धनिका - मधु चतुर्वेदी

आज भी हमारे समाज में आम मान्यता के तहत लड़कियों की बनिस्बत लड़कों को इसलिए तरजीह दी जाती है कि लड़कियों ने तो मोटा दहेज ले शादी के बाद दूसरे घर चले जाना है जबकि लड़कों ने परिवार के साथ आर्थिक एवं सामाजिक स्तर पर साथ खड़े रह उनकी वंशबेल को और अधिक विस्तृत एवं व्यापक कर आगे बढ़ाना है। लड़की की शादी में मोटा दहेज देने जैसी कुप्रथा से तंग आ कर बहुत से परिवारों में लड़की के जन्मते ही या फिर उसके भ्रूण रूप में ही उसे खत्म कर देने का चलन चल निकला।

दोस्तों..आज इस सामाजिक मुद्दे से जुड़ी बातें इसलिए कि आज मैं इसी विषय से जुड़े एक ऐसे उपन्यास की यहाँ बात करने जा रहा हूँ जिसे 'धनिका' के नाम से लिखा है मधु चतुर्वेदी ने। 

इस उपन्यास के मूल में एक तरफ़ कहानी है एक ऐसी माँ की जिसे अपनी पूरी ज़िन्दगी इस बात का मलाल रहा कि उसका पूरा जीवन बच्चे पैदा करने और उनके लालन-पोषण में ही गुज़र गया। दूसरी तरफ इस उपन्यास में कहानी है घर के कामकाज में निपुण उस धनिका की जो अपने तमाम गुणों के बावजूद महज़ इस वजह से अपनी दादी की तारीफ़ को तरसती रही कि उसकी माँ ने बेटियाँ क्यों जनी हैं।  

मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि की इर्दगिर्द बने गए इस उपन्यास में कहीं कोई अपनी पत्नी के जीवित होने के बावजूद उसी घर में उसी की छोटी बहन को उसकी सौतन के रूप में ब्याह के ले आता है कि बड़ी बहन बच्चे पैदा करने में सक्षम नहीं। तो कहीं कोई नौकरीपेशा मध्यमवर्गीय जीव वाजिब दामों पर मौसमी फल व सब्ज़ियाँ पा कर अथवा किसी सरकारी काम के बिना रिश्वत दिए ही पूरे हो जाने पर या बॉस के मुँह से तारीफ़ के दो बोल सुन लेने पर ही परम संतोष अनुभव करता दिखाई देता है। 

 इसी उपन्यास में कहीं कोई अपनी सास से इस वजह से नफ़रत करती दिखाई देती है कि उसने कोई बेटी नहीं बल्कि सब बेटे ही जने हैं। इसी उपन्यास में कहीं कोई किसी की बेवफ़ाई से आहत हो कर भी हर समय उसकी वापसी की बाट जोहता दिखाई देता है। 

इसी उपन्यास में कहीं चार-चार बेटियों का ग़रीब पिता अपनी बेटियों के ब्याह के लिए होने वाले समधियों के आगे गिड़गिड़ाता..चिरौरी करता नज़र आता है। तो कहीं कोई दहेज लोलुप पिता अपने पढ़े-लिखे इंजीनियर बेटे को ऊँचे दामों में बेचने का प्रयास करता दिखाई देता है। इस उपन्यास में कहीं कॉलेज लाइफ को ले कर कोई लड़की रोमानी ख्वाबों में इस हद तक डूबी दिखाई देती है कि असलियत से रु-ब-रु ही नहीं होना चाहती। तो कहीं बेटियों की शिक्षा एवं स्वायत्ता की बात होती दिखाई देती है कि उनके लिए शिक्षित हो कर आत्मनिर्भर बनना कितना जरूरी है। 

इसी किताब में कहीं शादी-ब्याह की तैयारियों और रीति-रिवाज़ों के बारीक चित्रण से पाठक दो चार होता नज़र आता है तो कहीं शादी में बारातियों और घरातियों के खाने में फ़र्क होता दिखाई देता है।

 इसी उपन्यास में कहीं बारात के खाने में बफ़े की आइटम्स में मौजूद पनीर और आइसक्रीम को ज़्यादा से ज़्यादा हड़पने का दृश्य व्यंग्यात्मक हो मज़ेदार बनता नज़र आता है। तो कहीं शादी के दौरान होने वाली अफरातफरी का सजीव चित्रण पढ़ने को मिलता है। कहीं बचपन में देखे गए मेलों का सजीव वर्णन पढ़ने को मिलता है। तो कहीं होली की रंग-गुलाल भरी मस्ती और धमाचौकड़ी में बचपन पुनः मूर्त रूप लेता दिखाई देता है। 

धाराप्रवाह शैली में लिखे गए इस दमदार उपन्यास में एक प्रेमपत्र की भाषा को चमत्कृत बनाने के चक्कर में भाषा का प्रवाह मुझे टूटता हुआ प्रतीत हुआ। साथ ही कॉलेज की पिकनिक के एक दृश्य में ठठा कर हँसने का मौका मिला। कुछ एक जगहों पर प्रूफरीडिंग की कमियों के दिखाई देने के अतिरिक्त तथ्यात्मक ग़लती के रूप में इस उपन्यास में पेज नंबर 88 की अंतिम पंक्ति में लिखा दिखाई दिया कि..

'बाबा को लिफ़ाफ़े में रसीदी टिकट चिपकाता देख श्रद्धा भगवान से मनाती है कि कहीं भी शादी तय हो जाए।'

यहाँ ग़ौर करने वाली बात यह है कि रसीदी टिकट का इस्तेमाल विशेष तौर से लेनदेन के लिए किया जाता है। ये एक प्रकार से शासन को भुगतान किया जाने वाला टैक्स (राजस्व) है जबकि साधारण डाक को भेजने के लिए डाक टिकट का इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए सही वाक्य इस प्रकार होगा कि..

'बाबा को लिफ़ाफ़े में डाक टिकट चिपकाता देख श्रद्धा भगवान से मनाती है कि कहीं भी शादी तय हो जाए।'

संग्रहणीय क्वालिटी के 159 पृष्ठीय इस दमदार उपन्यास के पेपरबैक संस्करण को छापा है हिन्दयुग्म प्रकाशन ने और इसका मूल्य रखा गया है 150/- रुपए जो कि क्वालिटी एवं कंटैंट की दृष्टि से बिल्कुल जायज़ है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका एवं प्रकाशक को बहुत बहुत शुभकामनाएं।

चौसर - जितेन्द्र नाथ


थ्रिलर उपन्यासों का मैं शुरू से ही दीवाना रहा हूँ। बचपन में वेदप्रकाश शर्मा के उपन्यासों से इस क़दर दीवाना बनाया की उनका लिखा 250-300 पेज तक का उपन्यास एक या दो सिटिंग में ही पूरा पढ़ कर फ़िर अगले उपन्यास की खोज में लग जाया करता था। इसके बाद हिंदी से नाता इस कदर टूटा कि अगले 25-26 साल तक कुछ भी नहीं पढ़ पाया। 2015-16 या इससे कुछ पहले न्यूज़ हंट एप के ज़रिए उपन्यास का डिजिटल वर्ज़न ख़रीद कर फ़िर से वेदप्रकाश शर्मा जी का लिखा पढ़ने को मिला। उसके बाद थ्रिलर उपन्यासों के बेताज बादशाह सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के लेखन ने ऐसा दीवाना बनाया कि 2020 के बाद से मैं उनके लगभग 100 उपन्यास पढ़ चुका हूँ। इस बीच कुछ नए लेखकों के थ्रिलर उपन्यास भी पढ़ने को मिले। आज उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए मैं एक ऐसे तेज़ रफ़्तार थ्रिलर उपन्यास 'चौसर' का यहाँ जिक्र करने जा रहा हूँ जिसे अपनी प्रभावी कलाम से लिखा है जितेन्द्र नाथ ने। 

इस उपन्यास के मूल में कहानी है कॉन्फ्रेंस पर मुंबई आए हुए विस्टा टेक्नोलॉजी के पंद्रह एम्प्लॉईज़ के अपने होटल में वापिस ना पहुँच एक साथ ग़ायब हो जाने की। जिसकी वजह से मुम्बई पुलिस से ले कर दिल्ली तक के राजनैतिक गलियारों में हड़कंप मचा हुआ है। अहम बात यह कि उन पंद्रह इम्प्लाईज़ में से एक उत्तर प्रदेश के उस बाहुबली नेता का बेटा है जिसकी पार्टी के समर्थन पर केंद्र और राज्य की सरकार टिकी हुई है। इंटेलिजेंस और पुलिस की विफलता के बाद बेटे की सुरक्षित वापसी को ले कर चल रही तनातनी उस वक्त अपने चरम पर पहुँचने लगती है जब इसकी वजह से सरकार के अस्तित्व पर ख़तरा मंडराने लगता है। 

इसी उपन्यास में कहीं किसी बड़े राजनीतिज्ञ के बेटे के अपहरण की वजह से राजनीतिक गलियारों में चल रही सुगबुगाहट बड़ी हलचल में तब्दील होती नज़र आती है। तो कहीं अपहर्ताओं को पकड़ने में हो रही देरी की वजह से सरकार चौतरफ़ा घिरती नज़र आती है कि उसके वजूद पर ही संकट मंडराता मंडराने लगता है। इसी किताब में कहीं कोई संकटमोचक बन कर सरकार बचाने की कवायद करता नज़र आता है तो कहीं कोई तख्तापलट के ज़रिए सत्ता पर काबिज होने के मंसूबे बनाता दिखाई देता है।

इसी उपन्यास में कहीं देश के जांबाज़ सिपाही अपनी जान को जोख़िम में डाल देश के दुश्मनों का ख़ात्मा करते नज़र आते हैं तो कहीं कोई टीवी चैनल अपनी टी आर पी के चक्कर में पूरे मामले की बखिया उधेड़ता नज़र आता है। कहीं अपहरण का शक लोकल माफ़िया और अंडरवर्ल्ड से होता हुआ आतंकवादियों के ज़रिए पाकिस्तानी खुफ़िया एजेंसी आई.एस.आई की तरफ़ स्थान्तरित होता दिखाई देता है। तो कहीं किसी बड़ी कंपनी को हड़पने की साजिशों के तहत किसी की शह पर कंपनी के शेयरों को गिराने के लिए मंदड़ियों हावी होते दिखाई देते हैं। राजनीति उतार चढ़ाव से भरपूर एक ऐसी घुमावदार कहानी जो अपनी तेज़ रफ़्तार और पठनीयता भरी रोचकता के चलते पाठकों को कहीं सोचने समझने का मौका नहीं देती। 

कुछ एक जगहों पर प्रूफरीडिंग की कमियों के अतिरिक्त इस उपन्यास के शुरू और अंत के पृष्ठ मुझे बाइंडिंग से उखड़े हुए दिखाई दिए। इस ओर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। 

पेज नंबर 103 में लिखा दिखाई दिया कि..

