एक बेचारा

***राजीव तनेजा***    "बधाई हो तनेजा जी...सुना है कि आपको रौद्र रस के प्रख्यात कवि श्री गुस्सेश्वर सिंह धन..धनाधन द्वारा आयोजित कवि सम्मेलन में प्रथम पुरस्कार मिला है"... "जी हाँ!...सही सुना है और वो भी किसी छोटी-मोटी हस्ती के हाथों नहीं बल्कि चिर कुँवारी...'श्रीमति क्रुद्ध कुमारी' के हाथों"मैँ गर्व से अपनी छाती फुलाता हुआ बोला... "चिर कुँवारी...और  श्रीमति?...मैँ कुछ समझा नहीं"... "पागल की बच्ची!...'गर्मागर्म 'मल्लिका' के ज़माने में भी ठण्डी 'श्रीदेवी' की फैन है"... "तो?"......

मैँ तो आरती उतारूँ रे

***राजीव तनेजा***    "उफ!...क्या किस्मत है मेरी?"... "स्साला!...जो कोई भी आता है...बिना जाँचे-परखे ही सीधा ...ठोकता है...बजाता है और अपने रस्ते  चल देता है"... "क्या हुआ तनेजा जी?"... "अब क्या बताऊँ जायसवाल जी....जब दिन बुरे चल रहे हों तो ऊँट पे बैठने के बावजूद भी कुत्ता काट लेता है"... "आखिर हुआ क्या?"... "होना क्या है?.... "सिर मुडाते ही ओले पड़ गए"... "फिर भी...पता तो चले"... "जायसवाल जी!...अपने दिल पे हाथ रख कर आप 'सच का सामना' करते हुए सच-सच बताएँ कि अमूमन एक दिन में...

सौ का आँकड़ा पार

अपने सभी प्रबुद्ध पाठकों को ये बताते हुए मुझे अपार हर्ष हो रहा है कि आप सभी के प्रोत्साहन और सहयोग की वजह से मैँ अपनी रचनाओं(इनमें कुछ अच्छी...कुछ बेकार एव कुछ वाहियात) के आँकड़े को सौ के पार ले जा पाया।आप सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया ... आशा करता हूँ कि आप सभी का प्यार मुझे निरंतर और बढ-चढ कर मिलता रहेगा ...धन्यवाद राजीव तनेजा +919810821361 +919213766753  अपने नए व पुराने पाठकों की सुविधा के लिए मैँ अपनी सभी रचनाओं के लिंक यहाँ पर दे रहा हूँ... 101-"नाम औ निशाँ" 100-"फुल एण्ड फाईनल"...

तोहफा कबूल है हमे....

"मुँह पर सूजन...चाल में लंगड़ाहट...आवाज़ में भारीपन"... "तनेजा जी....ये क्या हाल बना रखा है?"... "कुछ लेते क्यों नहीं?"... "अब क्या बताऊँ गुप्ता जी?...ना किसी को बताते बनता है और ना ही छुपाते बनता है"... "तो क्या बीवी ने?"... "अजी!...अपनों में इतना दम कहाँ कि हमको मिटा सकें....ये तो वो.... "तो फिर किसने आपकी ऐसी हालत कर दी?"... "दरअसल हुआ क्या कि मैँ अपने रोज़ाना के रुटीन के तहत सुबह पार्क में सैर कर रहा था"... "ओ.के"... "पार्क में घुसते वक्त मैँने बाहर खड़ी एक भैंस को रंभाते देखा...तो मेरा...

"नाम औ निशाँ"

***राजीव तनेजा*** "क्या हुआ तनेजा जी?" "सुना है कि आपने होटल वाली नौकरी छोड़ दी"... "अजी!..छोड़ कहाँ दी?...खुद ही निकाल दिया कम्बख्तमारों ने"... "खुद निकाल दिया?"... "आखिर ऐसी क्या अनहोनी घट गई कि उन्हें आपको नौकरी से निकालना पड़ गया?".... "क्या बताऊँ शर्मा जी?...भलाई का ज़माना नहीं रहा".... "आखिर हुआ क्या?"... "होना क्या था?...हमेशा की तरह उस रोज़ भी मैँ रैस्टोरैंट में एक कस्टमर को खाना सर्व कर रहा था कि मैँने देखा कि एक मक्खी साहब को बहुत तंग कर रही है"... "अच्छा...फिर?"... "फिर क्या....मैँने...
 
Copyright © 2009. हँसते रहो All Rights Reserved. | Post RSS | Comments RSS | Design maintain by: Shah Nawaz