मैँ तो आरती उतारूँ रे

***राजीव तनेजा***

 aarti 

"उफ!...क्या किस्मत है मेरी?"...

"स्साला!...जो कोई भी आता है...बिना जाँचे-परखे ही सीधा ...ठोकता है...बजाता है और अपने रस्ते  चल देता है"...

"क्या हुआ तनेजा जी?"...

"अब क्या बताऊँ जायसवाल जी....जब दिन बुरे चल रहे हों तो ऊँट पे बैठने के बावजूद भी कुत्ता काट लेता है"...

"आखिर हुआ क्या?"...

"होना क्या है?....

"सिर मुडाते ही ओले पड़ गए"...

"फिर भी...पता तो चले"...

"जायसवाल जी!...अपने दिल पे हाथ रख कर आप 'सच का सामना' करते हुए सच-सच बताएँ कि अमूमन एक दिन में हम जानबूझ कर...या फिर अनजाने में कितने पाप कर लेते होंगे?"..

"अब इसका कोई एकुरेट या परफैक्ट आँकड़ा तो उपलब्ध नहीं है  बाज़ार में लेकिन...फिर भी मेरे ख्याल से औसतन दस-बारह....या फिर पन्द्रह-बीस तक तो हो ही जाते होंगे"...

"तो क्या आपका जवाब लॉक किया जाए?"...

"जी...ज़रूर"...

"मेरा मानना है कि हमें अपने द्वारा किए गए पुण्यों और पापों का फल इसी जन्म में मिलता है"...

"जी!...बिलकुल सही कहा आपने".....

"मेरे हिसाब से तो ये अगला जन्म...पुनर्जन्म वगैरा सब बेफिजूल और बेमतलब की बातें हैँ"...

"और मुझे पूरा यकीन है कि इन पापों या बुरे कर्मों के असर को किसी भी कीमत पर खत्म नहीं किया जा सकता"...

"जी!...मेरे ख्यालात भी कुछ-कुछ आपसे मिलते जुलते हैँ"...

"कुछ-कुछ?...पूरे क्यों नहीं?"....

"मेरा मानना भी यही है कि हमें अपने कर्मों का फल इसी जन्म में भुगतना होता है लेकिन अपने प्रयासों द्वारा हम इनके असर को कम या ज़्यादा अवश्य कर सकते हैँ"...

"जी"...

"तो इन पापों या बुरे कर्मों के असर को कम करने के लिए आप क्या करते हैँ?"...

"अब ऐसे तो कुछ खास नहीं करता लेकिन कभी-कभार...हाथ जोड़ ऊपरवाले का नाम अवश्य जप लिया करता हूँ"...

"गुड"...

"लेकिन ये तो बताओ कि आखिर हुआ क्या?"...

"अगर मैँने भी यही सोच के ऐसा ही कुछ करने की सोची तो क्या कोई गुनाह किया?"...

"नहीं!...बिलकुल नहीं"..

"लेकिन तुम्हें ऐसा क्यूँ लग रहा है कि तुमने कुछ गलत या अवांछनीय कार्य किया?"...

"दरअसल हुआ क्या कि आज सुबह मैँ बड़े चाव से ये सोच के 'पार्वती' की खोली से निकला कि अपना आराम से नज़दीक के अमरूद वाले बाग में जाऊँगा और ऊपरवाले का नाम ले...भजन-कीर्तन कर अपने दूषित मन को पवित्र कर...अपने जीवन को सार्थक करूँगा"...

"खोली?...तो क्या आप खोली में रहते हैँ?"...

"अजी!..खोली में रहें मेरे दुश्मन...मैँ भला खोली में क्यों रहने लगा?"...

"तो फिर ये पार्वती?"...

"व्वो!...वो तो दरअसल हमारी नौकरानी है"...

"ओ.के...ओ.के"...

"तो क्या तुम नौकरानी के साथ भी....

"जायसवाल जी!...किस्मत की मारी...बड़ी गरीब है बेचारी"....

"ओह!...

"मैँ म्यूचुअल अण्डरस्टैंडिंग के चलते हफ्ते में एक-आध बार उसकी मदद कर दिया करता हूँ"...

"एक-आध बार क्यों?...रोज़-रोज़ क्यों नहीं?"..

"आप भी कमाल करते हैँ जायसवाल साहब!...रोज़-रोज़ बाहर का खाऊँगा तो हाज़मा खराब नहीं हो जाएगा?....और वैसे भी मेरा छोटा-मोटा...रडीमेड दरवाज़े-खिड़कियों का व्यापार है....कोई मिलें थोड़े ही चल रही हैँ कि मैँ दिन-रात उसी को सपोर्ट करता फिरूँ"...

"हाँ!..पिताजी की तरह अगर मैँ भी किसी सरकारी नौकरी में ऊँचे ओहदे पर विराजमान होता तो ऐसा सोच भी सकता था"...

"लेकिन तुम्हारी बीवी क्या इस सब के लिए ऐतराज़ नहीं करती?"...

"हे...हे...हे...हे....उसे पता चलने दूंगा...तब ना"... 

"तो क्या आजकल वो अपने मायके में?".....

"ज्जी!...बिलकुल सही पहचाना आपने"...

"जायसवाल जी...एक रिकवैस्ट है आपसे...प्लीज़!..किसी से कहिएगा नहीं"...

"अगर उसे इस सब के बारे में तनिक सी भी भनक लग गई तो...मेरी तो वो जान ही निकाल लेगी"...

"राजीव जी!...आपने मुझे इतना पागल समझ रखा है क्या?...जो मैँ ऐसी राज़दार बातें सार्वजनिक करता फिरूँ?"

"यार-दोस्तों को नीचा दिखाने की घटिया फितरत तो अपनी कभी रही ही नहीं"...

"हाँ!...कोई दुश्मन वगैरा हो तो ऐसा सोचा भी जाए"....

"आप बेफिक्र हो...पूरी तरह अपने में मदमस्त रहें और जो चल रहा है...जैसा चल रहा है...उसे बिना किसी बाधा के निर्विध्न रूप से वैसा ही चलने दें"...

"यूँ समझिए कि आपने कहा और मैँने सुना ही नहीं"...

"थैंक यू...जायसवाल जी.....थैंक यू वैरी-वैरी मच...आपने तो बहुत बड़े बोझ से मुझे मुक्ति दिला दी"...

"दोस्त आखिर होते ही किसलिए हैँ?....एक दूसरे के राज़ छुपाने के लिए ही ना?"...

"जी"....

"खैर!...आगे क्या हुआ?"...

"जैसा कि मैँ आपको बता रहा था कि ये सोच के पार्वती की खोली से निकला कि अपना आराम से नज़दीक के अमरूद वाले बाग में जाऊँगा और ऊपरवाले का नाम ले...भजन-कीर्तन कर अपने दूषित मन को पवित्र करूँगा"...

"गुड!...बहुत ही बढिया सोच है तुम्हारी"...

"अजी!...काहे की बढिया सोच?"....

"?...?...?....?...

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"निहायत ही घटिया...बेकार और एकदम वाहियात किस्म की पुट्ठी सोच निकली ये तो"...

"मतलब?"....

"गया था मैँ बाग में कि वहाँ के शांत...पावन एवं पवित्र माहौल में जा के अपनी सुप्त लालसा.... ऊप्स!...सॉरी...आत्मा को झंकृत कर जागृत करूँगा"...

"गुड!...ये तो बड़ी अच्छी बात है"...

"लेकिन वहाँ तो जिस तरफ देखो...वहीं एक दूसरे चिपका-चिपकी कर रहे मस्त जोड़ों की भरमार"...

"छी!...हद हो गई नंगपने और बेशर्मी की...किसी में कोई शर्म औ हया ही नहीं बची आजकल...छी!...छी-छी"...

"क्या बताऊँ जायसवाल जी?....मेरा तो पूरा का पूरा मन ही खराब हो गया"...

"लेकिन इस सब से आपको भला क्या फर्क पड़ना था?...आप खुद भी तो.....

"मेरी बात और है जायसवाल जी...मेरे पास तजुर्बा है....संयम है...सोच है...समझ है...और वे सारे नासमझ...कल के लौण्डे...

"आखिर शालीनता नाम की भी कोई चीज़ होती है कि नहीं?"...

"अपना जो भी करो...पर्दे में करो...छुप-छुप के करो....और आराम से आराम फरमाते हुए करो"...

"कौन रोकता है?"...

"ये क्या कि खुलेआम जफ्फी पाई और लग गए डंके की चोट पे चुम्मा-चाटी करने?"...

"आखिर मैँ भी इनसान हूँ...मेरे भी जज़बात हैँ".....

"आपको उन्हें इग्नोर याने के नज़र अन्दाज़ कर देना चाहिए था"...

"जायसवाल जी!...आपकी बात सौ पर्तिशत जायज़ और सही है लेकिन मैँ कोई पत्थरदिल नहीं कि आस-पास होती हुई हलचलों का मुझ पर कोई असर ना हो"...

"ओह!...लेकिन आपको अपने जज़बातों को उभरने देने के बजाय उन पर कंट्रोल करना चाहिए था"...

"वोही तो किया"...

"गुड!...वैरी गुड"...

"तो फिर क्या आप बिना भजन-कीर्तन किए...खाली हाथ...वापिस लौट गए"...

"इतना बुज़दिल समझ रखा है क्या?"...

"जायसवाल जी!...आपने शायद राजीव को ठीक से पहचाना नहीं है...मैँने एक बार जो ठान लिया सो ठान लिया"...

"अब भजन कीर्तन करना है...तो हर हाल में करना है..भले ही सारी दुनिया...कल की इधर होती आज उधर हो जाए"...

"गुड!...इनसान को और...हैवान को अपने उसूलों का पक्का होना ही चाहिए"...

"जी"....

"फिर क्या हुआ?"...

"फिर क्या?...मैँ बिना इधर-उधर ताके सीधा नाक की सीध में चलता चला गया"...

"गुड"...

"अजी!...काहे का गुड?"...

"तीन बार तो मैँ पेड़ों से टकराते-टकराते बचा"...

"ओह!...ओह मॉय गॉड

"बस!...बहुत हो गया...अब और नहीं"...

"?...?...?...?...

?...?...?...?..

"जायसवाल जी!...मैँ किसी कमज़ोर दिल बन्दे से दोस्ती करने के बजाय चुल्लू भर पानी में डूब मरना पसन्द करूँगा.....आज से मेरा आपका रिश्ता खत्म"...

"?...?...?...?...

?...?...?...?...

"आज से आप अपने रस्ते और मैँ अपने रस्ते....ना आपको मेरे किसी मामले से कोई मतलब होगा और ना ही मुझे आपकी किसी बात से कोई सरोकार"...

"आखिर हुआ क्या है?...कुछ बताओगे भी?"...

"उफ!...मैँ आपको क्या समझा और आप क्या निकले?"...

"मतलब?"...

"आप तो मेरे इन ज़रा-ज़रा से दुखों पर बार-बार ओह...आह....ओह मायी गॉड कर रहे हैँ"...

"तो?"...

"जब आप पहाड़ जैसे दुखों से भरी मेरी धीर-गम्भीर दास्तान सुनेंगे तो आप तो दुमदबाते हुए...तुरंत ही कन्नी काट लेंगे"...

"नहीं!...बिलकुल नहीं"....

"तनेजा जी!...आपको गलतफहमी हुई है....मैँ मंझधार में साथ छोड़ने वालों में से नहीं हूँ"...

"क्या सच?"...

"ये वादा है मेरा आपसे कि...कितने भी...कैसे भी गिरे से गिरे हालात क्यों ना उत्पन्न हो जाएँ...ये जायसवाल! आपका पीछा...ऊप्स..सॉरी!...साथ कभी नहीं छोड़ेगा"...

"जायसवाल जी!...भेड़ियों से भरे इस संसार में कैसे मैँ आपका विश्वास करूं कि मौका पड़ने पर आप मुझे दगा नहीं देंगे?"...