'स्वर्ण भास्कर के प्रोग्राम में नीलेश के साथ एक दर्जन से ज़्यादा कर्मचारियों के अगवा होने के साथ डेढ़ हज़ार करोड़ की फ़िरौती की बात को भी बहुत तूल दिया गया था'

जबकि इससे पहले पेज नंबर 52, 68 और 90 पर इस रक़म को एक हज़ार करोड़ बताया गया है यानी कि फ़िरौती की रक़म में सीधे-सीधे 500 करोड़ का फ़र्क आ गया है। इसी बाद इसी बात को ले कर फ़िर विरोधाभास दिखाई दिया कि पेज नंबर 116 में अपहर्ताओं का आदमी मुंबई पुलिस कमिश्नर से एक हज़ार करोड़ रुपयों की फ़िरौती माँगते हुए उन्हें एक ईमेल भेजी होने की बाबत बताता है लेकिन अगली पेज पर फिर जब उस रक़म का जिक्र ईमेल में आया तो उसे एक हज़ार करोड़ से बढ़ा कर फ़िर से एक हज़ार पाँच सौ करोड़ रुपए कर दिया गया। हालांकि इस पेज पर इस बाबत सफ़ाई भी दी गयी है कि अपहर्ताओं ने माँग की शर्तों में बदलाव कर दिया लेकिन इस तरह की बातों ने बतौर पाठक मुझे थोड़ा सा कन्फ्यूज़ किया। 

साथ ही इस तेज़ रफ़्तार रोचक उपन्यास में एक बात और ख़ली कि फ़िरौती की रक़म भारतीय रुपयों में क्यों माँगी जा रही है? पाकिस्तानियों के सीधे-सीधे तो वो काम नहीं आने वाले। बेहतर होता कि फ़िरौती की रक़म को भारतीय रुपयों के बजाय किसी अंतरराष्ट्रीय करैंसी मसलन अमेरिकन डॉलर या फ़िर यूरो में माँगा जाता । 

हालांकि 279 पृष्ठीय यह बेहद रोचक उपन्यास मुझे लेखक की तरफ़ से उपहार स्वरूप मिला मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि इसके पेपरबैक संस्करण को छापा है सूरज पॉकेट बुक्स ने और इसका मूल्य रखा गया है 225/- रुपए जो कि क्वालिटी एवं कंटैंट को देखते हुए जायज़ है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक एवं प्रकाशक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

बर्फ़खोर हवाएँ - हरप्रीत सेखा - अनुवाद (सुभाष नीरव)


साहित्य को किसी देश या भाषा के बंधनों में बाँधने के बजाय जब एक भाषा में अभिव्यक्त विचारों को किसी दूसरी भाषा में जस का तस प्रस्तुत किया जाता है तो वह अनुवाद कहलाता है। ऐसे में किसी एक भाषा में रचे गए साहित्य से रु-ब-रू हो उसका संपूर्ण आनंद लेने के ज़रूरी है कि उसका सही..सरल एवं सधे शब्दों में किए गए अनुवाद को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचाया जाए। 

अब रचना प्रक्रिया से जुड़ी बात कि आमतौर पर यथार्थ से जुड़ी रचनाओं के सृजन के लिए हम लेखक जो कुछ भी अपने आसपास घटते देखते..सुनते या महसूस करते हैं, उसे ही अपनी रचनाओं का आधार बना कर कल्पना के ज़रिए कुछ नया रचने या गढ़ने का प्रयास करते हैं। क्षेत्र, स्थानीयता.. परिवेश एवं भाषा का असर स्वतः ही हमारी रचनाओं में परिलक्षित होता दिखाई देता है। 

दोस्तों आज अनुवाद और रचना प्रक्रिया से जुड़ी बातें इसलिए कि आज मैं कनाडा की पृष्ठभूमि पर..वहीं के मुद्दों को ले कर रची गयी कहानियों के एक ऐसे संकलन की बात करने जा रहा हूँ जिसे मूल रूप से लिखा है पंजाबी लेखक हरप्रीत सेखा ने और 'बर्फ़खोर हवाएँ" के नाम से इसका हिंदी अनुवाद किया है प्रसिद्ध लेखक एवं अनुवादक सुभाष नीरव जी ने।  

इस संकलन की एक कहानी इस बात पर सवाल खड़ा करती नज़र आती है कि विवाह के बाद महिला के लिए पति का सरनेम ही ज़रूरी क्यों?
तो वहीं एक अन्य कहानी उस दुःखी पिता की व्यथा व्यक्त करती नज़र आती है जिसका, अपने साढ़ू की बेटी का विवाह की तैयारी करवाने के लिए भारत आया जवान बेटा, अपनी पत्नी और छोटे बच्चों को अकेला छोड़ रोड एक्सीडेंट में मारा जा चुका है मगर विडंबना ये कि एक्सीडेंट के कुछ दिनों के भीतर ही विवाह का होना तय हुआ है जिसमें उन सभी को शामिल होना है। 

इसी संकलन की एक अन्य कहानी जहाँ एक तरफ़ झूठी शान के चक्कर में फँसे ऐसे व्यक्ति की बात कहती नज़र आती है जो विदेश में अपनी लगी-लगाई नौकरी महज़ इस वजह से छोड़ कर घर बैठ जाता है कि उसकी सुपरवाइज़र से जिस हरिजन युवक से शादी की है, उसका पिता कभी उनके खेतों में काम किया करता था। तो वहीं एक अन्य कहानी कहानी जॉर्ज और वांडा के पड़ोस में बसने आए उद्दण्ड पड़ोसी के हश्र से इस बात की तस्दीक करती दिखाई देती है कि सेर को भी सवा सेर कभी ना कभी..कहीं ना कहीं  ज़रूर मिलता है। 

इसी संकलन की अन्य कहानी जहाँ घर से हफ़्तों दूर रहने वाले बिज़ी ट्रक ड्राइवर की पत्नी, रूप के एकाकीपन की बात करती है जो खुद को मसरूफ़ रखने के लिए लेखन के ज़रिए फेसबुक में सहारा ढूँढती है। उसकी देखादेखी पति भी अपना फेसबुक एकाउंट बना तो लेता है मगर..
तो वहीं एक अन्य कहानी में कैंसर की वजह से मृत्यु प्राप्त कर चुकी पत्नी, जगजीत के वियोग में तड़पता सुखचैन सिंह अंततः अपनी पत्नी की खुशियों में ही अपनी खुशी ढूँढ़ लेता दिखाई देता है। 

एक अन्य कहानी में जहाँ एक तरफ़ सीमा के साथ हमेशा मारपीट करने वाले शक्की पति को जब एक्सीडेंट के बाद अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है तो ना चाहते हुए भी सीमा का झुकाव अस्पताल में अपनी बीमार माँ की देखभाल के लिए रुके एक अन्य युवक नवदीप की तरफ़ होने तो लगता है मगर ..
तो वहीं दूसरी तरफ़ एक अन्य कहानी एक ऐसे सैक्स एडिक्ट की बात करती दिखाई देती है जिसकी पत्नी, उसकी बुरी आदतों की वजह से उसे छोड़ कर चुकी है और इस सबसे बाहर निकलने की अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद भी उसका भटकाव जारी है। 

 इसी संकलन की एक अन्य कहानी में कंजूस प्रवृति के जग्गा को ना चाहते हुए भी मन मार कर अपनी बेटी, रूबी का विवाह पूरी शानोशौकत के साथ करना तो पड़ जाता है मगर विवाह के कुछ दिनों बाद ही बेटी अपने मायके से फ़ोन कर के यह कह देती है कि वो अपनी हुक्म चलाने वाली सास के साथ ससुराल में नहीं रह सकती। तो वहीं एक अन्य कहानी खेलों के प्रति लोगों के जोश और उन्माद को ज़ाहिर करती नज़र आती है कि किस तरह अपनी चहेती टीम के हारने पर उनके फैन उन्मादी हो जहाँ-तहाँ उत्पात मचाने लगते हैं। 
 
इसी संकलन की एक अन्य कहानी खोखले आदर्शों के साये तले जी रहे लोगों के दोगले रवैये पर चोट करती नज़र आती है। तो वहीं एक अन्य कहानी संकीर्ण सोच के उन लोगों की बात करती नज़र आती है जो वक्त एवं ज़रूरत के हिसाब से बदलने के बजाय अब भी पुराने संस्कारों और झूठी शान से जुड़े रहना चाहते हैं। 

धाराप्रवाह शैली में लिखे इस दमदार कहानी संकलन में कुछ एक जगहों पर मुझे प्रूफरीडिंग की छोटी-छोटी कमियाँ दिखाई दीं। 

संग्रहणीय क्वालिटी के इस 176 पृष्ठीय उम्दा कहानी संकलन के हार्ड बाउंड संस्करण को छापा है राही प्रकाशन, दिल्ली ने और इसका मूल्य रखा गया है 350/- रुपए। पाठकों पर ज़्यादा से ज़्यादा पकड़ बनाने के लिए ज़रूरी है कि इस प्रभावी कहानी संकलन के पेपरबैक संस्करण को जल्द से जल्द उपलब्ध कराया जाए। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक, अनुवादक एवं प्रकाशक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

दरकते दायरे - विनीता अस्थाना

कहा जाता है कि हम सभी के जीवन में कुछ न कुछ ऐसा अवश्य अवश्य होता है जिसे हम अपनी झिझक..हिचक..घबराहट या संकोच की वजह से औरों से सांझा नहीं कर पाते कि.. लोग हमारा सच जान कर हमारे बारे में क्या कहेंगे या सोचेंगे? सच को स्वीकार ना कर पाने की इस कशमकश और जद्दोजहद के बीच कई बार हम ज़िन्दगी के संकुचित दायरों में सिमट ऐसे समझौते कर बैठते हैं जिनका हमें जीवन भर मलाल रहता है कि..काश हमने हिम्मत से काम ले सच को स्वीकार कर लिया होता।

 दोस्तों..आज मैं भीतरी कशमकश और आत्ममंथन के मोहपाश से बँधे कुछ दायरों के बनने और उनके दरकने की बातें इसलिए कर रहा हूँ कि आज मैं 'दरकते दायरे' नाम से रचे गए एक ऐसे उपन्यास की बात करने जा रहा हूँ जिसे लिखा है विनीता अस्थाना ने। 

दूरदर्शन से ओटीटी की तरफ़ बढ़ते समय के बीच इस उपन्यास में एक तरफ़ कहानी है कानपुर और लखनऊ के मोहल्लों में बसने वाले मध्यमवर्गीय परिवारों की। तो वहीं दूसरी तरफ़ इसमें बातें हैं दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों की आपाधापी भरी दौड़ की।

फ्लैशबैक और वर्तमान के बीच बार-बार विचरते इस उपन्यास में कहीं कोई चाहते हुए भी अपने प्रेम का इज़हार नहीं कर पाता तो कहीं कोई इसी बात से कन्फ्यूज़ है कि आखिर..वो चाहता किसे है? कहीं कोई अपनी लैंगिकता को ही स्वीकार करने से बचता दिखाई देता है। 

इसी उपन्यास में कहीं कोई बड़े बैनर के लिए लिखी कहानी के कंप्यूटर के क्रैश होने को वजह से नष्ट हो जाने की वजह से परेशान नज़र आता है। तो कहीं स्थानीयता के नाम पर फिल्मों में दो-चार जगह देसी शब्दों को घुसा के देसी टच दिए जाने की बात पर कटाक्ष होता दिखाई देता है।  कहीं देसी टच के नाम पर फिल्मों में लोकल गालियों की भरमार भर देने मात्र से ही इस कार्य को पूर्ण समझा जाता दिखाई देता है। तो कहीं दूर से देखा-देखी वाली नई-पुरानी आशिक़ी को 'सिटियारी' के नाम से कहे जाने की बात का पता चलता है। 

इसी उपन्यास में कहीं लड़कियाँ आस-पड़ोस और घर वालों की अनावश्यक रोकटोक और समय-बेसमय मिलने वाले तानों से आहत दिखाई देती हैं कि लड़कों से मेलमिलाप बढ़ाएँ तो आवारा कहलाती हैं और लड़कियों से ज़्यादा बोलें-बतियाएँ तो गन्दी कहलाती हैं। तो कहीं भावी दामाद के रूप में देखे जा रहे लड़के के जब हिंदू के बजाय मुसलमान होने का पता चलता है तो बेटी को शह देती माँ भी एकदम से दकियानूसी हो उठती दिखाई देती है।  कहीं हिंदूवादी सोच की वजह से गंगा-जमुनी तहज़ीब के ख़त्म होने की बात उठती दिखाई देती है। तो कहीं खुद की आस्था पर गर्व करने के साथ-साथ दूसरे की आस्था के सम्मान की बात भी की जाती दिखाई देती है। कहीं मीडिया द्वारा सेकुलरिज़्म की आड़ में लोगों को धर्म और जाति में बाँटने की बात नज़र आती है। तो कहीं कोई पति हिटलर माफ़िक अपनी तानाशाही से अपनी पत्नी को अपने बस में करता दिखाई देता है। 

इसी उपन्यास में कहीं बॉलीवुड हस्तियों के पुराने वीडियोज़ को मिक्स कर के गॉसिप हैंडल्स के लाइक बटोरने की बात का पता चलता है। तो कहीं कोई प्यार में निराश हो, नींद की गोलियाँ खा, आत्महत्या करने का प्रयास करता दिखाई देता है। कहीं कोई तांत्रिक की मदद से वशीकरण के ज़रिए अपने खोए हुए प्यार को पाने के लिए प्रयासरत नज़र आता है। तो कहीं कोई मौलाना किसी को किसी की यादें भुलाने के मामले में मदद के नाम पर खुद उसके कुछ घँटों के लिए हमबिस्तर होने की मंशा जताता दिखाई देता है। 

