार, उनकी माँ डिम्पल कपाड़िया(खन्ना), सास, बच्चे, नौकर चाकर, मिलने जुलने वालों, मेहमानों समेत अपने पालतू जानवरों में से किसी को नहीं बख्शती। सबको हँसाने के लिए वे अपनी मूर्खतापूर्ण बातों को भी नहीं छिपाती और उन्हें इस तरह से और ज़्यादा हाई लाइट कर के प्रेसेंट करती हैं कि कोई भी मुस्कुराए बिना रह नहीं पाता। ये भी नहीं है कि उनकी बातों में सिर्फ हँसी या मुस्कुराने के पल ही होते हैं। कई बार उनकी इन हल्की फुल्की बातों में भी गहन अर्थ, गहरी वेदना एवं सामाजिक चेतना या जागरूकता से भरे संदेश छिपे होते हैं। 

ये सही है कि उनका लिखा आमतौर पर आपको ठठा कर हँसने का मौका बहुत ही कम या लगभग नहीं के बराबर देता है लेकिन हाँ!...मुस्कुराहट का सामान आपको लगातार मिलता रहता है। ये शायद इसलिए होता है कि वह अंग्रेज़ी में लिखती हैं और समाज के एलीट वर्ग से आती हैं। समाज के एलीट वर्ग के बारे में तो आप समझते ही हैं कि वहाँ पर ठठा कर या फिर ठहाके लगा कर हँसना असभ्यता की निशानी माना जाता है लेकिन आम मध्यमवर्गीय वर्ग के लिए खुल कर हँस पाना ही असली खुशी का सामान होता है। उम्मीद करनी चाहिए कि इस बात को ज़हन में रखते हुए उनकी आने वाली किताबों में हँसी का ज़्यादा से ज़्यादा सामान होगा।

अगर आप एलीट वर्ग में अपनी जगह बनाना चाहते हैं या फिर बुद्धिजीवी टाइप के व्यक्तियों में अपनी पैठ जमाने के इच्छुक हैं या फिर यार दोस्तों को अपनी उम्दा चॉयस से रूबरू करवाना चाहते हैं तो  इस किताब को सहेज कर रख सकते हैं वर्ना पढ़ने के बाद इसे किसी और को पढ़ने के लिए एज़ के गिफ्ट दे देना भी एक अच्छा एवं उत्तम विचार है। उनकी इस किताब के पेपरबैक संस्करण को छापा है प्रभात पेपरबैक्स ने और इसका मूल्य ₹200/- रखा गया है। आने वाले भविष्य के लिए लेखिका तथा प्रकाशक को ढेरों ढेर बधाई।

4 comments:

Sunil "Dana" said...

ट्विंकल जी के व्यंग्य सहज सरल हैं । रोज की घटनाओं से प्रेरित होते हैं । दुर्भाग्य से हिंदी पाठकों तक नहीं पहुंच पाते हैं ।

Girish Billore Mukul said...

जय गुरुदेव

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर = RAJA Kumarendra Singh Sengar said...

सच है कि खुद पर हँसना और वह भी सार्वजनिक रूप से बहुत कठिन है. कई बार अपनी ऐसी घटनाओं के बारे में लिखने की सोचते हैं पर रह जाते हैं.

अब पहले इसे लेंगे फिर पढेंगे. पढ़ने के बाद भी इसके बारे में कुछ कहेंगे. कोशिश करेंगे, खुद की ऐसी घटनाओं को लिखने की.

संगीता पुरी said...

औरों के लिए मुश्किल होगा, आपके लिए तो हँसाना सबसे आसान काम है ! बहुत बढ़िया !

 
Copyright © 2009. हँसते रहो All Rights Reserved. | Post RSS | Comments RSS | Design maintain by: Shah Nawaz