"तनेजा जी!..जब भी आपके जी  में आए...आज़मा के देख लेना"...

"ये!...ये जायसवाल आपके एक  इशारे पे अपनी जान न्योछावर ना कर दे तो कहना"...

"आप!...आप कहें तो अभी के अभी...यहीं के यहीं अपनी इहलीला समाप्त कर के दिखा दूँ?"अपनी गर्दन पकड़ उसे दबाते हुए जायसवाल जी बोले...

"पागल हो गए हो क्या?"....मेरे होते हुए भला तुम क्यों मरने लगे?"...

"कोई अगर मरेगा...तो वो मैँ मरूँगा...तुम नहीं"...

"हे ऊपरवाले!...

हे परवरदिगार!...अपने जिगरी दोस्त के लिए ऐसा सोचने...ऐसे अपशब्द बोलने से पहले मेरी ये कलमुँही ज़ुबान कट के क्यों ना गिर गई?"मैँ अपनी ज़बान पकड़...उसे बाहर खींचता हुआ बोला...

"क्या तनेजा जी!...आप भी...इतनी ज़रा सी...मामूली सी बात को दिल पे लगा बैठे हैँ"...

"दोस्ती में ये सब तो चलता रहता है"...

"लेकिन...

"मायूस मत होइए...और आगे बताइए कि उसके बाद क्या हुआ?"..

"ओ.के.."मैँ अपनी नम आँखों को रुमाल से पोंछते हुए बोला

"जैसा कि मैँ बता रहा था कि तीन बार मैँ पेड़ों से टकराते-टकराते बचा...

"जी"...

"लेकिन बगल में खड़े झाड़-झंखाड़ से बच ना पाया"...

"ओह!...तो क्या चेहरे पे ये सूजन और ये खरोंचे उसी झाड़-झंखाड़ में गिरने की निशानी हैँ?"..

"जी नहीं जायसवाल जी!...वहाँ तो मेरा बाल भी बांका ना हुआ...वो कहते है ना कि ...जाको राखे साईयाँ...मार सकै ना कोय

"जी!...एक पुरानी फिल्म का गाना भी तो है....

जिसका कोई नहीं...उसका तो खुदा है यारो"...

"ये मेरा सौभाग्य था कि मेरे वहाँ गिरने से पहले ...एक जोड़ा वहाँ ऑलरैडी गिरा हुआ था और हाय!...मर गया....हाय!...मर गया कर दहाड़ें मार रोता हुआ....ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा था"...

"चिल्ला रहा था?".....

"मतलब!...लड़की कुछ भी...किसी भी किस्म की हाय-तौबा नहीं कर रही थी?"...

"कर क्यों नहीं रही थी?...वो बेचारी तो बस धीमे-धीमे...हौले-हौले से ऑह!...ऊह..आऊच्च....

ऑह!...ऊह..आऊच्च  का  नारा बुलन्द कर मदद के लिए पुकार रही थी"...

"गुड!...यही तो खास बात होती है लड़कियों में...ज़्यादा चूँ-चपड़ नहीं करती...शर्म उनका गहना जो होती है"... 

"जी!...लेकिन वो लड़का तो अव्वल नम्बर का बेशर्म और बेहया इनसान  निकला"...

"वो कैसे?"...

"मेरे गिरते ही हाय!...मर गया....हाय!...मर गया  का इस्तकबाल करना छोड़....

वो पागल का बच्चा अपनी तमाम तकलीफें और सदाचारिता भूल ...सीधा प्वाईंट पे याने के...

तेरी माँ की...तेरी भैण की....तेरे प्यो की....पे आ गया"...

"बाप रे!...फिर तो बड़ा हॉरिबल सीन होगा वो तो"...

"अजी!...हॉरिबल्ल तो तब हुआ होता जब वो मेरा चेहरा देख पाता"...

"तो क्या?"...

"जी!...इससे पहले कि वो मेरा चेहरा देख पाता...मैँने दुम दबाई और बिना आव और ताव देखे ...गिरता पड़ता सीधा नौ दो ग्यारह हो लिया"...

"गुड!...तो इसका मतलब ये चोटें उसी भागमभाग का नतीजा हैँ"...

"जी नहीं"...

"तो फिर?"...

"सच बताऊँ तो डर के मारे मेरी जान ही निकली जा रही थी....इसीलिए तो मैँ वहाँ से दुम दबा कर भाग लिया था"...

"ओ.के"...

"लेकिन मेरा ज़मीर मुझे वापिस बाग में खींच लाया"..

"गुड!...अच्छा किया जो तुमने उनसे माफी माँग ली"...

"कमाल करते हैँ आप भी....मैँ भला क्यों माफी माँगने लगा?"...

"माफी माँगे मेरे वो दुश्मन जो मुझ से पहले उस झाड़ी में गिरे पड़े थे"...

"तो फिर?"...

"भजन-कीर्तन के प्रति मेरा ज़ुनून मुझे वापिस बाग में लौटा लाया"...

"ओह!...

"जाते ही सबसे पहले मैँने बाग में एक सुनसान और बियाबान कोना ढूँढा कि यहाँ कोई मुझे डिस्टर्ब नहीं करेगा"...

"लेकिन तुमने सुनसान और बियाबान कोना ही क्यों ढूँढा?"...

"अन्दर ही अन्दर मैँ महसूस कर रहा था कि आज मेरा मन पूरी तरह से भक्तिभाव में रम नहीं रहा है"...

"ओ.के"...

"मुझे डर था कि इधर-उधर की ताका-झाँकी के चक्कर में मैँ कहीं अपने पथ...अपने रस्ते से भटक ना जाऊँ कहीं"...

"तो इसी चक्कर में तुमने सुनसान कोना चुना?"...

"जी"...

"गुड!...अच्छा किया"....

"अजी!...क्या खाक अच्छा किया?"...

"ओफ्फो!...अब क्या हो गया तुम्हारे साथ?"...

"मैँ पेड़ के नीचे खड़े हो...आँखे बन्द कर...अपने में मग्न हो...श्रधा भाव से मस्त होता हुआ 'संतोषी माता' की आरती गाने लगा...

123

"मैँ तो आरती उतारूँ रे...जै-जै...संतोषी...

"खबरदार!...जो तूने 'आरती' उतारी...मुझ से बुरा कोई ना होगा"...की तेज़ आवाज़ सुन के मैँ चौंक उठा

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"देखा तो सामने रिष्ट-पुष्ट डील-डौल लिए एक लम्बा-चौड़ा...तगड़ा सा ...पहलवान टाईप आदमी अपनी मूँछों को ताव देते हुए मेरे सामने डट कर खड़ा है"...

"ओह!...फिर क्या हुआ?"...

"मैँ कौन सा डरने वाला था?"....

"साफ-साफ खुले शब्दों में पूछ लिया कि...."क्यों भाई!...'आरती' पे तेरा कॉपीराईट है क्या?"...

"व्वो मेरी...

"हाँ-हाँ!...अगर है तो...दिखा"...

"न्नहीं!...वो तो नहीं है मेरे पास"वो हड़बड़ाता हुआ सा बोला...

"उसके स्वर में असमंजस देख मैँ भी चौड़ा हो गया कि मैँ तो उतारूँगा...ज़रूर उतारूँगा 'आरती'"...

"कर ले तुझे जो करना हो"...

"देख!...मैँ कहे देता हूँ....तू बिलकुल नहीं उतारेगा"...

"अरे!...जा-जा...तेरे जैसे छत्तीस आए और छत्तीस चले गए"....

"अभी देख!...मैँ तेरे सामने कैसे आरती उतारता हूँ...देख...

santoshi mata

"मैँ तो आरती उतारूँ रे...जै-जै...संतोषी...

 

"देख!...मुझे गुस्सा ना दिला....आराम से...शांति से मान जा...और 'आरती' मत उतार"....

"मैँ तो उतार के रहूँगा"...

"प्लीज़ यार!...समझा कर"....

"हुँह!...

उसके स्वर में मिमियाहट देख मैँने उसके ऊपर हावी होने की सोची और उसका माखौल उड़ा...शायरी झाड़ते हुए बोला...

"मुझे आरती उतारने से रोक सके...ये तुझ में दम नहीं...तू हम से है...हम तुम से नहीं"...

"गुड!...दुश्मन बेशक जितना मर्ज़ी ताकतवर हो...लेकिन ज़रा सा भी...तनिक सा भी कमज़ोर दिखे...तुरंत उस पे हावी हो जाना चाहिए"...

"जी!...लेकिन मेरे इतना कहते ही पता नहीं उस पागल के बच्चे को जैसे मिर्गी का दौरा पड़ गया हो.....हाँफते-हाँफते...ताबड़तोड़ मुझ पर ऐसे घूँसे बरसाने लगा मानों मैँ कोई जीता-जागता इनसान ना हो कर कोई पंचिंग बैग होऊँ"...

"ओह!...मॉय गॉड...ये तो बहुत बुरा हुआ"....

"आखिर कोई तो वजह रही होगी जो वो इस कदर हिंसा पर उतर आया"...

"जी!....उस वक्त तो मैँ बेहोश हो गया था...होश में आने के बाद लोगों से पता चला कि उसकी बेटी का नाम 'आरती' है और वो उस समय उसी पेड़ के ऊपर चढ कर अमरूद चोरी कर रही थी"...

"क्या?"...

***राजीव तनेजा***

Rajiv Taneja

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सौ का आँकड़ा पार

rajeev_taneja

अपने सभी प्रबुद्ध पाठकों को ये बताते हुए मुझे अपार हर्ष हो रहा है कि आप सभी के प्रोत्साहन और सहयोग की वजह से मैँ अपनी रचनाओं(इनमें कुछ अच्छी...कुछ बेकार एव कुछ वाहियात) के आँकड़े को सौ के पार ले जा पाया।आप सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया ...

आशा करता हूँ कि आप सभी का प्यार मुझे निरंतर और बढ-चढ कर मिलता रहेगा ...धन्यवाद

राजीव तनेजा

+919810821361

+919213766753 

अपने नए व पुराने पाठकों की सुविधा के लिए मैँ अपनी सभी रचनाओं के लिंक यहाँ पर दे रहा हूँ...

101-"नाम औ निशाँ"

100-"फुल एण्ड फाईनल"

99-साहब!...मक्खी ही तो है

98-चमत्कार को नमस्कार

97-बरसात पैसों की

96-निकाल इसी बात पै सौ का नोट

95-"बम चिकी बम...बम....बम"

94-"कसम कनखजूरे के तिरछे कान की"

93-"ये इंडिया है मेरी जान"

92-"हट ज्या...सुसरी...पाच्छे  ने"

91-"टीं...टीं...बीप...बीप"

90-"खबरों में से खबर सुनो"

89-"एक बराबर"

88-"कहानी एक रक्तजीवी की" 

87- मेरी प्रेम कहानी

86-महिमा मंडन एक ग्राम सेवक का

85-"व्यथा-बिचौलियों की"

84-"व्यथा-एक कहानी चोर की"

83-"व्यथा-चालू चिड़िया की"

82-"काम हो गया है...मार दो हथोड़ा"

81-"व्यथा-एक उभरते 'ब्लात्कारी' ब्लागर की"

80-"व्यथा-ब्लैकिए की"

79-"व्यथा-झोलाछाप डाक्टर की"

78-"जय बोलो बेईमान की"

77-"छोड़ो ना!...कौन पूछता है?"

76-"अन्धा बाँटे रेवड़ियाँ"

75-"क्यों!...है कि नहीं?"