कहीं कोई एक साथ..एक ही वक्त में एक जैसे ही फॉर्म्युले से अनेक लड़कियों से फ़्लर्ट करता दिखाई देता है। तो कहीं ऑनलाइन निकाह करने के महीनों बाद बताया जाता दिखाई देता है कि वो निकाह जायज़ ही नहीं था। कहीं किसी की बेवफ़ाई के बारे में जान कर कोई ख़ुदकुशी को आमादा होता दिखाई देता है। तो कहीं कोई किसी से प्यार होने के बावजूद प्यार ना होने का दिखावा करता नज़र आता है। कहीं कोई अपनी लैंगिकता के भेद को छुपाने के लिए किसी दूसरे के रिश्ते में दरार डालने का प्रयास करता नज़र आता है। तो कहीं कोई किसी को जबरन अपने रंग में रंगने का प्रयास करता दिखाई देता है। 

इस बात के लिए लेखिका की तारीफ़ करनी पड़ेगी कि जहाँ एक तरफ़ बहुत से लेखक स्थानीय भाषा के शब्दों को अपनी रचनाओं में जस का तस लिख कर इसे पाठक पर छोड़ देते हैं कि वो अपने आप अंदाजा लगाता फायर। तो वहीं दूसरी तरफ़ ऐसे स्थानीय एवं अँग्रेज़ी शब्दों के अर्थ को लेखिका ने पृष्ठ के अंत में दे कर पाठकों के लिए साहूलियत का काम किया है। 

कुछ एक जगहों पर वर्तनी की त्रुटियों के अतिरिक्त प्रूफरीडिंग की ग़लतियाँ भी दिखाई दीं जैसे कि..

पेज नम्बर 72 के अंतिम पैराग्राफ में उर्दू का एक शब्द 'तफ़्सील' आया है। जिसका मतलब किसी चीज़ के बारे में विस्तार से बताना होता है लेकिन पेज के अंत में ग़लती से हिंदी में इसका अर्थ 'मापदंड' दे दिया है।

पेज नम्बर 155 में दिए गए अँग्रेज़ी शब्द 'जस्टिफाई' का हिंदी अर्थ 'उत्पन्न' दिया गया है जो कि सही नहीं है। 'जस्टिफाई' का सही अर्थ 'सफ़ाई देना' है। 

धाराप्रवाह शैली में लिखे गए इस उपन्यास में ज़्यादा किरदारों के होने की वजह से उनके आपसी रिश्ते को ले कर पढ़ते वक्त कई बार कंफ्यूज़न हुआ। बेहतर होता कि उपन्यास के आरंभ या अंत में किरदारों के आपसी संबंध को दर्शाता एक फ्लो चार्ट भी दिया जाता कि पाठक दिक्कत के समय उसे देख कर अपनी दुविधा दूर कर सके।

हालांकि यह उम्दा उपन्यास मुझे लेखिका की तरफ़ से उपहार स्वरूप मिला मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि इसके 206 पृष्ठीय पेपरबैक संस्करण को छापा है नोशन प्रेस की इकाई 'प्रतिबिम्ब' ने और इसका मूल्य रखा गया है 267/- रुपए जो कि क्वालिटी एवं कंटैंट को देखते हुए 200/- रुपए तक होता तो ज़्यादा बेहतर था। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका एवं प्रकाशक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

शुद्धि - वन्दना यादव

कहते हैं कि सिर्फ़ आत्मा अजर..अमर है। इसके अलावा पेड़-पौधे,जीव-जंतु से ले कर हर चीज़ नश्वर है। सृष्टि इसी प्रकार चलती आयी है और चलती रहेगी। जिसने जन्म लिया है..वक्त आने पर उसने नष्ट अवश्य होना है। हम मनुष्य भी इसके अपवाद नहीं लेकिन जहाँ एक तरफ़ जीव-जंतुओं की मृत देह को कीड़े-मकोड़ों एवं बैक्टीरिया इत्यादि द्वारा आहिस्ता-आहिस्ता खा-पचा उनके वजूद को खत्म कर दिया जाता है। तो वहीं दूसरी तरफ़  स्वयं के तथाकथित सभ्य होने का दावा करने वाले मनुष्य ने अपनी-अपनी मान्यता एवं तौर-तरीके के हिसाब से मृत देह को निबटाने के लिए ज़मीन में दफ़नाने, ताबूत में बंद कर मिट्टी में दबाने, मीनार जैसी ऊँची छत पर कीड़े-मकोड़ों और पक्षियों की ख़ुराक बनाने    या जला कर सम्मानित तरीके से निबटाने के विभिन्न तरीके अपना लिए। 

सनातन धर्म की मान्यता अनुसार आत्मा फ़िर से जन्म ले किसी नई योनि..किसी नए शरीर को प्राप्त करती है मगर इससे पहले वह तेरह दिनों तक उसी घर में विचरती रहती है। मृतक की आत्मा की शांति के लिए इन तेरह दिनों में घर में गरुड़ पूजा की जाती है। दोस्तों..आज मृत्यु और गरुड़ पूजा से जुड़ी बातें इसलिए कि आज मैं इन्हीं सब बातों से लैस एक ऐसे उपन्यास की बात करने जा रहा हूँ जिसे "शुद्धि" के नाम से लिखा है प्रसिद्ध लेखिका वन्दना यादव ने। वन्दना यादव जी मोटिवेशनल स्पीकिंग एवं समाज सेवा के अतिरिक्त साहित्य के क्षेत्र में भी खासी सक्रिय हैं। 

इस उपन्यास के मूल में कहानी है राजस्थान के एक गाँव उदयरामसर में एक के बाद एक कर के हुई चार मौतों को झेल रहे एक ऐसे परिवार की जिसके दूरदराज से शोक मनाने आए रिश्तेदार भी इन एक के बाद एक हो रही मौतों की वजह से सभी रस्मों के पूरे होने तक एक साथ..एक ही छत के नीचे रहने को मजबूर हो जाते हैं। जिनमें से एक की पत्नी एवं लिव इन पार्टनर भी शामिल है। अपने-अपने व्यस्त जीवन से निकल कर सालों बाद मिल रहे इन रिश्तेदारों में एक तरफ़ मातम का दुःख है तो दूसरी तरफ़ आपस में मिलने जुलने का उल्लास भी। यही खुशी..यही उमंग..यही उल्लास तब खीज..क्रोध एवं हताशा में बदलता जाता है जब उनके वहाँ रहने का समय एक के बाद एक होने वाली मौतों की वजह से और आगे खिसकता चला जाता है। 

इसी उपन्यास में कहीं मृत्य प्राप्त कर चुके व्यक्ति के श्रद्धावश चरण छूने के लिए आयी महिलाएँ अपने हाथ में पकड़े चढ़ावे के बड़े नोट के ज़रिए अपनी संपन्नता का प्रदर्शन करती दिखाई देती हैं तो कहीं  शवयात्रा के ऊबड़ खाबड़ रास्ते में महिलाओं के नंगे पैर जाने या फ़िर आधे रास्ते से ही वापिस लौट जाने की परंपरा की बात होती दिखाई देती है। साथ ही यह उपन्यास, शवयात्रा में पुरुषों के जूते-चप्पल पहन कर और महिलाओं के नंगे पैर जाने की कुप्रथा पर सवाल उठाने के साथ-साथ मृतक के शरीर पर सोना-चाँदी रख कर जलाने के औचित्य पर भी प्रश्नचिन्ह लगाता नज़र आता है। 

इसी उपन्यास में कहीं लेखिका अपने मुख्य किरदार, शेर सिंह के माध्यम से पंडितों द्वारा कही गयी हर बात पर आँखें मूंद कर विश्वास कर लेनी वाली जमात पर भी कटाक्ष करती नज़र आती हैं तो कहीं वे स्त्री-पुरुष के एक समान होने की बात करती नज़र आती हैं। इसी उपन्यास में कहीं किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी तेरहवीं तक उसकी पसंद के खान-पान और उसी की तरह के जीवन को जीने वाले परिवार के पुरुष सदस्य को बीकानेर से सटे उदयरामसर गाँव के अहीर समाज द्वारा 'इकोळिया' कहे जाने की बात का पता चलता है। तो कहीं खामख्वाह के आडंबरों को चलती आयी रीतों के नाम पर ढोया जाता दिखाई देता है। 

इसी उपन्यास में कहीं किसी से जाति के नाम पर भेदभाव करने की बात दिखाई देती है तो कहीं मृत्यु के बाद निकट संबंधियों के लेनदेन पर होने वाले खर्चों को ले कर चिंताग्रस्त बड़ी बहू और बेटे में विमर्श होता दिखाई देता कि इस सबका का खर्चा वही सब क्यों करें। कहीं मर चुके पिता द्वारा छोड़ी गई संपत्ति के बंटवारे को ले कर चिखचिख होती नज़र आती है। 

इसी उपन्यास में कहीं समाप्त होने की कगार पर खड़े ऐसे रिश्तों की बात होती नजर आती है जिन्होंने वर्तमान बुजुर्ग पीढ़ी के नहीं रहने पर खुद-ब-ख़ुद समाप्त हो जाना है। तो कहीं चोरी से औरों की बातें सुनने की आदत पर कटाक्ष किया जाता दिखाई देता है। कहीं किसी नज़दीकी के  मृत्यु जैसे समय पर भी नहीं आने के बहाने बनाने की बात की जाती नज़र आती है तो कहीं कौन-कौन नहीं आया का सारा हिसाब-किताब दिमाग़ी बहीखाते में नोट किया जाता दिखाई देता है। 

इसी उपन्यास में कहीं कोई महिला शमशान की तरफ़ जाते हुए कच्चे रास्ते को देख कर अपने मताधिकार की बात करती नज़र आती है कि इस बार मैं वोट उसी को दूँगी जो यहाँ तक की पक्की सड़क बनवा देगा। तो वहीं दूसरी तरफ़ कोई महिला वोट भी अपने-अपने पतियों की मर्ज़ी से देने की वकालत करती नज़र आती है। कहीं स्त्री-पुरुष के एक समान होने के बावजूद महिलाओं के शमशान तक जाने और अंतिम क्रियाकर्म में भाग लेने में मनाही की बात होती नज़र आती है। तो कहीं गर्मी के दिनों में मृतक के घर में तेरहवीं तक रिश्तेदारों के जमावड़ा,  किसी की चिंता का इस वजह से बॉयस बनता दिखाई देता है कि दिन-रात कूलरों और पंखों के चलने से इस बार बिजली का बिल ज़्यादा आने वाला है।

इसी उपन्यास में कहीं पिता की मूर्ति बनवाने के नाम पर तो कहीं तेरहवीं के भोज में खाने की आइटमों को ले कर तनातनी बढ़ती दिखाई देती है। तो कहीं किसी की मृत्य शैय्या पर एक के बाद एक कर के दो महिलाएँ अपनी चूड़ियाँ तोड़ती नज़र आती है। कहीं किसी की संपन्नता के आगे उसकी ग़लत बात को भी मान्यता मिलती नज़र आती है। तो कहीं किसी का बेटा अपने पिता को मुखाग्नि देने से पहले मुंडन कराने से साफ़ इनकार करता नज़र आता है। 

इसी उपन्यास में कहीं किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके सगे-संबंधी इस वजह से पशोपेश में पड़े नज़र आते हैं कि जिसे उसने संपूर्ण समाज के सामने पूरे धार्मिक रीति रिवाजों से पत्नी स्वीकार किया था, उस स्त्री को पत्नी के रूप में उसने स्वयं मान्यता नहीं दी और जिसके साथ वह स्वयं भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ अपने प्राण त्याग देता है, उसे अब समाज उसकी पत्नी के रूप में मान्यता नहीं देन चाहता।