74-"रहम कर रहम कर रहम कर"

73-"मज़ा ना आए तो...पैसे वापिस"

72-"अभी बहुत जान बाकी है"

71-"शश्श!...कहानी अभी बाकी है"

70-"कोई होली-वोली नहीं खेलनी है इस बार"

69-"राम मिलाई जोड़ी...एक अन्धा...एक कोड़ी"

68-"ना हींग लगी ना फिटकरी...रंग चढा चोखा ही चोखा"

67-"यस!.. वी आर दा बैस्ट कॅपल"

66-"बीती ताहीं बिसार के"

65-"निबटने की तुझसे कितनी हम में खाज है"

64-"अलख निरंजन"

63-"बिना खडग बिना ढाल"

62-"रहेगा वर्चस्व हमेशा दिल्ली का"

61-"थमा दो गर मुझे सत्ता"

60-"कोई नहीं है हीरो इनमें"

59-"धीर धरो बस धीर धरो"

58-"टीस सी दिल में सौ बार उठी है"

57-"सर पे लटकती ये तलवार है "

56-"क्रिकेट ज़िन्दा दफन हुआ"

55-"कविता के किटाणु कुलबुलाने लगे हैँ"

54-"रिश्वतखोरी जेबें"

53-"आठ चालीस की पसैंजर अभी बाकी है"

52-"सौगन्ध राम की खाऊँ कैसे "

51-"दायाँ हाथ...बायाँ हाथ"

50-बेगम मिल जातीतो

49-"भड़ास दिल की कागज़ पे उतार लेत आ हूँ मैँ"

48-"इतनी शक्ति हमें देना दाता"

47-"हाँ!...नपुंसक हूँ मैँ"

46-"तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो"

45-"क्यों लिखता हूँ मैँ"

44-"इस प्यार को क्या नाम दूँ"

43-"इंकलाब ज़िन्दाबाद"

42-"आओ खेलें हम ब्लागर-बलागर"

41-"तलाश मुझे है किसकी"

40-"बडा दिन"

39-"ठण्डे-ठण्डे पानी से नहाना चाहिए"

38-"कुछ जतन करो मेरे भाई"

37-"हाँ मैँ सरदार हूँ"

36-"बधाई हो बधाई"

35-"सलाम-नमस्ते"

34-"चौथा खड्डा"

33-"गधे के पीछे गधा"

32-"शाही पनीर या फिर दाल मक्खनी"

31-"स्टिंग आप्रेशन"

30-"दुनिया आपकी जेब में"

29-"क्या मालूम कल हो ना हो?"

28-"हर फिक्र को धुएँ में उडाता चला गया"

27-"क्या से क्या हो गया?"

26-"बुरा दिन"

25-"है बस यही अरमान"....

24-"नया मेहमान"

23-"आओ तौबा करें"

22-"बिन माँगे मोती मिले"

21-"लेडीज़ फर्स्ट"

20-"सजन रे बूट मत खोलो"

19-"आसमान से गिरा"

18-"बोया पेड बबूल का"

17-"सांता ज़रूर आएगा"

16-"दोस्त दोस्त ना रहा"

15-"ज़मीर जाग उठा"

14-"शादी का लड्डू"

13-"राम नाम सत्य"

12-"क्या माजरा था?"

11-"अब तक छ्प्पन"

10-"मेरा नाम करेगा रौशन"

9-"पूरे चौदह साल"

8-"खेल खिलाडी का"

7-"रुखसाना को नहीं छोडुंगा"

6-"जन्तर मन्तर काली कलन्तर"

5-"घूमती है दुनिया घुमाने वाला चाहिए"

4-डंडा किसका है

3-"धोबी का कुत्ता"

2-"एक डुबकी और सही"

1-"माशूका गयी तेल लेने"

तोहफा कबूल है हमे....

"मुँह पर सूजन...चाल में लंगड़ाहट...आवाज़ में भारीपन"...

"तनेजा जी....ये क्या हाल बना रखा है?"...

"कुछ लेते क्यों नहीं?"...

"अब क्या बताऊँ गुप्ता जी?...ना किसी को बताते बनता है और ना ही छुपाते बनता है"...

"तो क्या बीवी ने?"...

"अजी!...अपनों में इतना दम कहाँ कि हमको मिटा सकें....ये तो वो....

"तो फिर किसने आपकी ऐसी हालत कर दी?"...

"दरअसल हुआ क्या कि मैँ अपने रोज़ाना के रुटीन के तहत सुबह पार्क में सैर कर रहा था"...

"ओ.के"...

"पार्क में घुसते वक्त मैँने बाहर खड़ी एक भैंस को रंभाते देखा...तो मेरा मन खुद बा खुद गाने के लिए मचल उठा"...

"गुड!...खरबूजे को देख कर खरबूजे का रंग बदलना तो लाज़मी है ही"....

"जी"...

"फिर क्या हुआ?"...

"मैँने लम्बी तान ली और शुरू हो गया...

"तोहफा कबूल है हमें सरकार आपका...

ले आया फिर हमें यहीं...लो प्यार आपका"...

"ओ.के"....

"मैँने कुछ बुरा तो नहीं किया ना?"...

"नहीं-नहीं...बिलकुल नहीं .....जिस तरह सैर करने से हम तन्दुरस्त रहते हैँ और हँसने...खिलखिलाने से हमारी टैंशन...हमारा तनाव दूर होता है...ठीक उसी तरह गीत गुनगुनाने से भी कई रोगों से मुक्ति मिलती है"...

"जी"...

"फिर क्या हुआ?"...

"मैँने लम्बी तान ले अपना प्रलाप...

ऊप्स!....सॉरी आलाप शुरू ही किया था कि मुझ से आगे चल रहे एक सरदार जी अचानक ठिठक कर रुक गए और मुझे घूर कर देखने लगे"...

"ज़रूर बीवी से लड़ कर आया होगा...इसलिए उसे तुम्हारा ऐसे पब्लिक प्लेस में खुश हो कर खुलेआम गाना रास नहीं आ रहा होगा"....

"जी!...पहलेपहल मुझे भी ऐसा ही महसूस हुआ लेकिन....

"लेकिन तुम्हें भी क्या ज़रूरत थी खुश हो लम्बी तान ले आलाप लगाने की?....अपना आराम से...धीमे से....हौले-हौले भी तो गुनगुना सकते थे"...

"बात तो आपकी सोलह ऑने सही है गुप्ता जी लेकिन जोश में भला होश कहाँ रहता है?"...

"ये तो है"...

"भैंस की मधुर रंभाहट सुन मुझ से रहा ना गया और दिल के हाथों मजबूर हो पता ही नहीं चला कि कब मेरी आवाज़ तेज़ पर तेज़ होती चली गई"...

"ओ.के...फिर क्या हुआ?"...

"मैँ अपने किए पे शर्मिन्दा हो उनसे आँखे नहीं मिला पा रहा था"....

"गुड!...शरीफ आदमी के यही लक्षण होते हैँ"...

"तुम्हें उन्हें बिना किसी झिझक के 'सॉरी' बोल देना चाहिए था"....

"जी!...यही सोच कि जो होगा देखा जाएगा...मैँने हिम्मत जुटाई और आहिस्ता से उनकी तरफ देखा"....

"गुड"...

"वो मेरी ही तरफ देख रहे थे"...

"ओ.के"...

"फिर मैँने दिल पक्का कर के अपने अन्दर के मर्द को जगाया"....

"दैट वाज़ लाईक ए ब्रेव मैन"...

"बहादुर आदमियों के यही लक्षण होते हैँ...वो बड़ी से बड़ी...कठिन से कठिन आपदा से भी जूझने की क्षमता रखते हैँ"....

"जी"...

"मुसीबतों से टकराना उनके बाएँ हाथ का खेल होता है"....

"बस इसी विचारधारा के चलते मैँने भी अपने हौंसले को पस्त ना होने देने की ठान ली और धीमे से डरते-डरते उनकी तरफ देखा"....

"ओ.के"...

"मैँ हिम्मत जुटा उन्हें सॉरी बोलने ही वाला था कि उनके चेहरे पे मुस्कुराहट देख मैँने अपना इरादा बदल लिया"...

"फिर क्या हुआ?"...

"पहले तो वो कुछ क्षण के लिए टकटकी लगा मुझे निहारते रहे...फिर हौले से मुस्काए"...

123

"ओ.के...फिर?"....

"फिर वो धीमे कदमों से चलते हुए मेरे पास आए और मेरे मासूम चेहरे को अपने कोमल हाथों में थाम लिया"...

"ओह माई गॉड!...फिर क्या हुआ?"...

"उन्होंने मेरे माथे को हौले से चूम मुझे गले से लगा लिया"...

"हॉय ओ रब्बा!...मैँ मर जावाँ गुड़ खा के"....

"क्या सच में ऐसा हुआ था?"...

"और नहीं तो क्या मैँ झूठ बोल रहा हूँ?"...

"फिर क्या हुआ?"..

"उसके बाद उन्होंने मेरा नाम...फोन नम्बर...पता...काम क्या करता हूँ वगैरा-वगैरा पूछा"...

"और तुमने सब कुछ सच-सच बता दिया?"...

"जी"...

"गुड!...ऐसे मौकों पर तो झूठ बिलकुल भी नहीं बोलना चाहिए"....

"जी!...

"दैन व्हाट?....उसके बाद क्या हुआ?"...

"उसके बाद वो अपने रस्ते और मैँ अपने रस्ते"...

"धत्त तेरे की"...मतलब सारी की सारी कहानी यहीं टांय-टांय फिस्स हो गई"...

"अजी!...ऐसे कैसे फिस्स हो गई?"...

"अभी तो यूँ समझिए कि बस इंटरवैल याने के मध्यांतर हुआ है...असली ट्विस्ट तो कहानी के अंत याने के क्लाईमैक्स में है"...

"ओह!...रियली?"....

"जी"...

"ओ.के....उसके बाद क्या हुआ?"...

"उसके बाद मैँ घर जा के नहाया-धोया और अपने काम पर चला गया"...

"ओ.के"...

"वापिस आने पे देखता हूँ कि बाहर बरामदे में एक ऐंटीक टाईप का मैला-कुचैला पुराना सा सोफा पड़ा है"...

sofa

"ज़रूर आपकी श्रीमति जी ने कबाड़ी को देने के लिए घर से बाहर निकाल के रखा होगा"...

"अजी!...ऐसे-कैसे बाहर निकाल के रखा होगा?"

"मेरे हुक्म के बिना मेरे घर का एक पत्ता भी इधर से उधर नहीं होता है और फिर सोफा तो बहुत बड़ी चीज़ है"...

"ओ.के"...

"मैँने श्रीमति जी से पूछ तो उन्होंने तपाक से जवाब दिया कि तुम्हीं ने तो मँगवाया है...एक सरदार जी आए थे और वही छोड़ कर गए हैँ"...

"मैँ हैरान..परेशान कि मैँने तो किसी से कोई सोफा नहीं मँगवाया है और अगर मँगवाता भी तो ऐसा सड़ा सा...अजीबो-गरीब थोड़े ही मँगवाता?"...

"ओ.के"...

"मैँ हैरान हो बीवी का चेहरा ताक ही रहा था कि उसने कहा कि सरदार जी आपके बारे में पूछ रहे थे कि...

"कब आएँगे?"....

"मैँने कह दिया कि शाम को आएँगे"....

"फिर क्या हुआ?"...

"होना क्या था?...बीवी मुझ पर ही गर्म होती चली गई कि...

पहले तो ऐसा अड़ंगा खरीदना नहीं था और अब अगर खरीद ही लिया तो बेचारे को पेमेंट के लिए चक्कर क्यों कटवाते हो?...सुबह से अगला तीन दफा आ चुका है"...

"ओ.के"...

"मैँ उसे समझा-समझा के थक गया कि मैँने कोई सोफा नहीं खरीदा है लेकिन बीवी मानने को तैयार नहीं....

बोली..."तो क्या ऐसे ही उस बेचारे का दिमाग फिर गया को जो इतने बड़े बवाल को टैम्पो में लाद के तुम्हारे दरवाज़े पे छोड़ गया?"....

"अभी मैँ उससे कुछ कहता कि कि इस से पहले ही ट्रिंग-ट्रिंग कर कॉलबैल अपनी कर्कश ध्वनि के साथ बज उठी"...

"वही होंगे"मेरे कुछ कहने से पहले ही बीवी बोल उठी

"अभी देखता हूँ कि कौन है वो महानुभाव?"कह मैँने जैसे ही दरवाज़ा खोला तो देखता हूँ कि वही पार्क वाले सरदार जी अपनी उसी सौम्य मुस्कान के साथ सामने खड़े थे

"ओह!...