इसी उपन्यास में कहीं संजीदा विचार विमर्श तो कहीं निंदा पुराण चलता दिखाई देता है। कहीं किसी के अवैध संबंधों पर गुपचुप मंत्रणा होती नज़र आती है। तो कहीं घर का बेटा ही घर के हिसाब-किताब में हेराफेरी करता नज़र आता है। कहीं ओढ़े मुखौटों से इतर लोगों के  असली चेहरे सामने आते दिखाई देते हैं तो कहीं रिश्तों की सरेआम बखिया उधड़ती नज़र आती है।
 
व्यंग्यात्मक शैली में लिखा गया यह प्रभावी उपन्यास थोड़ा खिंचा हुआ एवं कहीं-कहीं स्वयं को रिपीट करता हुआ लगा। साथ ही बहुत ज़्यादा किरदारों  के जमावड़े को अपने में समेटे इस उपन्यास में उनके आपसी रिश्ते को ले कर कंफ्यूज़न हुआ। बेहतर होता कि कहानी के आरंभ या अंत में फ्लो चार्ट के ज़रिए सभी का आपसी रिश्ता स्पष्ट किया जाता। कुछ एक जगहों पर प्रूफरीडिंग की छोटी छोटी कमियाँ दिखाई दीं जिन्हें दूर किया जाना चाहिए।

संग्रहणीय क्वालिटी के इस 200 पृष्ठीय विचारोतेजक उपन्यास के हार्ड बाउंड संस्करण को छापा है भारतीय ज्ञानपीठ (वाणी प्रकाशन) ने और इसका मूल्य रखा गया है 425/- रुपए जो कि मुझे आम हिंदी पाठक की जेब के हिसाब से काफ़ी ज़्यादा लगा। ज़्यादा से ज़्यादा पाठकों तक पहुँच बनाने के लिए ज़रूरी है कि जायज़ कीमत पर इस उपन्यास का पेपरबैक संस्करण भी उपलब्ध कराया जाए। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका एवं प्रकाशक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं। 

कैलेण्डर पर लटकी तारीखें - दिव्या शर्मा

आमतौर पर किसी भी रचना को पढ़ने पर चाहत यही होती है कि उससे कुछ न कुछ ग्रहण करने को मिले। भले ही उसमें कुछ रुमानियत या फ़िर बचपन की यादों से भरे नॉस्टेल्जिया के ख़ुशनुमा पल हों या फ़िर हास्य से लबरेज़ ठहाके अथवा खुल कर मुस्कुराने के लम्हे उससे प्राप्त हों। अगर ऐसा नहीं हो तो कम से कम कुछ ऐसा मजबूत कंटैंट हो जो हमें सोचने..समझने या फ़िर आत्ममंथन कर स्वयं खुद के गिरेबान में झाँकने को मजबूर कर दे। 
दोस्तों आज मैं आत्ममंथन करने को मजबूर करते एक ऐसे लघुकथा संग्रह की बात करने जा रहा हूँ जिसे 'कैलेण्डर पर लटकी तारीखें' के नाम से लिखा है दिव्या शर्मा ने। 
इस संकलन की रचनाओं में कहीं हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात होती दिखाई देती है तो कहीं कुछ अन्य रचनाओं में देह व्यापार से जुड़ी युवतियों की व्यथा व्यक्त कही जाती दिखाई देती है।  कुछ अन्य रचनाओं में लेखिका अपने साहित्यिक संसार से प्रेरित हो रचनाएँ रचती नज़र आती है तो कहीं कुछ अन्य रचनाओं में बिंब एवं प्रतीकों के ज़रिए वे मन के उद्गार व्यक्त करती नज़र आती हैं। साथ ही साथ इस संकलन की कुछ रचनाओं में लेखिका विज्ञान को आधार बना कर अपने मन की बात कहती नज़र आती है। 
इस संकलन की किसी रचना में जहाँ कोई इस बात से परेशान है कि हर बार उसके गर्भवती होंने की उम्मीद जब नाउम्मीदी में बदल जाती है तो उसके श्वसुर का चहकता चेहरा बुझ जाता है। तो वहीं एक अन्य रचना जन्नत की चाह में काफ़िरों का कत्ल-ए-आम कर रही कौम को आईना दिखाती नज़र आती है। एक अन्य रचना में जहाँ एक तरफ़ समाज की बर्बरता के ख़िलाफ़ मानवता के धर्म से मदद माँगने पर वह भी अपनी असमर्थता में अपने हाथ खड़े करता दिखाई देता है। तो वहीं दूसरी तरफ़ एक अन्य रचना, बाप हो या बेटा, दोनों की एक जैसी पुरुषवादी सोच की तरफ़ इशारा करती नज़र आती है। 
एक संकलन की एक अन्य रचना में कोई युवती इस बात के बिल्कुल उलट कि 'सैक्सुअल हैरेसमेंट सिर्फ़ लड़कियों का ही होता है' किसी युवक का शोषण करती नज़र आती है। तो वहीं एक अन्य रचना एक तरफ़ नाबालिग़ द्वारा अपनी मर्ज़ी से बनाए गए सेक्स संबंध तो दूसरी तरफ़ विवाह के बाद जबरन बनाए गए दैहिक संबंधों की बात करती नज़र आती है। एक अन्य रचना जहाँ एक तरफ़ किसी वेश्या की व्यथा व्यक्ति करती दिखाई देती है तो वहीं दूसरी तरफ़ किसी अन्य रचना में एक वेश्या अपने विवाह के प्रस्ताव को ठुकरा कर आत्महत्या कर लेती है कि अपने प्रेमी से विवाह कर वो उसका भविष्य खराब नहीं करना चाहती थी। 
इसी संकलन की एक अन्य रचना में जहाँ चित्रकार के लिए बतौर मॉडल कार्य करने वाली युवती, खुद को दुत्कारे जाने पर चित्रकार को ही आईना दिखाती नज़र आती है। तो वहीं एक अन्य रचना में उस अर्धविक्षिप्त लड़की की बात करती नज़र आती है जो खुद के जैसे ही बलात्कार का शिकार होती बच्ची को अपनी दिलेरी की वजह से बचा लेती है। एक अन्य रचना में एक बलात्कार पीड़िता अदालत में जज के सामने इस बात के लिए सरेंडर करती दिखाई देती है कि उसने देश की कानून व्यवस्था पर विश्वास कर के बहुत बड़ा गुनाह किया । तो वहीं एक अन्य रचना विक्रम बेताल के बहाने हम सब में संवेदनाओं के मर जाने की बात की तस्दीक करती नज़र आती है।
इसी संकलन की एक अन्य रचना नदी में निर्वस्त्र नहाते हुए योगी के उदाहरण के माध्यम से पुरुष मानसिकता का परिचय देती प्रतीत होती है कि पुरुष वस्त्र उतार कर योगी बन जाता है और स्त्री वस्त्र उतारने पर भोग्या। इसी संकलन में कहीं कोई दृढ़ निश्चयी माँ, अपनी सास के दबाव के बावजूद, कम उम्र में अपनी बेटी का ब्याह नहीं करने की के फ़ैसले पर डट के खड़ी दिखाई देती है। तो कहीं किसी अन्य रचना में घर की प्रॉपर्टी में भाई-बहन, दोनों का बराबर का हिस्सा बताया जाता दिखाई देता है। 
इसी संकलन की किसी अन्य रचना में जहाँ एक तरफ़ ऑफिस में कार्यरत किसी युवती का शोषण करने का प्रयास होता दिखाई देता है। तो वहीं दूसरी तरफ़ एक अन्य रचना में जहाँ इंडवा (सर पर रखे पानी भरे मटके को सहारा देने रखा जाने वाला गोल कपड़ा) के बहाने पुराने दिनों को याद किया जाता दिखाई देता है। इसी संकलन की एक अन्य रचना में बूढ़ी सास, अपनी बहू का ध्यान अपनी तरफ़ आकर्षित करने के लिए बीमारी का बहाना करती नज़र आती है। तो कहीं किसी रचना में साड़ी बाँधने के सही तरीके के ज़रिए रिश्तों को संभालने की बात की जाती दिखाई देती है। कहीं किसी रचना में माँ की मृत्यु के बाद घर में सौतेली माँ के आ जाने से नाराज़ हो घर छोड़ चुकी काव्या का मन अपनी नई माँ की व्यथा देख, पिघल जाता है। तो कहीं जीवन की आपाधापी में व्यस्त जोड़ा जब 35 साल बाद, 60 की उम्र में पहली बार पहाड़ों पर घूमने के लिए जाता है। तो बाहर बर्फ़ गिरती देख पत्नी, बरसों पुरानी अपनी ख्वाहिश के पूरा होने से खुश होती नज़र आती है। 
 कहीं किसी लघुकथा में बूढ़े होने पर पिता, बेटे की भूमिका में और बेटा, पिता की भूमिका निभाता नज़र आता है। तो कहीं किसी दूसरी रचना में लिव-इन और विवाह के बीच के फ़र्क को समझाया जाता दिखाई देता है। इसी संकलन की एक अन्य जहाँ एक तरफ़ लघुकथा विधवा विवाह का समर्थन करती नज़र आती है। तो वहीं दूसरी तरफ़ एक अन्य रचना मोहब्बत और इश्क की अलग-अलग परिभाषा पर बात करती नज़र आती है।  कहीं किसी लघुकथा में भारत-पाकिस्तान के बीच बँटवारे के दर्द को घर-परिवार के बीच बँटवारे के दर्द के ज़रिए समझने का प्रयास किया जाता दिखाई देता है। इसी संकलन की एक अन्य रचना हवा-पानी के माध्यम से आपसी भाईचारे का संदेश देती दिखाई देती है कि उन पर किसी एक कौम का हक़ नहीं होता।  तो एक अन्य रचना भगवान राम द्वारा सीता का त्याग किए जाने को नए नज़रिए से सोचने को मजबूर करती दिखाई देती है। 
इसी संकलन की एक अन्य कहानी आरक्षण की साहूलियतों का फ़ायदा उन तक पहुँचने की वकालत करती नज़र आती है, जिन्हें सच में इसकी जरूरत है।  तो वहीं एक अन्य रचना लोगों की कथनी और करनी में फ़र्क की बात करती दिखाई देती है। कहीं किसी रचना में कोई किसान सूखे की आशंका से आने वाली दिक्कतों की बात करता दिखाई देता है। तो कहीं कोई अन्य लघुकथा पुरुषों की बनिस्बत स्त्रियों की केयरिंग नेचर की बात करती दिखाई देती है। कहीं किसी अन्य रचना में शहरों के विकास के साथ-साथ गाँवों के सिकुड़ने की बात की जाती दिखाई देती है तो कहीं किसी अन्य रचना में कोई पुरुष लेखक किसी लेखिका को उसके लेखन की सीमाएँ निर्धारित करने के लिए कहता दिखाई देता है। कहीं किसी अन्य लघुकथा में बाहर साहित्यजगत में औरों को प्रेरित करने वाली मज़बूत इमेज की लेखिका भीतर से बेहद कमज़ोर निकलती नज़र आती है। 
इसी संकलन की एक रचना में पानी को व्यर्थ बहाने वालों पर कटाक्ष किया जाता दिखाई देता है। तो कहीं किस अन्य रचना में आने वाले भयावह समय को ले कर चिंता जताई जाती दिखाई देती है कि लड़कियों को उनके लड़की होने की वजह से पेट में ही मार दिए जाने की वजह से ऐसी स्थिति आ पहुँची है कि लड़कियाँ अब विलुप्तप्राय होती जा रही हैं। 

इस संकलन की कुछ लघुकथाएँ मुझे बेहद प्रभावी लगीं। उनके नाम इस प्रकार हैं : 
1. कैलेण्डर पर लटकी तारीखें
2. आमाल
3. भूखा
4. बेड़ियाँ
5. छिपा हुआ सच
6. रेशमा
7. अर्धविक्षिप्त
8. अंतर
9. रसूलन बी
10. सिसकी
11. वक्त
12. मिलन
13. कुलटा
14. प्यास
15. तिलिस्म
16. इंसानी करामात
17. एक जोड़ी चप्पल
18. विवादित लेखन
19. प्रसिद्धि
20. परदा
21. चमकता आसमान
22. चीख
23. दो बूँद पानी
24. दुर्लभ प्रजाति
हालांकि धाराप्रवाह शैली में लिखा गया यह उम्दा लघुकथा संकलन मुझे लेखिका की तरफ़ से उपहार स्वरूप मिला मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा बढ़िया लघुकथाओं से सुसज्जित इस किताब के 177 पृष्ठीय पेपरबैक संस्करण को छापा है साहित्य विमर्श ने और इसका मूल्य रखा गया है 199/- रुपए जो कि क्वालिटी एवं कंटैंट की दृष्टि से जायज़ है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका एवं प्रकाशक को बहुत बहुत शुभकामनाएं।