"जी गुप्ता जी!...आप ही की तरह मैँ भी आश्चर्यचकित था"...

"ओ.के"...

"उन्हें ऐसे अचानक अपने दरवाज़े पे खड़ा देख मैँ हड़बड़ा गया और मुँह से बस यही निकला कि..."ओह!...आप"...

"जी"कह उन्होंने मुझे अपने नर्म और कोमल हाथों से मेरे चेहरे को थाम.....मेरे माथे को चूम मुझे गले से लगा लिया"...

"गुड!...वैरी गुड"...

"अजी!...काहे का गुड...वैरी गुड?"...

"क्यों?...क्या हुआ?"...

"दो चुम्मी क्या ले ली?...मुझ से उसके दाम माँगने लगे"...

"क्या?"...

"जी"...

"कितने पैसे माँगे उन्होंने?"...

"पूरे पाँच हज़ार"...

"हे ऊपरवाले!...तेरी इस दुनिया में शरीफ आदमी को कोई आराम से जीने भी देगा या नहीं?"गुप्ता जी ऊपर आसमान में देखते हुए हिस्टीरियाई अन्दाज़ में चिल्लाए...

"जी!...गुप्ता जी...बिलकुल यही ख्यालात मेरे दिमाग में भी आए थे लेकिन भैंस के आगे बीन बजाने से क्या फायदा?"...

"तो फिर क्या तुमने?.....

"इतना पागल समझ रखा है क्या मुझे?"....मैँने भी ईंट का जवाब पत्थर से देने की सोची और उनके चेहरे पे  धड़ाधड़ आठ-दस चुंबन बरसा डाले और चिल्ला कर कहा कि निकाल बाकि के पैसे"...

"गुड!...अच्छा किया"...

"फिर क्या हुआ?"..

"स्साले!...की हालत पतली हो गई...मिमिया कर बोला...

"तू....तू सुबह मुझे पार्क में मिला था"...

"मैँ कोई डरने वाला था?"...झट से सीना तान बोल दिया...

"हाँ!...मिला था"...

"आगे बोल"...

"तो निकाल इसी बात पे पूरे पाँच हज़ार रुपए"अपनी आस्तीन चढा लालपीले होते हुए सरदार जी बोले

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"बाप का माल समझ रखा है क्या?"...

"मैँ कहता हूँ सीधे-सीधे दे दे मेरे पैसे"कहते हुए वो मेरी जेब की तरफ झपटे...

"अरे वाह!...बड़ा ही बेशर्म किस्म का इनसान था...तुम्हारे ही पैसों पर अपना हक जताने लगा"....

"जी!....गुप्ता जी"...

"हद हो गई सीनाज़ोरी की"...

"जी"...

"फिर क्या हुआ?"...

"मैँने उसे लाख चलता करने की कोशिश की लेकिन ऐसा ढीठ की जाने का नाम ही नहीं ले रहा था...उलटे मुझे पुलिस बुलाने की धमकी देने लगा"...

"अजीब अहमक आदमी था"...

"कहने लगा कि..."तू....तू सुबह मुझे पार्क में मिला था ना?"...

"मैँ भला क्यों झूठ बोलने लगा?...साफ-साफ कह दिया कि हाँ!...मिला था?"...

"तू!...तू गाना गा रहा था"...

"हाँ!...गा रहा था...कोई शक?"....

"तो निकाल पाँच हज़ार रुपए"...

"अरे वाह!...उसने तो पूरी अन्धेरगर्दी मचा रखी थी....ये कहाँ का इनसाफ है गाना भी तुम गाओ और पैसे भी तुम दो?"...

"गुप्ता जी!...बिलकुल यही बात मैँने उससे भी कही"...

"ओ.के"...

"मेरा इतना कहना था कि वो पागल का बच्चा तो लातों और घूंसों की मुझ पर बरसात करता हुआ मुझ से पिल्ल पड़ गया कि ...स्साले तू गाना गा रहा था कि...

"सोफा कबूल है हमें....सरदार आपका"....

***राजीव तनेजा***

Rajiv Taneja

Delhi(India)

http://hansteraho.blogspot.com

rajivtaneja2004@gmail.com

+919810821361

+919213766753

"नाम औ निशाँ"

***राजीव तनेजा***

"क्या हुआ तनेजा जी?"

"सुना है कि आपने होटल वाली नौकरी छोड़ दी"...

"अजी!..छोड़ कहाँ दी?...खुद ही निकाल दिया कम्बख्तमारों ने"...

"खुद निकाल दिया?"...

"आखिर ऐसी क्या अनहोनी घट गई कि उन्हें आपको नौकरी से निकालना पड़ गया?"....

"क्या बताऊँ शर्मा जी?...भलाई का ज़माना नहीं रहा"....

"आखिर हुआ क्या?"...

"होना क्या था?...हमेशा की तरह उस रोज़ भी मैँ रैस्टोरैंट में एक कस्टमर को खाना सर्व कर रहा था कि मैँने देखा कि एक मक्खी साहब को बहुत तंग कर रही है"...

"अच्छा...फिर?"...

"फिर क्या....मैँने 'शश्श...हुश्श..हुर्र...हुर्र' करके मक्खी को उड़ाने में बेचारे की बहुत मदद की"....

"उसके बाद?"...

"मक्खी इतनी ढीठ कि हमारे तमाम प्रयासों और कोशिशों के बावजूद उसके कान पर जूँ तक नहीं रेंगी"...

"किसके कान पर?...ग्राहक के?"...

"कमाल करते हो शर्मा जी आप भी...ऐसी सिचुएशन में ग्राहक के कान पे जूं रेंगने का भला क्या औचित्य?"...

"जूँ ने रेंगना था तो सिर्फ मक्खी के कान पे रेंगना था"...

"मक्खी के कान पे?"...

"खैर!...छोड़ो...आगे क्या हुआ?"...

"जब मेरी 'श्श...हुश्श..हुर्र...हुर्र' का उस निर्लज्ज पर कोई असर नहीं हुआ तो मैँ अपनी औकात भूल असलियत पे याने के  'भौं...भौं-भौं' पर उतर आया"...

"गुड!...अच्छा किया"...

"अजी!..काहे का अच्छा किया?"...

"वो बेशर्म तो मेरी भौं-भौं की सुरीली तान सुन मदमस्त हो मतवालों की तरह झूम-झूम साहब को कभी इधर से तो कभी उधर से तंग करने लगी"...

"ओह!...माई गॉड...दैट वाज़ ए वैरी क्रिटिकल सिचुएशन"

"जी"...

"फिर क्या हुआ?"....

"होना क्या था?...वही हुआ जिसका मुझे अन्देशा था"...

"किस चीज़ का अन्देशा था?"...

"वही मक्खी के साहब की नाक पे बैठ जाने का"...

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"ओह!...ये तो बहुत बुरा हुआ बेचारे के साथ"...

"जी"...

"हम्म!..अब आई मेरी समझ में तुम्हारी नौकरी छूटने की वजह"...

"क्या?"...

"तुमने ज़रूर बेवाकूफों की तरह उनकी नाक पे बिना कुछ सोचे-समझे हो-हल्ला करते हुए हमला बोल दिया होगा"...

"अजी कहाँ?...आपने मुझे इतना मूर्ख और निपट अज्ञानी समझ रखा है क्या?"...

"शर्मा जी!...हम ग्राहकों की पूजा करते हैँ....उन्हें भगवान समझते हैँ"...

"ग्राहक हमारे लिए ईश्वर का ही दूसरा रूप होता है"...

"ओ.के"...

"उनकी नाक...हमारी नाक...दोनों एक समान"...

"क्या फर्क पड़ता है?"....

"जी"...

"उस पे मैँ भला कैसे और क्या सोच के हमला बोल सकता था?"...

"तो फिर आखिर हुआ क्या?"...

"जब मेरे तमाम उपाय बेअसर होते नज़र आए तो मैँने सीधे-सीधे ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करने का निर्णय लिया"...

"ब्रह्मास्त्र?"....

"जी हाँ!...ब्रह्मास्त्र"...

"?...?...?...?...?...?..."...

"मैँ सीधा स्टोर रूम में गया और वहाँ से लाकर ग्राहक के मुँह पर 'बेगॉन स्प्रे' baygon का स्प्रे कर डाला और ज़ोर से चिल्लाया.... "याहू!..अब ना रहेगा मक्खी का नाम औ निशाँ"

 

***राजीव तनेजा***

नोट: इस लघु कहानी को लिखने की प्रेरणा मुझे तब मिली जब मेरे खाना खाते वक्त श्रीमति जी ने कमरे में 'HIT' का स्प्रे करना चालू कर दिया

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"फुल एण्ड फाईनल"

***राजीव तनेजा***

 

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"अरे...तनेजा जी!...ये सब चोट-चाट कैसे लग गई?"....

"अब होनी को कौन टाल सकता है....शर्मा जी?"....

"फिर भी...पता तो चले कि आखिर हुआ क्या?"....

"सब भुट्टा खाने का नतीजा है"...

"भुट्टा खाने का?.....मैँ समझा नहीं....ज़रा खुल के बताएँ"....

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"यार!..मेरी किस्मत ही फूटी थी जो मैँ उस राम प्यारी की बच्ची के पास भुट्टा खाने चला गया".....

"तो क्या उसकी बिटिया इतनी बड़ी और स्यानी हो गई कि खुद अपने बूते पे काम-धन्धा सँभाल सके?"...

"कमाल करते हो शर्मा जी आप भी...अभी तो उसके खेलने-कूदने के दिन हैँ और आप हो कि उसे काम-धन्धे में झोंकने की सोच रहे हो"...

"तो फिर ये सब किसका किया-धरा है?"शर्मा जी मुझे ऊपर से नीचे तक गौर से निहारते हुए बोले...

"उसी कम्बख्तमारी 'राम प्यारी' का...और भला पूरे मोहल्ले में कौन है जो मुझ पर ऊँगली भी उठा सके?"मैँ सीना फुला आहिस्ता से कराहते हुए बोला...

"तुमने ज़रूर उससे पंगा लिया होगा"...

"अजी कहाँ?...पंगा लिया होता तो इतना दुखी थोड़े ही होता"....

"तो फिर आखिर हुआ क्या?"...

"होना क्या था?...रोज़ाना की तरह कल भी मैँ मुँह में गुटका दबाए आराम से...हौले-हौले सड़क से गुज़र रहा था कि......

"भुट्टे भूनती राम प्यारी दिख गई?"...

"जी!...सही पहचाना"...

"अच्छा फिर?"...

"फिर क्या मैँने उससे इशारों-इशारों में पूछ लिया कि ये लम्बे वाला...भुट्टा कितने का है?"...

"फिर तो जूते पड़ने ही पड़ने थे"...

"वो भला क्यों?"...

"क्यों?...तुम्हारे मुँह में ज़बान नहीं थी जो लगे इशारे करने"...

"अरे!...अभी बताया ना कि मैँ गुटका चबा रहा था"....

"तो फिर फैंक देते"...

"अरे वाह!...ऐसे कैसे फैंक देता?"...

"पूरे गिन के दो रुपए खर्च किए थे..उन्हें क्या व्यर्थ में व्यर्थ हो जाने देता?"...

"ओह!....

"अच्छा फिर?"...

"फिर क्या?...मैँने उसे पहले एक ऊँगली दिखाई....index finger

फिर दो ऊँगली दिखाई"....vsvsvsv

"अब ऐसे भद्दे इशारे करोगे तो फिर पिटोगे ही"...

"शर्मा जी!...आप गलत सोच रहे हैँ...मैँने उस वे में ऊँगली नहीं दिखाई थी"...

"तो फिर किस वे में ऊँगली दिखाई थी?"

"जी!...मेरा मतलब तो बड़ा ही सीधा...सरल और सिम्पल था कि एक रुपया दूँगा और गिन के दो भुट्टे लूँगा"...