ढाई चाल - नवीन चौधरी


देखा जाए तो सत्ता का संघर्ष आदि काल से चला आ रहा है। कभी कबीलों में अपने वर्चस्व की स्थापना के लिए साजिशें रची गयी तो कभी अपनी प्रभुसत्ता सिद्ध करने के लिए कत्लेआम तक किए गए। समय अपनी चाल चलता हुआ आगे बढ़ा तो इसी सत्ता के संघर्ष ने अपना जामा बदल राजाओं-महाराजाओं का इस हद तक दामन संभाल लिया कि भाई, भाई का और पुत्र, पिता तक का दुश्मन बन बैठा। और आगे बढ़ने पर जब लोकतंत्र के नाम पर इनसे सत्ता छिन कर आम आदमी के हाथ में आने की नौटकी हुई तो इन तथाकथित आम आदमियों में भी कमोबेश उसी तरह की उठापठक जारी रही। 

अब जबकि राजनीति हमारे नख से ले कर शिखर तक में इस हद तक समा चुकी है कि यहाँ कॉलोनी के RWA जैसे छोटे चुनावों से ले कर कारपोरेशन और ग्राम पंचायतों से होती हुई छोटी-बड़ी ट्रेड यूनियनों तक हर जगह घुसपैठ कर व्याप्त हो चुकी है। और जो अब दिन प्रतिदिन अपने निकृष्टतम स्तर को पाने के लिए निरंतर झूझती हुई दिखाई दे रही है। 

दोस्तों..आज राजनीति और सत्ता संघर्ष से जुड़ी बातें इसलिए कि आज मैं इसी विषय से जुड़े जिस बहुचर्चित उपन्यास की बात करने जा रहा हूँ जिसे 'ढाई चाल' के नाम से लिखा है लेखक नवीन चौधरी ने। नवीन चौधरी इस उपन्यास से पहले कॉलेज की राजनीति पर एक अन्य सफ़ल उपन्यास 'जनता स्टोर' के नाम से भी लिख चुके हैं। 

इस उपन्यास के मूल में कहानी है प्रतिष्ठित अख़बार 'अर्क' के बड़े पत्रकार 'मयूर' को राजस्थान से, वहाँ के प्रभावशाली राजनीतिज्ञ, 'मानव सिंह' का फोन और ईमेल आता है जिसमें 'सीमा' नाम की एक नाबालिग लड़की से हुए बलात्कार में प्रभावशाली नेता 'राघवेन्द्र' को दोषी बताया जाता है। उसके प्रभावशाली व्यक्ति होने की वजह से उस पर मुकदमा दर्ज करने से इलाके की पुलिस भी झिझक रही है। 

कॉलेज के ज़माने से 'राघवेंद्र' से खार खाने वाले 'मयूर' पर अपने अखबार का सर्क्युलेशन बढ़ाने का मालिकों के दबाव है। ऐसे में सनसनी की चाह में वह मामले की तह तक जाने की ठान लेता है। अब देखना यह है कि चहुं ओर से राजनीति के चक्रव्यूह में घिरा 'मयूर' क्या सच में 'सीमा' को इंसाफ़ दिला पाता है या नहीं? अथवा 'राघवेन्द्र' से पुराना हिसाब चुकाने की चाह में 'मयूर' इस सारे मामले की तह तक जाने के लिए ही हाथ-पाँव मार रहा है? 

छात्र राजनीति से ऊपर उठ राज्य की राजनीति से लबरेज़ इस उपन्यास में कहीं राजनीति के चार महत्त्वपूर्ण स्तंभों की बात होती दिखाई देती है तो कहीं मेवात के लोगों के अन्य मुसलमानों से अलग होने या आधे हिंदू होने और उनके कुआँ पूजने इत्यादि की बात होती नज़र आती है। इसी उपन्यास में कहीं गो रक्षा के नाम पर बने कानूनों की आड़ में अपना फायदा खोजा जाता दिखाई देता है तो कहीं गाय एवं अवैध हथियारों की तस्करी तथा अवैध शराब के धंधे के ज़रिए मोटा पैसा पीटा जाता दिखाई देता है।

 इसी किताब में कहीं 'अपराध नहीं रोज़गार' के नाम पर आम जनता को बरगलाया जाता नज़र आता है। तो कहीं तब्लीगी जमात द्वारा उकसा कर मेवातियों को मुसलमान बनाए जाने की बात होती नज़र आती है।  सत्ता की हिस्सेदारी में धर्म और जाति के घालमेल से उपजी इस घोर राजनीतिक कहानी में  कहीं रंजिशों और साज़िशों का दौर चलता नज़र आता है तो कहीं वर्तमान में अवैध हथियार बनाने वाले सिकलीगरों के ओजपूर्ण इतिहास के बारे में जानकारी मिलती नज़र आती है। 

शुरू से अंत तक बाँधे रखने की क्षमता वाले इस उपन्यास में कहीं नाजायज़ होते हुए भी अपने राजनैतिक प्रभाव के ज़रिए जायज़ करार दे हाइवे की ज़मींत पर डैंटल कॉलेज का बनना एप्रूव होता दिखाई देता है। तो कहीं उद्योगों में स्थानीय लोगों को रोजगार देने के बात पर हवा- हवा में ही ज़ोर दिया जाता दिखाई देता है। इसी उपन्यास में कहीं अच्छी कंडीशन की पुरानी गाड़ियों को औने-पौने दाम पर बेचने के नाम पर कुछ अलग ही गोरखधंधा चलता दिखाई देता है तो कहीं फ़िरौती एवं बदले की नीयत से किसी का वारिस सरेआम अगवा किए जाने के फ़िरौती की रकम मिलने के बावजूद भी मारा दिया जाता है। 

इसी उपन्यास में कहीं हैसियत होते हुए भी दिखावे के तौर ओर सभी विद्यार्थियों से एक-एक रुपया ले छात्र संघ का चुनाव लड़ा जाता दिखाई देता है। तो कहीं कोई अख़बार अपनी साहूलियत के हिसाब से ख़बरें मैनेज करता नजर आता है। कहीं किसी अख़बार के सरकार विरोधी संपादकीयों की वजह से अखबार का मालिक, सरकारी विज्ञापनों में तरजीह ना मिलने से परेशान हो अपने ही संपादक पर गाज गिराता दिखाई देता है। तो कहीं आने वाले चुनावों में राजनैतिक फ़ायदे की चाह में सरकार अख़बारों को विज्ञापन का लालच दे खुद को बिज़नस फ्रैंडली बताते हुए अपनी गोटियाँ सेट करती नज़र आती है। 

 इसी उपन्यास में कहीं नांबियार सरीखा हाईकमान द्वारा बिठाया गया प्रभावशाली पात्र अपने एजेंडे के मुताबिक गोटियाँ सेट करता दिखाई देता है तो कहीं जानबूझ कर दूसरे प्रत्याशी के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए दलित प्रत्याशी को मैदान में उतार अपना उल्लू सीधा किया जाता दिखाई देता है। कहीं प्रेम जैसी पवित्र चीज़ को भी खुद के राजनैतिक फ़ायदे के  मोहरा बनाया जाता दिखाई देता है। तो कहीं अवैध हथियारों की खरीद-बिक्री का पूरा जुग्राफिया समझ धंधे में हाथ डाला जाता दिखाई देता है। 
 
कहीं सरकारी विज्ञापनों के लालच में अख़बार अपनी पॉलिसी से उलट घोर विरोधी से भी समझौते करते नज़र आते हैं। तो कहीं राजनीति के नियमों और अच्छी चाय बनाने के तरीकों में तुलना के ज़रिए समानता बताई जाती दिखाई देती है। इसी उपन्यास में कहीं शह और मात के इस अजब खेल में छोटे प्यादे बड़ों के स्वार्थ के आगे होम होते नज़र आते हैं तो कहीं कदम-कदम पर स्वार्थ और धोखे से लबरेज़ इस कहानी में कब..कौन..कहाँ पलटी मार जाए, पता ही नहीं चलता। 

राजनैतिक उठापटक व वर्चस्व की लड़ाई से जुड़े इस पल-पल चौंकाते इस रोमांचक उपन्यास में कहीं प्यार-मोहब्बत के मामले को अपने फ़ायदे के लिए लव जिहाद का रंग दिया जाता दिखाई देता है तो कहीं पीड़ित को ही डरा धमका कर झूठा बयान देने के लिए मजबूर किया जाता दिखाई देता है।राजनीति और सत्ता में अपनी हिस्सेदारी को ले कर चलती इस उठापठक भर कहानी में कौन..कब.. किसको छल कर अपना उल्लू सीधा कर जाए..कोई भरोसा नहीं। 
 
हालांकि यह उपन्यास अपने आप में संपूर्ण है मगर फिर भी पिछले उपन्यास 'जनता स्टोर' से इस कहानी के जुड़ा होने की वजह से नए पाठकों को थोड़ा कंफ्यूज़न क्रिएट हो सकता है। बेहतर होता कि उपन्यास के प्रारंभ में पिछले उपन्यास की कहानी का संक्षिप्त सारांश दिया जाता। साथ ही ज़्यादा किरदारों के होने से उनके आपसी रिश्ते को ले कर थोड़ा कंफ्यूज़न भी क्रिएट हुआ। बढ़िया रहता यदि उपन्यास के आरंभ या अंत में एक या दो फ्लो चार्ट बना कर किरदारों के आपसी रिश्ते को भी सही से स्पष्ट किया जाता। 

पल पल चौंकाते इस तेज़ रफ़्तार मज़ेदार उपन्यास के 191 पृष्ठीय पेपरबैक संस्करण को छापा है राधा कृष्ण प्रकाशन ने और इसका मूल्य रखा गया है 199/- जो कि क्वालिटी एवं कंटैंट की दृष्टि से जायज़ है। उम्मीद की जानी चाहिए कि लेखक की कलम से और अधिक पढ़ने को रोचक सामग्री निरंतर मिलती रहेगी। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक एवं प्रकाशक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं। 


मून गेट - पूनम अहमद


ऊपरी तौर पर ईश्वर ने सभी मनुष्यों (स्त्री-पुरुष) को एक समान शक्तियाँ तो दी हैं मगर गुण-अवगुण सभी में अलग-अलग प्रदान किए। गौर करने पर हम पाते हैं कि जहाँ एक तरफ़ कोई मनुष्य दया..मानवता..मोह..ममता से ओतप्रोत दिखाई देता है तो वहीं दूसरी तरफ़ कोई अन्य मनुष्य लोभ..लालच..स्वार्थ..घमंड इत्यादि से भरा नज़र आता है। यह गुण या अवगुण स्त्री-पुरुष रूप में समान रूप से पाया जाता है। 

आमतौर पर महिलाओं को उनके मृदभाषी स्वभाव एवं दया..ममता के मानवीय गुणों की वजह से जाना जाता है लेकिन ऐसी महिलाओं की भी कमी नहीं है जिन्होंने समाज की इन तथाकथित मान्यताओं को धता बताते हुए अपने हितों..अपनी इच्छाओं को ही सर्वोपरि रखा। 

दोस्तों..आज मैं ऐसी ही कुछ स्त्रियों को केंद्रीय भूमिका में रख  प्रसिद्ध लेखिका पूनम अहमद के 'मून गेट' के नाम से लिखे गए एक कहानी संकलन की बात करने जा रहा है। अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाली पूनम अहमद जी अब तक 550 से ज़्यादा कहानियाँ और विभिन्न विषयों पर आधारित दो सौ से ज़्यादा लेख लिख चुकी हैं।

इस संकलन की कहानियों में कहीं एक ऐसी स्वावलंबी स्त्री नज़र आती है जिसका मकसद ही अपनी खूबसूरती और जवानी के बल पर ऐश करना है। तो कहीं किसी ऐसी युवती से भी पाठक रूबरू होते नज़र आते हैं जो अपने हित साधने के लिए बात-बात पर झूठ बोलने से भी नहीं चूकती है। 