"हम्म!....फिर क्या हुआ?"...

"भुट्टा इतना बढिया और मीठा था कि एक में ही तबियत खुश हो गई"...

"फिर?"...

"फिर क्या?...मैँने बटुए में से अठन्नी निकाल उसकी हथेली पे धर दी कि...ले हो गया फुल एण्ड फाईनल"...India_16_rev

"फिर क्या हुआ?"....

"अठन्नी देखते ही पागल की बच्ची का दिमाग फिर गया...चिल्लाते हुए कहने लगी कि...

"बाबू!...ऐसे कैसे हो गया फुल एण्ड फाईनल?"....

"सीधे-सीधे निकालो दो का नोट"...re2note

"तो फिर दे देते"...

"अरे वाह!...ऐसे-कैसे दे देता"....

"अच्छा फिर?"...

"फिर क्या?.....मैँ भी चौड़ा हो गया कि......

"एक ही तो भुट्टा खाया है....ऐसे कैसे दे दूँ...दो का नोट?"....

"फिर क्या हुआ?"...

"शायद मेरा भरा बटुआ देख  बेईमानी आ गई उल्लू की पट्ठी के दिमाग में...

"ओह!...

"भीड़ इकट्ठी कर ली"....

"ओह!....माई गॉड"....

"सबके सामने चिल्ला-चिल्ला के कहने लगी कि...."पहले तुमने एक ऊग़ली दिखाई?"...

"अच्छा फिर?"...

"मैँ कौन सा डरने वाला था?....बोला....

"हाँ!...बिलकुल दिखाई....कोई शक?"....

"गुड.....उसके बाद क्या हुआ?"....

"मेरे हामी भरते ही बावली में जोश भर गया...दूने उत्साह से कमर पे हाथ रख सीधे ही तूँ-तड़ाक करते हुए बोली.....

"उसके बाद तूने दो ऊँगली दिखाई?"...

"हाँ!...दिखाई.....आगे बोल"...

"तूने पहले एक ऊग़ली दिखाई कि एक भुट्टा लूँगा और बाद में दो ऊँगली दिखाई कि दो रुपया दूँगा"...

"अरे वाह!...बाप का माल समझ रखा है क्या?"...

"ऐसे कैसे दो रुपए दूँगा?...

"बस मेरा इतना कहना था कि आस-पास मजमा लगाई भीड़ में से कोई चिल्लाया...

"मारो!...स्साले को ...लेडीज़ के साथ बेईमानी करता है"...

"ओह!....फिर क्या हुआ?"...

"फिर क्या?...भीड़ ने मेरा फुल एण्ड फाईनल कर डाला"

***राजीव तनेजा***

Rajiv Taneja

Delhi(India)

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+919810821361

+919213766753

’सखेद सधन्यवाद’

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हँसते रहो हँसाते रहो पर आनन्द पाठक जी के व्यंग्य ’सखेद सधन्यवाद’  के जरिए उनकी लेखनी की पैनी धार का आनंद लें

 

***राजीव तनेजा***

साहब!...मक्खी ही तो है

***राजीव तनेजा***

super soup

 

ग्राहक वेटर से:सुनो!....मेरे सूप में मक्खी है

 

soup..

 

वेटर:छोड़िए ना साहब!...मक्खी ही तो है...कितना सूप पी जाएगी?

ग्राहक:बेवाकूफ!...पागल समझ रखा है क्या मुझे?...

वेटर:अगर आपको एतराज़ है तो लीजिए....मैँ अभी इसका काम तमाम किए देता हूँ

soup........

ब्लॉग लिखना अपना काम नहीं क्योंकि इसमें मिलता दाम नहीं

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एक मित्र मिले  बोले

लाला तुम किस चक्की का खाते हो?

इस डेढ छटांक के राशन में भी

तोंद बढाए जाते हो

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क्या रखा है माँस बढाने में?

मनहूस अक्ल से काम करो

इंटरनैट काल की वेला है

ब्लॉग लिखो जगत में नाम करो

 

हम बोले  रहने दो लैक्चर

पिट जाओगे हो जाएगा फ्रैक्चर

लिख-लिख कलम घिसते रहें

इतने भी हम बेकार नहीं

ब्लॉग लिखना अपना काम नहीं

क्योंकि इसमें मिलता दाम नहीं

 

नोट:इस कविता का शुरूआती हिस्सा बचपन में स्कूल में पढा था...आज अचानक याद आ गया तो बाकी का आधा हिस्सा अपनी तरफ से जोड़ दिया

चमत्कार को नमस्कार

***राजीव तनेजा***

chamatkaar

"ओ...बड़े दिनों में खुशी का दिन आया....

ओ...बड़े दिनों में खुशी का दिन आया....

आज मुझे कोई ना रोके...

बतलाऊँ कैसे कि मैँने क्या पाया....

हो बड़े दिनों में.....

"याहू!....

वो मारा पापड़ वाले ने"...

"क्या हुआ तनेजा जी?...इस कदर बल्लियों क्यों उछल रहे हैँ?...

"अरे शर्मा जी!...साक्षात  चमत्कार देख के आ रहा हूँ...साक्षात"....

"क्या सच?"....

"और नहीं तो क्या?"...

"हम भी तो सुनें भय्यी कि क्या चमत्कार देख के आ रहे हो?"...

"यूँ समझिए कि साक्षात ऊपरवाले ने अपने हाथों से गिफ्ट....

"तो क्या आज फिर किसी लड़की ने लिफ्ट?....

"तौबा...तौबा...कैसी बातें करते हैँ?"...

"क्यों?...पिछले हफ्ते तुम खुद ही तो बता रहे थे कि....

"शर्मा जी!...बन्दा एक बार धोखा खा सकता है...दो बार धोखा खा सकता है लेकिन सौ बार थोड़े ही कोई मुझे उल्लू बना पैसे ऐंठ सकता है"....

"तो फिर बताओ ना यार कि आखिर हुआ क्या?"शर्मा जी का उत्सुक स्वर...

"अजी!...यूँ समझिए कि धमाल हो गया"...

"अब कुछ बताओगे भी या यूँ ही बेकार में कमाल-धमाल कर के फुटेज खाते रहोगे?"....

"बताता हूँ....बताता हूँ....ज़रा सब्र तो रखिए"...

"अरे वाह!...इतनी देर से उतावले तो तुम खुद हुए जा रहे हो और अब मुझे सब्र रखने के लिए कह रहे हो?"...

"क्या शर्मा जी?...आप तो बात को पकड़ के बैठ जाते हैँ"...

"बैठ जाता हूँ?"...

"ध्यान से देखो!...मैँ बैठा हुआ नहीं बल्कि सीधा तन के खड़ा हुआ हूँ"शर्मा जी सीना तान छाती फुलाते हुए बोले...

"हे...हे...हे...शर्मा जी...आपके भी सैंस ऑफ ह्यूमर का जवाब नहीं"...

"थैंक्स फॉर दा काम्प्लीमैंट"...

"इसमें थैंक्स की क्या बात है?...यू डिज़र्व इट"....

"हक बनता है आपका"...

"ओ.के....ओ.के...बाबा"....

"चलो!...अब फटाफट पूरी बात बताओ"...

"शर्मा जी!...जल्दी क्या है?"....

"आप ही तो कहा करते हैँ कि जल्दी का काम शैतान का होता है...आराम से सुनिए"...

"ठीक है भैय्ये!...तो फिर टिका ले अपनी तशरीफ  यहाँ...फुटपाथ पे और तसल्ली से बता"शर्मा जी एक तरफ इशारा करते हुए बोले...

"जी...शर्मा जी"मैँ भी आराम से चौकड़ी मार बैठता हुआ बोला...

"दरअसल हुआ क्या कि मैँ अपने  नए स्कूटर पे...

Electric_Bike

"अरे वाह!...नया स्कूटर?.....कब लिया?"शर्मा जी चौंकने वाले अन्दाज़ में उठ खड़े हो गए...

"जी!...बस...यही कोई दो-चार दिन ही हुए हैँ"...

"अमाँ यार!...तुम तो बड़े ही छुपे रुस्तम निकले..किसी को कानों कान खबर भी नहीं होने दी और झट से मार लिया मैदान"...

"अब शर्मा जी!...अपने मुँह से कैसे कहता?.....आप तो मेरा नेचर जानते ही हैँ"मैँ मन ही मन फूल के कुप्पा होता हुआ बोला

"फिर तो भय्यी!....पार्टी बनती है हमारी"...

"हाँ-हाँ...क्यों नहीं?"...

"आप ही का दिया सब कुछ है"....

"जब चाहें...ले लें"...

"ना...तनेजा जी...ना....पार्टी से बचने का ये तरीका तो बरसों पुराना हो गया"...

"मेरे सामने आपका ये टोटका नहीं चलने वाला"...

"सीधे-सीधे निकालिए सौ का पत्ता और बन्ने खाँ की दुकान से गर्मागर्म जलेबी मँगवाईए"...

"हाँ-हाँ ...क्यों नहीं"...

"एक मिनट!....(स्कूटर को घूर के देखते हुए)

"ओए तनेजा!....

"जी!...शर्मा जी"....

"छोड़!.....ये पार्टी-शार्टी का चक्कर तू रहने दे"....

"कमाल करते हो शर्मा जी!...आपकी एक आवाज़ पे मैँने जेब के अन्दर हाथ डाल दिया और आप हैँ कि....

"तो दूसरी आवाज़ पे उसणे बाहर काढ ले...के दिक्कत सै?"...

"ना..दिक्कत तो कोई नहीं है जी...लेकिन....

"इस लेकिण-वेकिण ने अड़े छोड़ और जा...

खा कमा....मौज कर"...

"कह दिया ना कि जा...मैँ नहीं लेता"...

"वो तो आपको लेनी पड़ेगी"....

"कोई जबर्दस्ती है?"...

"कुछ भी समझ लें"...

"पागल हो गया है क्या तू?"...

"शर्मा जी!.....आप तो मेरे बारे में अच्छी तरह से जानते हैँ कि मैँ उसूलों का बड़ा पक्का आदमी हूँ"...

"तो?"...

"पहले तो कभी किसी को जल्दी से हाँ नहीं करता और अगर गलती से कभी किसी को हाँ कर भी दी तो फिर भूल के भी कभी ना नहीं करता"...

"अब मर्द की ज़बान जो ठहरी....कर दी...सो कर दी"....

"अब तो आप इसे पत्थर पे लिखी लकीर ही समझिए"...

"तो फिर झाड़ू मार पत्थर पे...अपने आप मिट जाएगी ससुरी....के दिक्कत सै?"...

"ना शर्मा जी!...ना....अब तो बेशक धरती इधर की उधर हो जाए....ये तनेजा...

ये तनेजा तो आपको पार्टी दे कर ही रहेगा"मैँ छाती ठोक गरजदार आवाज़ में बोला...

"अरे यार!...समझा कर"....

"क्यों?...मेरा पैसा आपको हज़म नहीं होगा?"....

"नहीं!...ये बात नहीं है"...

"तो फिर आखिर दिक्कत क्या है?"....

"छोड़ ना!..क्यों बेकार में सौ-दो सौ फूँकता है...बचा के रख...आड़े वक्त काम आएँगे"...

"शर्मा जी!...बात को घुमाईए मत और सीधे-सीधे बताईए कि आप पार्टी लेंगे या नहीं?"...

"जा!...नहीं लूँगा...कर ले जो तुझे करना हो"...

"पार्टी तो आपके फरिशते भी लेंगे"मैँ आस्तीन ऊपर कर त्योरियाँ चढाता हुआ बोला...

"ठीक सै...तो फिर एक मिनट की भी देर ना कर"...

"जी"मैँ अपनी कामयाबी पे खुश होता हुआ बोला

"जा...सीधा ऊपर जा.....तेरी ही बाट देख रहे हैँ कई दिनों से"...

"कौन?"...

"मेरे फरिशते...और कौन?"...

"क्या?"...

"जा!...कई दिनों से तेरा ही इंतज़ार कर रहे हैँ"...