इसी संकलन की एक कहानी छोटे शहर से मुंबई आ कर प्राइवेट दफ़्तर में काम करने वाली तेज़तर्रार एवं खूबसूरत मोही की बात करती दिखाई देती है। उस मोही की, जिसका मकसद ही अपनी खूबसूरती और दिलकश अदाओं के बल पर अमीर युवकों को फाँस ऐशोआराम की ज़िन्दगी बसर करना है। एक पार्टी में मोही की मुलाक़ात शातिर प्रवृत्ति के हैंडसम हंक, देव चौधरी से होती है जिसका मकसद ही खूबसूरत लड़कियों के साथ ऐश करने के बाद मन भर जाने पर उन्हें छोड़ देने का है। ऐसे में जब एक जैसे दो शातिर व्यक्ति आपस में टकराते हैं तो देखने वाली बात यह है कि इन दोनों में से कौन अपने मकसद में सफल हो पाता है। 

इसी संकलन की एक अन्य कहानी में पलाश के घर और उसके परिवार के सदस्यों के बीच उनकी होने वाली बहू के रूप में अपनी पैठ बना चुकी उस, पलाश से उम्र में बड़ी, अनीशा की बात करती दिखाई देती है। जो हर तरह से उस परिवार के सदस्यों के बीच इस हद तक घुलमिल चुकी है कि वे सब भी उसे अपने परिवार का ही एक अंग मानने लगे हैं। ऐसे में जब अनीशा की कही हर बात बारी-बारी से झूठ साबित होने लगती है तो सब चौंक जाते हैं। 

इसी संकलन की एक अन्य कहानी बैंगलोर में अकेले रह कर नौकरी कर रही अमीर घर की दो बहनों इरा और नीरा में से जब इरा बिना किसी को बताए अचानक ग़ायब हो जाती है तो सभी दोस्त और परेशान हो उठते हैं। ऐसे में स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठ खड़ा होता है कि क्या इरा कभी वापिस लौट पाएगी अथवा कहीं वह किसी धोखे..षड़यंत्र या किसी किस्म के बहकावे का शिकार तो नहीं हो गयी? 

इसी संकलन की एक अन्य कहानी आमोदिनी नाम की उस युवती के महिला और फिर महिला से प्रौढ़ा बनने तक के सफ़र की कहानी कहती नज़र आती है जिसने अपनी इच्छाओं के आगे परिवार और समाज की बिलकुल भी परवाह नहीं की और अपने जीवन को अपनी मर्ज़ी से खुल कर जिया। 

बतौर एक सजग पाठक एवं स्वयं भी एक लेखक होने के नाते मुझे इस संकलन की उत्सुकता जगाती कहानियों के अंत प्रभावित करने में थोड़े असफल रहे। तेज़ रफ़्तार से चलती दिलचस्प कहानी  'मोही' को जहाँ एक तरफ़ आसान सा अंत दे कर सस्ते में समाप्त कर दिया गया। तो वहीं दूसरी तरफ़ 'वो झूठी' कहानी अच्छी शुरुआती पकड़ के बाद शिथिल पड़ती दिखाई दी और अव्वल आते-आते अपने ढीले क्लाइमैक्स की वजह से मात्र औसत ही रह गयी।

 इसी तरह इस संकलन की शीर्षक कहानी 'मून गेट' भी तगड़ी हाइप क्रिएट करने के बाद मुझे बिना किसी सार्थक अंत के के अचानक समाप्त कर दी गयी जैसी लगी। साथ ही इस संकलन की अंतिम कहानी 'आमोदिनी' में कहीं-कहीं दार्शनिकता भरा ज्ञान खामख्वाह उड़ेला जाता दिखाई दिया। उम्मीद की जानी चाहिए कि लेखिका इस तरफ़ तवज्जो देंगी।
 
प्रूफरीडिंग की कमी के रूप में पेज नंबर 114 में लिखा दिखाई दिया कि..

'इरा को डर था कि कहीं पुलिस के लोग देख कर इरा कहीं और गायब ना हो जाए इसलिए उसने फैसला किया कि वह खुद उधर जाएगी और और उसे ढूँढ निकालेगी'

यहाँ 'इरा को डर था' की जगह 'नीरा को डर था' आएगा। साथ ही इसी वाक्य के अंत में ग़लती से दो बार 'और' शब्द छप गया है जबकि ज़रूरत एक की ही थी। 

हालांकि सहज..सरल एवं धारा प्रवाह शैली में लिखा गया यह कहानी संकलन मुझे लेखिका की तरफ़ से उपहार स्वरूप मिला मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि इसके 165 पृष्ठीय पेपरबैक संस्करण को छापा है साहित्य विमर्श प्रकाशन ने और इसका मूल्य रखा गया है 195/ रुपए। जो कि क्वालिटी एवं कंटैंट को देखते हुए जायज़ है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका एवं प्रकाशक को बहुत बहुत शुभकामनाएं। 

दिसंबर संजोग - आभा श्रीवास्तव

वैसे अगर देखा जाए तो हमारे आसपास के माहौल में इतनी कहानियाँ अपने किसी न किसी रूप में मौजूद रह इधर-उधर विचरती रहती है। जिन्हें ज़रूरत होती है पारखी नज़र..सुघड़ हाथों एवं परिपक्व सोच की, जो उन्हें किसी कहानी या उपन्यास का मुकम्मल जामा या फिर कोई छोटा सा हिस्सा ही बना सजा..संवार कर उभार सके।

आँखों के ऑपरेशन की वजह से लगभग 15 दिनों तक किताबों से दूरी के बाद ऐसे ही जिस उम्दा कहानी संकलन को पढ़ने का मौका मिला, उसे 'दिसंबर संजोग' के नाम से लिखा है प्रसिद्ध लेखिका आभा श्रीवास्तव ने। 650 से ज़्यादा रचनाएँ लिख चुकी आभा श्रीवास्तव जी अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छप चुकी हैं। 

धारा प्रवाह शैली में लिखी गयी इस संकलन की कहानियों में कहीं ज़िंदादिल स्वभाव की खूबसूरत प्रिया बनर्जी का अपने सगे मामा के दिलफैंक फौजी बेटे से प्रेम के बाद विवाह तो हो जाता है मगर कुछ ही महीनों के बाद वो एक विधवा के रूप में अपने मायके वापिस लौट आती है। इसके बाद कॉलेज में लैक्चरार लग चुकी प्रिया का अपने से कम उम्र के स्टूडेंट के अफ़ेयर होने के बाद विवाह तो हो जाता है मगर..

इसी संकलन की एक अन्य कहानी में तीन बहनों और एक भाई में सबसे बड़ी रत्ना के ब्याह की तैयारियों में जुटे उसके गरीब माँ-बाप उस वक्त चिंता मुक्त नज़र आने लगते हैं जब ब्याह से एन पहले बुखार की वजह से रत्ना की मृत्यु हो जाती है कि अब उसके दहेज के लिए सहेजा गया सामान छोटी बेटी के दहेज में काम आ जाएगा।  

इसी संकलन की एक अन्य कहानी में जहाँ एक तरफ़ जब तीन खूबसूरत एवं गुणी बहनों में से दो बहनें अपने विवाह के पश्चात लड़का पैदा ना कर पाने की वजह से उपेक्षा/ कमज़ोरीवश मर जाती हैं तो सबसे छोटी बहन पूरी ज़िंदगी विवाह न करने के अपने फैसले पर अडिग हो जाती है। तो वहीं दूसरी तरफ़ एक अन्य कहानी में आँधी तूफ़ान से भरी अँधेरी रात में शहर के नामी गिरामी डॉक्टर श्रीवास्तव को एक बूढ़ा व्यक्ति बेहद गिड़गिड़ा कर मरणासन्न हालात में पड़ी अपनी बेटी का इलाज करने के लिए अपने साथ चलने के लिए राज़ी कर लेता है मगर वहाँ पहुँचने पर पता चलता है कि असल कहानी तो कुछ और ही है। 

इसी संकलन की एक अन्य कहानी में जहाँ सब कुछ जानते समझते हुए भी अमीर घर के कैसेनोवा प्रवृति के गौतम का विवाह, उसकी माँ खूबसूरत दिव्या से कर देती है मगर किसी एक खूँटे से बँध कर रहना गौतम को मंज़ूर नहीं। अपनी गर्भवती पत्नी का त्याग कर गौतम के हमेशा-हमेशा के लिए घर छोड़ कर चले जाने पर गौतम की माँ पछतावे स्वरूप बुरी तरह से टूट कर डिप्रेशन में आ चुकी दिव्या के लिए संबल बनती है। ठीक होने के बाद गौतम की माँ उसका विवाह डॉ. शशांक से करवा देती है। ऐसे में क्या दिव्या, गौतम के साथ गुज़रे  लम्हों और पुरानी बातों को भूल नए सिरे..नयी शुरुआत कर पाएगी? तो वहीं एक अन्य कहानी में बिना अपनी किसी ग़लती के शोभा को अपने ही घर में अपने परिवार से इस हद तक उपेक्षित जीवन जीना पड़ा कि माता-पिता की उदासीनता के चलते अपनी पसन्द के लड़के से विवाह करने पर उसके लिए घर के दरवाजे हमेशा-हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं। अब पिता की मृत्यु के बाद असहाय हो चुकी माँ शोभा से उसे अपने साथ..अपने घर बाकी की बची ज़िन्दगी गुज़ारने के लिए ले जाने की गुहार लगा रही है।

इसी संकलन की एक अन्य कहानी विवाह के छह महीनों बाद ही विधवा हो चुकी उस कल्याणी की बात करती दिखाई देती है। जिसके पड़ोस में रहने वाली भाभी के घर में उनका भाई, अमोल आ कर ठहरा हुआ है। शुरुआती परिचय के बाद कल्याणी के मन में अमोल के प्रति कुछ कोमल भावनाएँ जन्म लेने को होती हैं कि इतने में अमोल का रिश्ता कहीं और तय हो जाता है। क्या कल्याणी कभी अपनी भावनाएँ अमोल के समक्ष व्यक्त कर पाएगी अथवा मूक रह कर अपने मन की बात को मन में ही दबा रहने देगी? 

इसी संकलन की एक अन्य कहानी अधेड़ उम्र के अच्युत और कमसिन अरुंधति की बेमेल जोड़ी के बहाने से इस बात की तस्दीक करती दिखाई देती है कि समय के साथ जीव-निर्जीव में बदलाव तो हो कर ही रहते हैं। इसी संकलन की एक अन्य कहानी में जहाँ एक तरफ़ दबंग जेठानी बन कर कोई औरत अपनी देवरानी के जीवन को नर्क बनाती दिखाई डेट तो वहीं दूसरी ओर कर्कश सास बन कर अपने दब्बू बेटे का जीवन भी तबाह करती नज़र आती है। लेकिन यह भी तो सच का ना कि अपने कर्मों का हिसाब हमें यहीं..इसी जन्म में भुगतना पड़ता है। 

कुछ एक जगहों पर वर्तनी की त्रुटियों के अतिरिक्त कुछ एक स्थानों पर मुझे प्रूफरीडिंग की कमियां भी दिखाएं दी जैसे कि..

पेज नंबर 60 में लिखा दिखाई दिया कि..

'उसी पार्टी में सुनयना को एक और बात पता चली कि सुनयना के साथ गौतम की गहरी दोस्ती थी'

यहाँ 'सुनयना' को नहीं बल्कि 'दिव्या' को पता चलता है कि 'सुनयना के साथ गौतम की गहरी दोस्ती थी' इसलिए सही वाक्य इस प्रकार होगा कि..

' उसी पार्टी में दिव्या को एक और बात पता चली कि सुनयना के साथ गौतम की गहरी दोस्ती थी'

इसी तरह पेज नंबर 61 में एक जगह लिखा है लिखा दिखाई दिया कि..

'मिस फ्रेशर का खिताब जीतने के बाद जब पहले सेमेस्टर में उसके सर्वाधिक अंक आए तो उसने 'ब्यूटी विद ब्रेन' की उक्ति को सार्थक कर दिया था।
 
लेकिन इसी पैराग्राफ में इसके बाद एक और पंक्ति लिखी हुई दिखाई दी जो पहली पंक्ति को ही काटती नज़र आयी कि..