""कई दिनों से?"...

"हाँ!..कई दिनों से"...

"वो भला क्यूँ?"...

"स्वर्ग में कई दिनों से अच्छा भोजन ना मिलने के कारण भूख हड़ताल करे बैठे हैँ"...

"सच में?"...

"हाँ!...जा के उन्हें ही दे दे अपनी पार्टी"...

"आप मज़ाक कर रहे हैँ ना?"...

"ओर नय्यी ते के मैँ तन्ने सीरियस दीख रेया सूँ?"...

"ओह!...फिर ठीक है"...

"अब फटाफट गोली हो ले यहाँ से"...

"शर्मा जी!...मान जाइए ना...प्लीज़"...

"कह दिया ना एक बार कि नहीं चाहिए मुझे तेरी ये पार्टी-शार्टी"...

"वो तो आपको लेनी ही पड़ेगी"...

"बेटे!...समझा कर....ज़िद ना कर"..

"क्या समझूँ?...कैसे समझूँ?...और क्यों समझूँ?"....

"एक बार जो ठान लिया...सो ठान लिया"...

"पार्टी देनी है...तो हर हाल में देनी है"...

"अरे!...अजीब पागलपन है....मुझे अगर नहीं लेनी है...तो किसी भी कीमत पर नहीं लेनी है"...

"वो तो आपको लेनी पड़ेगी"मैँ बच्चों की तरह ज़िद पे अड़ा रहा...

"ना!...बिलकुल ना"...

"शर्मा जी!...आप मेरे साथ ज़्यादती कर रहे हैँ"...

"कुछ भी समझ ले"...

"ना!..मैँ तो नहीं मानने वाला....पार्टी तो आपको लेनी ही पड़ेगी"...

"कोई ज़बरदस्ती है?"....

"यही समझ लीजिए"...

"ओफ्फो!...कह दिया ना एक बार कि नहीं लूँगा..नहीं लूँग़ा...नहीं लूँगा"...

"आखिर आपको दिक्कत क्या है?....परेशानी क्या है?"...

"अरे!....जो कँगला पैट्रोल तक के पैसे नहीं खर्च कर सकता...वो क्या खाक पार्टी देगा"...

"किसने कहा आपसे कि मैँ पैट्रोल के पैसे नहीं खर्च कर सकता?"...

"कहना या सुनना किस से है?"...मुझे साफ-साफ दिखाई दे रहा है"....

"क्या दिखाई दे रहा है?"...

"यही कि पैसे खर्च करने की तेरी औकात नहीं है"...

"औकात पे मत जाइए...कहे देता हूँ"...

"जाऊँगा!....एक नहीं सौ बार जाऊँगा...कर ले...जो तुझे करना हो"....

"शर्मा जी!...आप शायद ठीक से जानते नहीं हैँ मुझे वर्ना...ऐसी बात करने से पहले सौ बार सोचते"...

"औकात तो मेरी इतनी है कि यहीं खड़े-खड़े मैँ आपको....

"अरे जा-जा!...तेरे जैसे छत्तीस आए और चले गए"...

"तू अपने ससुराल वालों के दम पे कूद रहा है ना?"....

"आने दे उन्हें भी मैदान ए जंग में...देखें कौन किसका पानी भरता है?"...

"तुझे और तेरे रिश्तेदारों को...सभी को अच्छी तरह जानता हूँ कि तुम में से कौन कितने पानी में है"...

"आप मेरी सास को बार-बार बीच में क्यों ला रहे हैँ?"...

"और अगर औकात नहीं होती क्या मैँ ये नवां-नकोर स्कूटर खरीद के लाता?"मैँ लगभग रुआँसा होता हुआ बोला...

"पागल के बच्चे!...ध्यान से देख...ये 'स्कूटर' नहीं बल्कि 'स्कूटरी' है"...

"तेरा ये 'कबूतर' ....'कबूतर' नहीं बल्कि 'कबूतरी' है.....हा...हा...हा...हा"....

"शर्मा जी!...आप बड़े है...बुज़ुर्ग हैँ लेकिन इसका मतलब ये नहीं हो जाता कि आप अपने से छोटॉं की भावनाओं से खिलवाड़ करें"....

"अपने होश औ हवास पे काबू रखें और जब तक...जहाँ तक सम्भव हो सके...मेरा मज़ाक ना उड़ाएँ...प्लीज़"...

"अरे भय्यी!...किसने कहा तुमसे कि मैँ तुम्हारा मज़ाक उड़ा रहा हूँ?"...

"ये मज़ाक नहीं तो और क्या है? कि आप मेरे अच्छे भले किंग साईज़ के 'स्कूटर' को 'स्कूटरी' बता उसके साथ-साथ मुझे भी नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे हैँ"....

"अरे भाई!...मैँ किसी की तौहीन नहीं कर रहा हूँ और ना ही मेरा ऐसा कोई इरादा है"...

"झूठ!...बिलकुल झूठ"...

"ओफ्फो!..कैसे विश्वास दिलाऊँ तुम्हें?"...

"मेरे सर पे हाथ रख कर कसम खाएँ कि जो कुछ कह रहे हैँ...सच कह रहे हैँ और सच के सिवा कुछ भी नहीं कह रहे हैँ"....

"हाँ भय्यी!...सच कह रहा हूँ...तुम्हारी कसम"...

"तो आपका मतलब ये 'स्कूटर' नहीं है"...

"बिलकुल"...

"तो फिर आपके हिसाब से 'स्कूटर' किसे कहते हैँ?"...

"'स्कूटर' उसे कहते हैँ जो पैट्रोल से चलता है और आपका ये तो छकड़ा पैट्रोल से नहीं बल्कि 'बैट्री' से चलता है ना?"...

"बैट्री से चलता है तो इसका मतलब ये 'स्कूटर' ना हो कर 'स्कूटरी' हो गया?"...

"बिलकुल"...

"ये आपसे किस गधे ने कह दिया?"...

"कहना किसने है?...मुझे खुद पता है"....

"शर्मा जी!...मेरे साथ...ये दोगला...ये सौतेला व्यवहार सिर्फ इसलिए ना कि....

  • ये कीमत में कम है...
  • सरकार इस पर सबसिडी दे रही है...
  • ये शोर नहीं करता...
  • प्रदूशन नहीं फैलाता...
  • बिना किक के स्टार्ट हो जाता है?...वगैरा....वगैरा"...

"ये सब मुझे नहीं पता"...

"तो फिर क्या पता है आपको?"...

"यही कि ये स्कूटर नहीं है"...

"अच्छा चल...अगर तुझे मेरी बात पे विश्वास नहीं है तो राह चलते किसी भी ऐरे-गैरे को रोक के पूछ ले कि ये 'स्कूटर' है के 'स्कूटरी'?"...

"शर्मा जी!...अभी मेरा वक्त इतना गया-बीता नहीं हुआ है किसी ऐरे-गैरे...नत्थू-खैरे से राय लेने की नौबत पड़ जाए मुझे"...

"वैसे आप ये बताने की कृपा करेंगे कि किस ऐगल से ये आपको 'स्कूटरी' दिखाई दे रही है?"...

"तो तुझे ही ये कौन से कोण से 'स्कूटर' दिखाई दे रहा है?"...

"ये देखिए!...हाँ-हाँ इसी ऐंगल से"मैँ लगभग ज़मीन पे लेट उन्हें ऐंगल समझाता हुआ बोला....

"दिखा ना?"...

"क्या?"...

"यही कि लम्बाई...चौड़ाई और मोटाई के हिसाब से ये किसी भी 'स्कूटर' से कम नहीं है"...

"सिर्फ लम्बाई...चौड़ाई और मोटाई से क्या होता है?"...

"क्यों?...होता क्यों नहीं है...बहुत कुछ होता है"....

"ओ.के!...ओ.के बाबा...तुमसे बहस में कोई नहीं जीत सकता"....

"आई.एम सॉरी....माफ कर दो मुझे"...

"वो किसलिए?"...

"कि मैँने तुमसे पंगा मोल लिया"...

"शर्मा जी!...कमाल करते हैँ आप भी"....

"आप मेरे बुज़ुर्ग हैँ...संगी-साथी हैँ....इतना तो आपका हक बनता ही है"...

"थैंक्स...कि तुमने मुझे इस लायक समझा"...

"चलो!...बात तो खत्म हुई"...

"वैसे भी क्या फर्क पड़ता है?...स्कूटर हो या स्कूटरी...दोनों एक समान"...

"अरे वाह!...फर्क क्यों नहीं पड़ता...ज़मीन और आसमान का फर्क पड़ता है"...

"क्या फर्क पड़ता है?"...

"आपको मैँ अगर मर्द के बजाए औरत कह कर पुकारूँ तो आपको बुरा लगेगा या नहीं?"...

"ज़रूर लगेगा"...

"बस इसीलिए मुझे भी लग रहा है"...

"मतलब?"...

"आप मेरे जवाँ मर्द स्कूटर को ज़बर्दस्ती 'स्कूटरी' कह स्त्री साबित करने पर तुले हैँ तो मेरा बुरा मानना जायज़ ही तो है"...

"लेकिन स्कूटर और स्कूटरी की बहस के बीच में ये मर्द और औरत कैसे आ गए?"...

"वो ऐसे कि स्कूटर मर्द होता है और स्कूटरी स्त्री"...

"मतलब?"...

"मतलब कि स्कूटर चलता है...इसलिए वो मर्द है"...

"और स्कूटरी चलती है...इसलिए वो औरत हो गई?"...

"जी"...

"वाह!...क्या लॉजिक है"...

"तुम्हारा मतलब मोटर साईकिल और कार दोनों चलती है तो इसका मतलब ये दोनों स्त्रियों की श्रेणी में आएँगी?"...

"यकीनन"...

और ऑटो मर्द की श्रेणी में?"...

"जी!...सही पहचाना आपने"...

"जैसे 'बस' चलती है और 'ट्रक' चलता है?"...

"बिलकुल"...

"इसका मतलब तो रेलगाड़ी औरत है और हवाई जहाज़ मर्द"...

"जी बिलकुल"..

"लेकिन एक कंफ्यूज़न है?"...

"क्या?"...

"यही कि 'बुलेट' तो सबसे शक्तिशाली बाईक है ना?"...

"जी"...

"तो वो तो मर्द ही कहलाएगी ना?"....

"जी नहीं...'बुलेट' भी स्त्री ही कहलाएगी"...

"लेकिन वो तो सबसे शक्तिशाली....

"ऐसे तो 'हिडिम्बा' भी बहुत शक्तिशाली थी...लेकिन वो राक्षसी थी...राक्षस नहीं"...

"कम्पनी खुद अपने प्रचार में कहती है कि जब 'बुलेट' चले तो दुनिया रास्ता दे"...

"जी"...

"तो इसका मतलब एक औरत के लिए....

"जी!...ये तो यहाँ की रीत है"...

"मतलब?"....

"इसे कहते हैँ अपनी परंपराओं से जुड़े रहना"...

"?...?...?....?"...

"?...?...?....?"... "?...?...?....?"... "?...?...?....?"...

"हम महान भारत देश के वासी हैँ...हमारे यहाँ सदियों से स्त्रियों का सम्मान किया जाता रहा है...अभी भी किया जाता है और हमेशा किया जाता रहेगा"...

"जी!...ये बात तो है"...

"तो अब आपकी तसल्ली हो गई ना कि....

"हाँ भय्यी...हो गई...पूरी तसल्ली हो गई कि ये 'स्कूटरी' नहीं बल्कि 'स्कूटर' है"...

"जी"...

"लेकिन स्पीड?.....स्पीड का क्या?...वो तो इसकी बहुत ही कम....

"जी!...20 से 25 किलोमीटर प्रति घंटे की है"मेरा मायूस स्वर...

"यही इसकी सबसे बड़ी कमई है"...

"हाँ!....लेकिन अगर आप रफ्तार से समझौता कर सकते हैँ तो बाकी सब चीज़ों में इसका कोई सानी नहीं"...

"अरे हाँ शर्मा जी!...स्पीड से याद आया कि वो कमाल...वो चमत्कार तो स्पीड को लेकर ही था"...

"ओह!...इसका मतलब बातों-बातों में हम असली...मुद्दे की बात तो भूल ही गए"...

"जी"...

"हाँ!...अब बताओ कि क्या हुआ था?"...

"जैसा कि मैँ आपको बता रहा था कि...

"क्या तुम्हारी ये स्कूटरी...ऊप्स सॉरी स्कूटर...25 की स्पीड से ज़्यादा तेज़ भाग गया?"...

"आप तो अंतरयामी है...आपको कैसे पता चला?"...

"अभी तुमने ही तो कहा कि मैँ अंतरयामी  हूँ"...

"शर्मा जी!...मज़ाक छोड़िए और सीरियसली बताईए ना कि आपको कैसे पता चला?"....

"अरे यार!...अभी तुमने ही तो कहा"...

"तो?"...

"भय्यी!...तुम स्पीड के साथ चमत्कार की बात कर रहे थे तो मैँने अन्दाज़ा लगाया कि ज़रूर इसकी गति तेज़ हो गई होगी"...

"जी...बिलकुल सही अन्दाज़ा लगाया आपने"...

"अब मुझे शुरू से...वर्ड टू वर्ड बताओ कि कैसे ये चमत्कार घटित हुआ?"...

"अब क्या चमत्कार हुआ?...ये तो मैँने आपको बता दिया लेकिन कैसे चमत्कार हुआ?...इस रहस्य से मैँ बिलकुल अनजान हूँ"...

"ठीक है!...आगे बोलो"...

"दरअसल!...हुआ क्या कि दूसरों कि देखा-देखी...खुशी-खुशी से चाव-चाव में मैँने इसे ले तो लिया लेकिन फिर इसकी मरियल स्पीड देख के जल्द ही दुखी हो परेशान भी हो गया"...

"ओह!...फिर?"...

"शर्मा जी!...मेरा दिल ही जानता है कि पिछले दो दिनों में इसकी स्पीड को तेज़ करने के लिए क्या-क्या जतन नहीं किए मैँने?"...

"मन्दिर...मस्जिद और गुरूद्वारे से लेकर चर्च तक मैँ कहाँ-कहाँ नहीं भटका?...

"तो?"...

"कोई मकैनिक...कोई कारीगर...कोई वर्कशाप नहीं छोड़ी मैँने"...

"ओह!...फिर?"...

""नतीजा वही ढाक के तीन पात"...

"मतलब?"...

"सारे क्रिया-क्रम फेल हो गए..

"दुखी हो कई बार इतना गुस्सा आया कि इसे ले जा के सीधा शो-रूम वाले के वहीं पटक आऊँ कि ले!...सम्भाल अपना टीन-टब्बर"....

"एक-दो बार तो बड़े उलटे-उलटे ख्यालात दिल में उमड़ने लगे"...

"वो क्या?"...

"यही कि इसे दियासलाई दिखा इसके साथ मैँ खुद भी सती हो जाऊँ"...

"बाप रे!...ऐसा गज़ब किसलिए भय्यी?"...

"ताकि ना रहे बाँस और ना ही बजे बाँसुरी"...

"शांत राजीव...शांत....आवेश में आने से कुछ नहीं होगा"...

"कमाल करते हैँ शर्मा जी आप भी...जिस संग बीतती है ना..वहीं जानता है...आपका क्या है...आप ठहरे मस्तमौला इनसान"...

"कई बार तो दिल में आया कि किसी अँन्धे कुएँ में कूद कर अपनी जान दे दूँ"...

"राजीव!...जैसे हर जोड़ का कोई ना कोई तोड़ अवश्य होता है...ठीक वैसे ही इस समस्या का भी कोई ना कोई हल ज़रूर होगा"...

"पागल हो गए हो क्या तुम?"....

"कुछ और सोचो.....आत्महत्या जैसी कायराना हरकत तुम्हें शोभा नहीं देती".....

"जी"....

"अच्छा!...फिर क्या हुआ?"...

"कई बार सोचा कि अच्छे-भले...शरीफ और नेक नीयत इनसान को बरगलाने और फुसलाने का केस कम्पनी वालों के खिलाफ डाल दूँ"...

"गुड"....

"फिर सोचा कि लगे हाथ मानहानि का केस भी डाल दूँ"...

"ये तो सोने पे सुहागे वाली बात हो गई"...

"वकील ने तो तब भी लेने हैँ और तभी भी लेने हैँ"...

"जी"...

"मैँने सोचा कि जब एक साथ दो-दो कैसों का सामना करेगा...तब पता चलेगा बच्चू को...

"ये बच्चू कौन?"...

"शो-रूम का मैनेजर...'बच्चू सिंह यादव' और कौन?"...

"हुँह!...बड़ा दावा ठोक के कहता फिरता था कि पूरे 120 किलो वज़न झेल सकता है हमारा स्कूटर"...

"अरे!...झेल तो मैँ रहा हूँ इसे पिछले चार दिनों से"....

"तो क्या 120 किलो वज़न भी....

"शर्मा जी!...आप तो जानते ही हैँ कि मेरा वज़न पूरे 100 किलो है...ना एक ग्राम ज़्यादा..ना एक ग्राम कम"...

"जी!...पिछले हफ्ते ही तो बताया था आपने"...

"मैँने सोचा कि जब कम्पनी वाले 120 किलो बता रहे हैँ तो 25-30 किलो अगर ज़्यादा भी हो गया तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला"...

"जी!...ये ट्रक-टैम्पो और रिक्शा वाले भी तो ओवरलोडिंग करते ही हैँ आखिर"...

"जी!...और मैँ कौन सा उस मुटल्ली को रोज़-रोज़ लिफ्ट देने वाला था"...

"तो?"...

"तो क्या?...बेइज़्ज़ती करवा दी पट्ठे ने....बीच सड़क के ही टैं बोल गया"...

"ओह!...ये तो बहुत इंसल्ट वाली बात है"...

"जी!...मेरा तो शर्म के मारे सर ऐसा नीचा हुआ कि बस पूछिए मत"...

"ओह!....

"अच्छा फिर?"...

"फिर मैँने सोचा कि इम्पोर्टेड टैक्नोलॉजी है.....इसका मतलब वज़न ऐकूरेट और परफैक्ट होना चाहिए...ना एक ग्राम कम...ना एक ग्राम ज़्यादा"...

"हम्म!......

"जैसा कि आप जानते हैँ कि मेरा वज़न ....

"पूरे 100 किलो है"...

"जी"....

"तो?"...

"तो मैँने सोचा कि जब फालतू वज़न नहीं लाद सकते तो मैँ कम भी क्यों लादूं?"...

"बिलकुल!...उसूल तो उसूल है"...

"जी"...

"अच्छा फिर?"...

"फिर क्या?...मैँने सड़क से तीन-चार ईंटे उठाई और उन्हें पिछली सीट पे लाद चल पड़ा अपने काम की तरफ"...

"ठीक किया आपने"...

"अजी!...क्या खाक ठीक किया?"..

"क्यों?...क्या हुआ?"...

"ईंटों को बाँधना तो मैँ भूल ही गया था"...

"ओह!...फिर?"...

"कोई यहाँ गिरी...कोई वहाँ गिरी"...

"ओह!...फिर तो ईंटों को इकट्ठा करने में बहुत मुश्किल हुई होगी"...

"मुश्किल?...ईंटों को सम्भालने के चक्कर में तो मैँ तीन बार खुद ठुकते-ठुकते बचा"...

"ओह!....फिर?"...

"फिर क्या?...ईंटो का आईडिया ड्राप कर मैँने कबाड़ी से 20 किलो का बाट खरीदा और उसे आज़माया"...

"गुड!...अच्छा किया आपने"...

"अजी!..क्या खाक अच्छा किया?...अच्छा तो तब होता जब मेरी ये मेहनत...ये मशक्कत रंग लाती"....

"इतनी मेहनत...इतनी पल्लेदारी के बाद भी नतीजा एकदम सिफर"...

"ओह!...आगे बताईए कि फिर क्या हुआ?"शर्मा जी इंटरैस्ट लेते हुए बोले

"मैँने खूब दिमाग लगा के नए--पुराने ..सभी तरह के जुगाड़ आज़माए लेकिन किस्मत ही अगर खराब हो तो कोई क्या कर सकता है?"...

"आखिर हुआ क्या?"...

"होना क्या था?...मेरी हर तरकीब फेल पर फेल होती जा रही थी"...

"मैँ परेशान हो सोच में डूबा ही हुआ था कि ध्यान आया.....

"क्या ध्यान आया?"...

"यही  कि पिछले महीने शादियों का सीज़न था"...

"तो?"...

"आप तो जानते ही हैँ कि शादियों और पार्टियों में फाल्तू का कितना खाना-पीना हो जाता है"...

"जी"....

"मैँ कॉपी-पैन और कैल्कूलेटर ले के हिसाब लगाने में जुट गया कि कहीं इन शादियों और पार्टियों के चक्कर में मेरा वज़न....

"तो?"...

"वही हुआ...जिसका मुझे डर था"...

"यू मीन!...आपका वज़न?"...

"जी!...वज़न पूरे 4 किलो बढकर मुझे वॉलीबॉल से फुटबॉल में तब्दील कर चुका था"...

"यू मीन!....100 से 104 किलो हो चुका था"...

"जी"...

"ओह!...वैरी क्रिटिकल सिचुएशन"...

"खैर!...मैँने भी दिमाग लड़ाया और इसका भी हल ढूँढ निकाला"...

"वज़न कम करने का?"...

"कुछ-कुछ"...

"वो कैसे?"...

"मैँने सोचा कि अब ये डायटिंग-शायटिंग तो अपने बस की है नहीं...तो जुगाड़ से ही काम लेना होगा"...

"अच्छा फिर?"..

"मैँने महसूस किया कि मेरे जूते ज़रूरत से कुछ ज़्यादा ही भारी थे"...

"ओह!....फिर?"...

"फिर क्या?...मैँने जूते उतारे और नंगे पाँव ही चल दिया अपने गोदाम की तरफ"...

"पैदल?"...

"बावले हो क्या?...अपनी ...खुद की सवारी के होते हुए मैँ भला पैदल क्यों चलने लगा?"...

"जी"...

"और वैसे भी मुझे स्कूटर की स्पीड बढानी थी...ना कि खुद की"

"तो क्या स्पीड में कुछ इज़ाफा हुआ?"...

"इज़ाफा तो नहीं लेकिन हाँ!...मेरे पैरों में तीन-चार छाले और पाँच-छै...छोटे-बड़े कंकड़ ज़रूर चुभ गए"...

"ओह!...

"जब मैँने देखा कि जूते उतारने से भी कुछ फर्क नहीं पड़ा तो मैँने दिलेरी से काम लेते हुए एक अनोखा प्लैन बनाया"...

"तो क्या आपने कपड़े....

"आप तो अंतरयामी है प्रभु...आपने कैसे जान लिया?"...

"कमाल है!...खुद ही अंतरयामी कहते हो और फिर खुद ही प्रश्न पूछते हो"...

"अच्छा!...आगे बताओ कि फिर क्या हुआ?"...

"क्या दिन में ही?"...

"छी!...छी-छी....कैसी बातें करते हैँ शर्मा जी आप भी?"....

"क्या मैँ इतना निर्लज्ज और बेशर्म हो सकता हूँ कि अपनी इज़्ज़त-आबरू की परवाह किए बिना दिन में ही?"...

"तो क्या फिर रात में?"...

"शर्मा जी!...यू ऑर जीनियस"...

"सही पहचाना आपने"...

"तो फिर कितने बजे?"...

"यही कोई दो या सवा दो का वक्त था....सुहानी चाँदनी रात थी....मस्त हवा मंद-मंद बह रही थी"....

"जी"...

"ऐसे में मैँने अपने सब कपड़े उतारे......

"हाय राम!...तो क्या कुछ भी नहीं?"...