'स्कूल से कॉलेज तक वह पढ़ाई के अलावा हर गतिविधि कार्यक्रम में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेती थी'
जो कि सही नहीं है। अतः सही वाक्य इस प्रकार होगा कि..

'स्कूल से कॉलेज तक वह पढ़ाई के साथ-साथ हर गतिविधि, कार्यक्रम में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेती थी'

हालांकि 148 पृष्ठीय यह उम्दा कहानी संकलन मुझे लेखिका की तरफ़ से उपहार स्वरूप मिला मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि इसके पेपरबैक संस्करण को छापा है सन्मति पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स ने और इसका मूल्य रखा गया है 160 /- जोकि कंटेंट एवं क्वालिटी के हिसाब से जायज़ है। आने वाले उज्जवल भविष्य के लिए लेखिका एवं प्रकाशक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

शैडो - जयंती रंगनाथन

अन्य मानवीय अनुभूतियों के अतिरिक्त विस्मय..भय..क्रोध..लालच की तरह ही डर भी एक ऐसी मानवीय अनुभूति है जिससे मेरे ख्याल से कोई भी अछूता नहीं होगा। कभी रामसे ब्रदर्स की बचकानी शैली में बनी डरावनी भूतिया फिल्मों को देख बेसाख़्ता हँसी छूटा करती थी तो वहीं रामगोपाल वर्मा के निर्देशन में बनी डरावनी फिल्मों को देख कर इस कदर डर भी लगने लगा कि देर रात जगने के बाद बॉलकनी का दरवाज़ा चैक करने में भी डर लगता था कि कहीं ग़लती से खुला ना रह गया हो। अब इसी डर में अगर थ्रिलर फिल्मों सा रहस्य और रोमांच भी भर जाए तो सोचिए कि क्या होगा? 

दोस्तों..आज रहस्य..रोमांच और डर से जुड़ी बातें इसलिए कि आज मैं ऐसे ही विषय पर लिखे गए एक रोचक उपन्यास 'शैडो' की बात करने जा रहा हूँ। जिसे अपनी कलम के जादू से उकेरा है हमारे समय की प्रसिद्ध लेखिका जयंती रंगनाथन ने। कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का सफलतापूर्वक संपादन कर चुकी जयंती रंगनाथन उपन्यासों..कहानी संग्रहों के लेखन एवं संपादन के अतिरिक्त टीवी एवं ऑडियो बुक्स के क्षेत्र में भी खासी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। 

उपन्यास के मूल में जहाँ एक तरफ़ कहानी है मयंक नाम के एक ऐसे लेखक की। जिसकी मिस्ट्री गर्ल, काम्या पर उपन्यास लिखने की कोशिश उस वक्त उसके लिए मुसीबतों का बायस बन जाती है जब उसे इस कहानी से दूर रहने के लिए sms या फ़िर ईमेल पर धमकियाँ मिलनी शुरू हो जाती हैं। तो वहीं दूसरी तरफ़ इस उपन्यास में कहानी है अपने से 30 वर्ष बड़े एक क्राइम मिस्ट्री राइटर,अभय जॉर्ज की ज़िद्दी और बोल्ड पत्नी, काम्या की जो अपने पति की हत्या हो जाने के बाद से ही ग़ायब है। 

सहयोगी किरदारों के रूप में इसमें कहानी है मयंक की मंगेतर बनने जा रही उसकी प्रेमिका, पूर्वा, जो कभी काम्या की सहेली हुआ करती थी, और मयंक के प्रति चाहत रखने वाली उसकी (मयंक की) दोस्त उमा की। मयंक से जुड़े होने के खामियाज़े के रूप में ये दोनों भी उस वक्त मुसीबत में फँस जाती हैं जब उसी तरह की धमकियाँ इन्हें भी मिलनी शुरू हो जाती हैं।

पूर्व जन्म और सम्मोहन पर आधारित इस कहानी में मारिया.. शोभित और रोजर जैसे रहस्यमयी किरदारों के आगमन के बाद कहानी और ज़्यादा उलझती चली जाती है। मारिया, उस शोभित की पत्नी है जो हवाई जहाज़ में मयंक के साथ अपनी सीट बदलने की वजह से प्लेन क्रैश में मारा जा चुका है और शहर का नामीगिरामी पास्ट लाइफ रिग्रेशन थेरेपिस्ट, रोजर शोभित को अपना गुरु बताता है। 


दिल्ली से वायनाड की तरफ़ बढ़ते इस तेज़ रफ़्तार  उपन्यास में कहानी है ईर्ष्या..द्वेष और वर्चस्व बनाए रखने की तमाम जद्दोजहद के बीच सम्मोहन भरे पुनर्जन्मों की। सहज..सरल शैली में लिखे इस बेहद रोचक और रहस्यमयी उपन्यास में एक के बाद एक रोमांच और उत्सुकता से भरे  ऐसे ट्विस्ट्स एण्ड टर्न्स आते हैं कि दर्शक सम्मोहित हुए बिना नहीं रह पाता।

तेज़ गति से चलती हुई इस कहानी में रोचकता और रोमांच और ज़्यादा तब बढ़ जाता है जब नए किरदारों से जुड़े नए प्रश्नों के उभरने से कहानी सुलझने के बजाय और ज़्यादा घुमावदार होती चली जाती है। 

इस बात के लिए जयंती रंगनाथन बधाई की पात्र है कि उलझन भरे किरदारों से लैस इस बेहद उलझी हुई कहानी के सभी घुमावदार पेंचों को उन्होंने आसानी से बिना कहीं भी बिखरे हुए आसानी से सुलझा दिया। 

प्रूफरीडिंग की एक छोटी सी कमी के रूप में पेज नंबर 53 मैं लिखा दिखाई दिया कि..

'मयंक ने मुत्तू से हाथ मिलाया और सपाट आवाज़ में कहा.."मयंक, बिज़नेसमैन हूँ'

यहाँ "मयंक, बिज़नेसमैन हूँ' की जगह अगर "मैं मयंक, बिज़नेसमैन हूँ' आए तो ज़्यादा बेहतर होगा। 

इस 176 पृष्ठीय पैसा वसूल उपन्यास के पेपरबैक संस्करण को छापा है हिन्दयुग्म ने और इसका मूल्य रखा गया है 199/- रुपए जो कि क्वालिटी एवं कंटैंट के हिसाब से जायज़ है। आने वाले उज्जवल भविष्य के लिए लेखिका एवं प्रकाशक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

बातें कम Scam ज़्यादा - नीरज बधवार

खुद भी एक व्यंग्यकार होने के नाते मुझे और भी कई अन्य व्यंग्यकारों का लिखा हुआ पढ़ने को मिला मगर ज़्यादातर में मैंने पाया कि अख़बारी कॉलम की तयशुदा शब्द सीमा में बँध अधिकतर व्यंग्यकार बात में से बात निकालने के चक्कर में बाल की खाल नोचते नज़र आए यानी कि बेसिरपैर की हांकते नज़र आए। ऐसे में अगर आपको कुछ ऐसा पढ़ने को मिल जाए कि हर दूसरी-तीसरी पंक्ति में आप मुस्कुरा का वाह कर उठें तो समझिए कि आपका दिन बन गया।

दोस्तों.. आज मैं ऐसे ही एक दिलचस्प व्यंग्य संग्रह की बात करने जा रहा हूँ जिसे 'बातें कम Scam ज़्यादा' के नाम से लिखा है प्रसिद्ध व्यंग्यकार नीरज बधवार ने। इस व्यंग्य संग्रह में कहीं पुलसिया शह पर फुटपाथ और सड़के कब्ज़ा रहे रेहड़ी- पटरी वालों के ज़रिए दिन प्रतिदिन अमीर पर अमीर होते जा रहे पुलिसकर्मियों के वैभवशाली जीवन पर मज़ेदार अंदाज़ में तंज कसा जाता दिखाई देता है। तो कहीं किसी अन्य व्यंग्य में शादियों और पार्टियों में शगुन से ज़्यादा का खाना ठूँस-ठूँस कर खाने के तौर-तरीकों और कायदों की बात होती नजर आती है। 

कहीं आजकल के लड़के-लड़कियों के सैल्फ़ी के प्रति क्रेज़ पर बात होती नजर आती है तो कहीं किसी के नॉनवेज खरीदने के बजाय लौकी खरीदने की बात पर व्यंग्य उत्पन्न होता नज़र आता है। कहीं ट्रैफ़िक की ऑरेंज बत्ती पर गाड़ी भगाने और हरी बत्ती पर रोकने की बात को ले कर मज़ेदार अंदाज़ में सांप्रदायिकता के इंटरनेट की वजह से फ़ैलने की बात होती नज़र आती है। 

इसी संकलन के किसी व्यंग्य में हाहाकारी तरीके से युवाओं में दिन-प्रतिदिन सैल्फ़ी के बढ़ते क्रेज़ की धज्जियाँ उड़ाई जाती दिखाई देती हैं। कहीं हर समय जल्दी में रह ट्रैफ़िक के नियमों का उलंघन करने वालों पर तो कहीं बड़े नामी गिरामी कलाकारों को ले कर बनने वाली घटिया फिल्मों के करोड़ों रुपए कमाने पर लेखक तंज कसते दिखाई देते हैं। 
इसी संकलन के किसी अन्य व्यंग्य में सलमान खान के बहाने बॉलीवुड में बनने वाली बेसिरपैर की फिल्मों पर तंज कसा जाता दिखाई देता है। तो कहीं किसी अन्य व्यंग्य में स्कूलों-विश्वविद्यालयों में दूसरों की ज़्यादा परसेंटेज आने से औसत बच्चे की दुविधाओं का वर्णन किया जाता दिखाई देता है। 

इसी संकलन के किसी अन्य व्यंग्य में दूसरे के महँगे मोबाइल और खूबसूरत बीवी से अपनी बीवी और मोबाइल की तुलना की जाती दिखाई देती है। तो किसी अन्य व्यंग्य में खुद की कुंडली में भ्रष्टाचार का योग खोजा जाता दिखाई देता है। कहीं सोशल मीडिया कंपनियों द्वारा हमारे निजी डेटा का अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करने पर तंज कसा जाता दिखाई देता है। तो कहीं किसी बड़े देश या नाम की वजह से हमारी भावनाएँ आहत होती नज़र आती हैं। 

कहीं कोरोना के समय वैक्सिनेशन  सैंटरों पर फ़ैली अफरातफरी और लालफीताशाही पर कटाक्ष किया जाता दिखाई देता है। तो कहीं किसी अन्य व्यंग्य में लेखक फेसबुक और वहाट्सएपीय ज्ञान की बदौलत बावले हुए लोगों पर मज़ेदार ढंग से अपनी लेखनी चलाता नज़र आता है। इसी संकलन में कहीं किसी अन्य रचना में देश भर में हो रहे घोटालों को लेखक अपनी सोच का शिकार बनाता दिखाई देता है। तो कहीं किसी अन्य व्यंग्य में अपने घर की आस में आम आदमी धक्के खाता दिखाई देता है। कहीं किसी अन्य रचना में ऑफिस में नयी इंटर्न के आ जाने से रौनक के आ जाने की बात की जाती दिखाई देती है। तो कहीं सरकारी अक्षमताओं को निजी कंपनियों द्वारा दूर कर आम आदमी की जेब काटी जाती दिखाई देती है। कहीं किसी व्यंग्य के ज़रिए टैक्स की चक्की में लगातार पिस रहे आम मध्यमवर्गीय की व्यथा व्यक्त की जाती नज़र आती है। तो कहीं किसी अन्य धारदार व्यंग्य में सिगरेट एवं शराब बिक्री को ले कर बनी सरकारी नीति में जनहित से पहले अपने हित की सरकारी पॉलिसी पर कटाक्ष किया जाता दिखाई देता है।

कहीं दफ्तरों में औरों की अपेक्षा खुद को ज़्यादा मूर्ख सिद्ध करना अपना उल्लू सीधा करने के तौर तरीके बताए जाते दिखाई देते हैं तो कहीं आजकल के तथाकथित गुरुओं से आम आदमी का मोहभंग होता दिखाई देता है। कहीं गुरु की बताई सीख पर चलने के बजाय भगतजन उनकी मृत्य के बाद अपनी मनमानी करते नज़र आते हैं। इसी संकलन के किसी अन्य व्यंग्य में मोटिवेशनल स्पीकर खुद ही डिप्रेशन में जाता दिखाई दे रहा है तो कहीं किसीअन्य व्यंग्य में सस्ते में महँगा माल बेचने वाले भ्रामक विज्ञापनों से लेखक आहत होता नजर आता है। कहीं एफ़.एम के चैनल के घटिया जोक्स सुनाने वाले R.Js द्वारा खुद को खुराफाती, दबंग या डॉन बताने और सबका नम्बर वन RJ होने का दावा करने पर कटाक्ष किया जाता नज़र आता है। तो कहीं भारतीय रेल की लेटलतीफी और रेलवे स्टेशनों की दुर्दशा पर कटाक्ष होता दिखाई देता है।

इस व्यंग्य संग्रह के लेखक एवं प्रूफरीडर की तारीफ़ करनी होगी कि मात्र दो जगहों पर वर्तनी की छोटी त्रुटियों के अतिरिक्त खोजने पर भी बस एक प्रूफरीडिंग की कमी दिखाई दी जिसमें कि पेज नंबर 29 में लिखा दिखाई दिया कि..

'यूनिवर्सिटी ऑफ़ ढोलकपुर के स्टडी के मुताबिक इंसान को मरते वक्त इतना अफ़सोस सच्चा प्यार मिलने का नहीं रहता, जितना शादियों और बुफे में पैसे पूरे कर के ना आ पाने का रहता है'

यहाँ 'इतना अफ़सोस सच्चा प्यार मिलने का नहीं रहता' की जगह 'इतना अफ़सोस सच्चा प्यार नहीं मिलने का नहीं रहता' आएगा। 

*मुसकराहट- मुस्कुराहट
*मुसलिम- मुस्लिम

143 पृष्ठीय इस मज़ेदार व्यंग्य संग्रह के पेपरबैक संस्करण को छापा है प्रभात प्रकाशन ने और इसका मूल्य रखा गया है 250/- जो कि मुझे आम हिंदी पाठक के नज़रिए से थोड़ा ज़्यादा लगा। आने वाले उज्जवल भविष्य के लिए लेखक एवं प्रकाशित को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

कथा चलती रहे- स्नेह गोस्वामी

कई बार कोई खबर..कोई घटना अथवा कोई विचार हमारे मन मस्तिष्क को इस प्रकार उद्वेलित कर देता है  कि हम उस पर लिखे बिना नहीं रह पाते। इसी तरह कई बार हमारे ज़ेहन में निरंतर विस्तार लिए विचारों की एक लँबी श्रंखला चल रही होती है। उन बेतरतीब विचारों को श्रंखलाबद्ध करने के लिए हम उपन्यास शैली का सहारा लेते हैं और कई बार जब विचार कम किंतु ठोस नतीजे के रूप में उमड़ता है तो उस पर हम कहानी रचने का प्रयास करते हैं। मगर जब कोई विचार एकदम..एक छोटे से विस्फोट की तरह झटके से हमारे जेहन में उमड़ता है तो तात्कालिक  प्रतिक्रिया के रूप में लघुकथा का जन्म होता है।

दोस्तों आज लघुकथा से जुड़ी बातें इसलिए कि आज मैं परिपक्व लेखन से लैस एक ऐसे लघुकथा संग्रह की बात करने जा रहा हूँ जिसे 'कथा चलती रहे' के नाम से लिखा है प्रसिद्ध लेखिका स्नेह गोस्वामी ने। कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छपने एवं अनेक पुरस्कारों से सम्मानित होने के अतिरिक्त अंतर्जाल पर भी स्नेह गोस्वामी जी अपनी कविताओं..कहानियों..लघुकथाओं एवं उपन्यासों के ज़रिए लगातार सक्रिय बनी हुई हैं। 

इसी संकलन की एक लघुकथा में जहाँ ज्ञान को छिपा कर रखने वाले गुरुओं पर कटाक्ष होता दिखाई देता तो वहीं एक अन्य लघुकथा इस बात की तस्दीक करती दिखाई देती है कि राजनीतिज्ञ और बड़े अफ़सरान ही देशों के बीच नफ़रत बोने का काम करते हैं बाकी आम जनता तो सभी देशों की एक जैसी ही होती है।

इसी संकलन की किसी अन्य रचना में व्यवसायीकरण की अँधी दौड़ में डॉक्टर/अस्पताल मानवता की साख़ पर बट्टा लगाते नज़र आते हैं। तो कहीं किसी अन्य रचना में बचपत से ले कर बड़े होने तक हर जगह लड़की की ही इच्छाओं पर अंकुश लगाने की प्रवृति पर कटाक्ष किया जाता दिखाई देता है। कहीं किसी अन्य रचना में किसी कुशल गृहणी के सुबह से ले कर देर रात तक घर के कामों में ही खटते रहने की दिनचर्या का वर्णन किया जाता नज़र आता है तो कहीं कोई अन्य रचना आने वाले समय के भयावह मंज़र का वर्णन करती दिखाई देती है कि अब आने वाले समय में शोषण से ना लड़कियाँ और ना ही लड़के मुक्त रहने वाले हैं। 

इसी संकलन की किसी रचना में जहाँ ब्याह के बाद घर आयी नवविवाहिता के उसके शौहर से मोहभंग होने की प्रक्रिया सिलसिलेवार तरीके से वर्णन किया जाता दिखाई देता है। एक वहीं एक अन्य रचना बाहर दफ़्तर में बड़े ओहदे पर काम करने वाली उन स्त्रियों की व्यथा को व्यक्त करती नज़र आती है जिनकी उपलब्धियों को उनके घर में ही कम कर के आंका जाता है। इसी संकलन की एक अन्य रचना अपने लोगों को फिट करने के चक्कर में सिफ़ारिश के बावजूद भी किसी व्यक्ति को सरकारी नौकरी न मिल पाने की बात करती नज़र आती है। तो कहीं किसी रचना में निजी फ़ायदे के लिए सरकारी प्रॉपर्टी को औने पौने में बेचा जाता दिखाई देता है। इसी संकलन की एक अन्य रचना में सास-जेठानियों के साथ हुए कटु अनुभवों को सहती आयी युवती अपनी बहू को हर संभव सुख देने का प्रयास तो करती है मगर...

इसी संकलन की कुछ अन्य रचनाओं में ग़रीबी की चर्चा से अपना नाम चमकाया जाता दिखाई देता तो कहीं किसी अन्य रचना में मामूली सी बात पर हुए झगड़े को सांप्रदायिक रंग दे कर अपनी-अपनी रोटियाँ सेंकी जाती दिखाई देती हैं। कहीं घोंसला बनाने की जुगत में डूबे कबूतर- कबूतरी के ज़रिए शहरों के कंक्रीट के जंगलों तब्दील होने पर कटाक्ष किया जाता दिखाई देता है कि शहरों में साफ़ हवा भी मिल पाना मुमकिन नहीं रह गया है। इसी संकलन की एक रचना जहाँ इस बात की तस्दीक करती नज़र आती है कि सरकारी दफ्तरों का हर कर्मचारी कामचोर या बेईमान नहीं है। तो वहीं एक अन्य रचना बाल मज़दूरी पर बात करती नज़र आती है। 

इसी संकलन में कहीं दफ्तर में मातहत,अफ़सर की चमचागिरी करते नज़र आते हैं। तो कहीं नेताओं की मौकापरस्ती पर तंज कसा जाता दिखाई देता है। कहीं आने वाले खर्चों की चिंता पति-पत्नी को मन मार उस जगह काम पर जाने के लिए मजबूर करती दिखाई देती जहाँ उनका शोषण होना तय है। तो कहीं किसी रचना में गाँव की शांत जिन्दगी से अपने बेटे के पास शहर आयी माँ वहाँ की व्यस्त और बेतरतीब जीवन शैली देख कर बेचैन हो उठती है। 
कहीं किसी रचना में कोई थाली के बैंगन सा अपनी ही बात से पलटता दिखाई देता है। 

इसी संकलन की एक रचना में जहाँ एक तरफ़ सुनीता खुद को और अपनी कामवाली को कमोबेश एक जैसी ही स्थिति में पा, उसकी ही तरह अपने पति का विरोध करने की ठान लेती है। तो वहीं दूसरी तरफ़ एक अन्य रचना पारिवारिक बँटवारे से पैदा हुई रंजिश की बात करती नज़र आती है कि किस तरह आपसी झगड़े में परिवार के परिवार बरबाद हो जाते हैं। कहीं किसी रचना में पिछले दस सालों से लगातार अपमानित और प्रताड़ित होती रही पत्नी भी अपने स्वाभिमान की ख़ातिर आख़िर एक दिन कड़ा कदम उठाने का फ़ैसला कर ही लेती है। तो कहीं किसी अन्य रचना में नए प्रयोग के तौर पर लघुकथा को बेटी समान माना जाता दिखाई देता है। 

इसी संकलन की एक अन्य रचना फ़िर चुहिया की चुहिया वाली पुरानी कहानी की तर्ज़ पर आजकल की दफ़्तरी लालफीताशाही की पोल खोलती नज़र आती है। तो कहीं किसी अन्य रचना में ग़रीब झोंपड़ी वालों को मोहरा बना भर्ष्टाचार के ज़रिए बड़े नेता नोट कूटते दिखाई देते हैं। इसी संकलन की एक अन्य रचना मध्यमवर्गीय परिवारों की व्यथा व्यक्त करती नज़र आती है कि इनमें बरसों पुरानी हसरतों के पूरा होने पर भी अफ़सोस होता कि पैसे व्यर्थ के काम में बेकार कर दिए। कहीं किसी रचना में हिंदी की ज़रूरत और महत्ता को दर्शाया गया नज़र आता है। तो कहीं किसी रचना में घर में बुजुर्गों के होने की महत्ता को दर्शाया जाता दिखाई देता है। कहीं किसी अन्य रचना में हिंदी ही अपने देश में अपनी बेकद्री होते देख विदेश में बस जाने का प्रयास करती दिखाई देती है। 


इसी संकलन की कुछ रचनाएँ मुझे बेहद प्रभावी लगीं। जिनके नाम इस प्रकार हैं...

* कथा चलती रहे
* एक सुर
* विशेषज्ञ
* द्विदाम्नी
* ये शहर तो...
* तीन तलाक़
* पत्थर में दूब
* नो प्रॉब्लम
* काम
* आँखों की ज्योति
* विश्वास की न्यूज़
* छोटी बहू का स्वागत
* रंग बदलता गिरगिट
* विद्रोहिणी
* अपराजेय
* नया सच
* समर्था
* बड़ा होता बचपन
* चक्र-दुष्चक्र
* पत्थर
* फ़ुर्सत
* हसरत
* सुक़ून


इसी संकलन की एक रचना 'कोटा' मुझे थोड़ी तर्कसंगत नहीं लगी कि क्लर्क जैसी छोटी नौकरी पर शिक्षामंत्री जैसा बड़ा नेता अपने बेटे को फिट करवा रहा है। 

पेज नंबर 22 के प्रथम पैराग्राफ में दिखा दिखाई दिया कि..

'मायके से आया सारा उपहार के नाम पर घर भर का सामान बेदर्दी से बिखरा पड़ा था।'

यह वाक्य सही नहीं बना। सही वाक्य इस प्रकार होगा कि..

'मायके से आए उपहार के नाम पर सारा घर का सामान बेदर्दी से बिखरा पड़ा था'
या फ़िर..

'उपहार के नाम पर मायके से आया सारा घर का सामान बेदर्दी से बिखरा पड़ा था'

हालांकि धाराप्रवाह शैली में लिखा गया है यह लघुकथा संग्रह मुझे लेखिका की तरफ से उपहार स्वरूप मिला मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि इसके पेपरबैक संस्करण को छापा है बोधि प्रकाशन ने और इसका मूल्य रखा गया है 150/- रुपए जो कि क्वालिटी एवं कंटैंट की दृष्टि से जायज़ है। आने वाले उज्जवल भविष्य के लिए लेखिका एवं प्रकाशक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
 
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