"शर्मा जी!...क्या आपने मुझे इतना निर्लज्ज...बेशर्म और बेहय्या समझ रखा है कि...मैँ बिना कुछ पहने ही रात-बेरात सड़कों पे उछल-कूद मचाता फिरूँ?"..

"तो क्या?"...

"जी!...सही पहचाना आपने...मैँने V.I.P  की लाल रंग की छोटी वाली फ्रैंची पहनी हुई थी"...

"ये देखिए!...अभी भी पहनी हुई है"...

"अच्छा फिर?"...

"फिर क्या?"...

"लेना एक ना देना दो....स्साले!....बीच में रस्ता रोक के खड़े हो गए"...

"कौन?"..

"पुलिस वाले?"...

"अरे!...अगर पुलिस वाले होते तो मैँ कुछ ले-दे के उनसे सुलट भी लेता"...

"तो फिर कौन?"...

"शर्मा जी!...एक राज़ की बात बताऊँ?"...

"जी!...ज़रूर बताईए...एक क्या?...दो बताईए"...

"किसी से कहिएगा नहीं"...

"सवाल ही नहीं पैदा होता"...

"आप बेधड़क और बेचिंत हो के बताईए"...

"उस वक्त मेरे पास उस लाल रंग की फ्रैंची के अलावा और कुछ भी नहीं था"...

"ही...ही...ही...ही"...

"ये तो लाख-लाख शुक्र है ऊपरवाले का कि उसने उस दिन मेरी लाज बचा ली...वर्ना वो पुलिस वाले"...

"बाप रे बाप"...

"जी!...अब तो बच के रहना पड़ेगा इनसे...हाई कोर्ट ने जो आथोराईज़ कर दिया है ये सब"...

"जी!...इसी बात का तो डर था मुझे लेकिन वो कह्ते हैँ ना कि "जाको राखे साईयाँ...मार सके ना कोय"...

"जी!...

"आपने बताया नहीं कि उस रात आपका रस्ता रोक के कौन कम्बख्त खड़ा हो गया था"...

"जनाब!...अपनी भूल सुधारिए औरे रस्ता रोक के खड़ा हो गया के बजाय रस्ता रोक के खड़े हो गए थे..कहिए"...

"तो क्या?...कई सारे थे"...

"जी!...पूरे पाँच मुस्टण्डे थे...पूरे पाँच"...

"यही तो सबसे कमी है हमारे शहर की...गुण्डे रात भर मज़े से मटरगश्ती करते फिरते हैँ और पुलिस मज़े से अपने दड़बे में बेफिक्र हो सोई रहती है"...

"अजी गुण्डे कहाँ?....वो तो.....

"तो क्या कोई गैंगस्टर वगैरा?"...

"अजी!...गैंगस्टर वगैरा तो सारे अपनी-अपनी नौकरानियों से ब्लात्कार करने के जुर्म में जेल की सलाखों के पीछे सड़ रहे हैँ"...

"कमाल है!...पुलिस भी नहीं...गुण्डे-मवाली भी नहीं...यहाँ तक की गैंगस्टर वगैरा भी नहीं....तो फिर ऐसी कौन सी आफत आ गई हमारे शहर में?"...

"स्सालों ने!...भौंक-भौक के मेरा सड़क पे चलना हराम कर दिया था"...

"ओह!....फिर?"...

"फिर क्या?...उनके डर के मारे...ये आईडिया भी ड्राप करना पड़ा...सर जी"...

"फिर क्या हुआ?"...

"हर तरफ से निराश होने के बाद मैँने उस ऊपरवाले..परवरदिगार का हाथ थामा कि...

"हे पालनहार!...अब तू ही मेरी मदद कर....मुझे बचा....मेरी डूबती नैय्या को पार लगा"...

"तो?"...

"तो क्या?....भगवान ने मेरा रुदन...मेरा क्रंदन...मेरी आह...मेरी पुकार सुन ली और चमत्कार दिखा दिया"...

"तो क्या स्पीड?"....

"जी बिलकुल"...

"मुझे विश्वास नहीं हो रहा"...

"अरे!...हाथ कँगन को आरसी क्या? और पढे लिखे को फारसी क्या?"...

"आप खुद ही चला के देख लें"...

"अरे यार!..मुझे कहाँ आता है ये स्कूटर-शकूटर चलाना?"...

"तो फिर सीख लो"...

"इस उम्र में?"...

"क्या दिक्कत है?"..

"ना...बाबा ना....मेरा इरादा अपनी हड्डी-पसली एक करवाने का नहीं है"...

"तुम मुझे पूरी बात बताओ कि क्या हुआ और कैसे हुआ?"...

"कैसे-क्या होना है?...मैँ रोज़ाना की तरह आज भी उस रायचन्द के बच्चे को कोसता हुआ अपने काम पे जा रहा था"...

"अब ये कौन सा राय चन्द बीच में आ के टपक पड़ा?"...

"वही!...जिसने मुझे ये डिब्बा खरीदने की सलाह थी थी"...

"अच्छा!...फिर?"...

"पूरे रस्ते मैँ भगवान से प्रार्थना करता जा रहा था कि...हे भगवान...किसी तरह इस टट्टू की स्पीड बढा दे...किसी भी तरह इसकी स्पीड बढा दे"...

"पूरे इक्यावन का प्रसाद चढाऊँगा"...

"फिर?"...

"फिर क्या?...भगवान ने मुझे साक्षात दर्शन दे दिए"...

"साक्षात?"...

"जी!...बिलकुल साक्षात...फेस टू फेस दर्शन"...

"मुझे विश्वास नहीं हो रहा...पूरी बात बताओ"..

"दरअसल हुआ क्या?..कि मैँ तो मन ही मन ऊपरवाले से प्रार्थना करता हुआ जा रहा था कि इतने में देखता हूँ कि एक सरदार जी बीच सड़क के इशारा कर मुझसे लिफ्ट माँग रहा है"....

"इस छकड़े पे लिफ्ट?"...

"जी"...

"विश्वास नहीं होता"....

"पहले-पहले तो मुझे भी विश्वास नहीं हुआ कि क्या कोई इतना सनकी और पागल भी हो सकता है जो इस...इस पे लिफ्ट मांगे"मैँ अपने स्कूटर की तरफ इशारा करता हुआ बोला...

"फिर?"...

"मुझे लगा कि शायद मुझे ही धोखा हो रहा है....मैँने अपनी मिचमिचाती हुई आँखों को पूरे जत्न से खोल के देखा तो पाया सब सच था"...

"मतलब...वो सरदार जी तुम्हें ही लिफ्ट देने  के लिए इशारा कर रहा था"...

"जी हाँ!...मुझे ही"...

"अच्छा फिर?"...

"पहले तो मेरे जी में आया कि उसे कस के डांट लगा दूँ...फिर जाने क्या सोच के मैँने उसे लिफ्ट दे दी"...

"चैक करो!...कहीं कोई अंजर-पंजर तो ढीला नहीं हो गया इसका?"...

"अब तो ऊपरवाला ही मालिक है तुम्हारे इस....

"शर्मा जी!...हमेशा ऊपरवाला ही हर चीज़ का मालिक होता है...ये तो हम और आप व्यर्थ में गुमान पाल लेते हैँ कि ये मेरा है और वो मेरा है"...

"जी!...ये तो है"...

"ऊपरवाला तो जब जाहे...जिस किसी की भी छप्पर फाड़ झोली भर दे और जब चाहे किसी की भी बनी-बनाई बिलडिंगे गिरा उसे फुटपाथ पे ला दे"...

"जी!...उसका कोई मुकाबला नहीं....उसकी महिमा अपरम्पार है"...

"जी बिलकुल"...

"आगे क्या हुआ?"...

"मैँने ना चाहते हुए उसे लिफ्ट दे तो दी लेकिन अब मेरा दिल अन्दर ही अन्दर धुक्क-धुक्क करे कि बेटा राजीव!...तू तो गया काम से"...

"अच्छा...फिर?"...

"मैँ मन ही मन मैँ उस घड़ी को कोस रहा था जब मैँने उस सरदार के चक्कर में ब्रेक लगाए थे कि अचानक चमत्कार हो गया"....

"तो क्या स्पीड?"...

"जी!...बिलकुल"...

"मेरा जो स्कूटर 25 की स्पीड पर ही साँस फुला हाँफने लगता था...वो हवा से बातें कर रहा था"...

"क्या बात कर रहे हो?"...

"तुम्हें धोखा हुआ होगा"...

"शर्मा जी!...धोखा एक बार हो सकता है...दो बार हो सकता है...दस बार नहीं"...

"मैँने कम से कम दस बार अपनी इन्हीं आँखों से चैक किया....स्पीड वास्तव में 35 के पार थी"...

"अरे वाह!...फिर तो मज़े हो गए तुम्हारे"...

"अजी मज़े कहाँ?...तीर्व गति पे स्कूटर दौड़ाने के मज़े मैँ ले ही रहा था कि अचानक बीच में टांग अड़ाते हुए उस सरदार के बच्चे ने....ऊप्स सॉरी ...संत-महात्मा जी ने मुझे रुकने का इशारा किया"...

"फिर?"...

"फिर क्या?...उसके जाते ही स्पीड भी टांय-टांय-फिस्स.....वापिस वही अपने पुराने ढर्रे पे"...

"याने के 25 की स्पीड पे?"...

"जी"..

"ओह!...ये तो बहुत बुरा हुआ"...

"जी"...

"ज़रूर कोई पुण्य आत्मा रही होगी"...

"कोई ज़रूरी नहीं...आम इनसान भी हो सकता है"...

"लेकिन आम इनसान में इतनी ताकत कि वो.....

"यार!...तुम्हारा स्कूटर बिजली से चार्ज होता है ना?"...

"जी!.."...

"और ये भी तुमने सुना होगा कि इनसानों के अन्दर भी बिजली का थोड़ा-बहुत करैंट होता है"...

"जी!...सुना क्या?...मैँने तो खुद महसूस किया है"...

"मेरी अपनी...सगी बीवी खुद करैंट मारती है"...

"कब?"...

"जब मैँ उसकी मर्ज़ी के बिना उसके नज़दीक जाता हूँ"...

"अरे यार!...वैसे तो मेरी बीवी भी करैंट मारती है और सच कहूँ तो उसकी मारक क्षमता इतनी तेज़ है कि मैँ कई-कई हफ्ते उसके धोरे(नज़दीक) नहीं लगता"...

"क्या बात करते हैँ शर्मा जी?"...

"हो ही नहीं सकता"....

"क्या नहीं हो सकता?"...

"मेरा ओपन चैलेंज है आपको कि मेरी बीवी...आपकी बीवी से  ज़्यादा तेज़ और असरदार करैंट मारती है"...

"ना...बिलकुल ना"...

"आपको अगर विश्वास नहीं है तो बेशक कभी भी आज़मा के देख लें"....

"तो फिर सोमवार ठीक रहेगा?"...

"किसलिए?"....

"करैंट चैक करने के लिए"...

"जी बिलकुल!...सोमवार को तो मैँ भी फ्री होता हूँ"...

"पक्का?"...

"बिलकुल पक्का"...

"मुकर तो नहीं जाओगे?"...

"शर्मा जी!...आपसे मैँने पहले भी कहा था और अब भी कह रहा हूँ कि पहले पहल तो मैँ किसी को हाँ नहीं करता और...

"और अगर गलती से हाँ कर दिया तो फिर भूल के भी कभी ना नहीं करता"...

"जी बिलकुल"...

"तो अपनी बात पे डटे रहिएगा"...

"ये भी कोई कहने की बात है?"...

"ओ.के"..

"तो फिर सोमवार को मिलते हैँ"...

"जी ज़रूर"...

"लेकिन वो सरदार जी वाली बात तो बीच में ही रह गई"...

"अरे यार!...सिम्पल सी बात है...सरदार भी करैंट मारता होगा"....

"ओह!...

"उसी की  विद्धुतीय तरंगों की वजह से तुम्हारे स्कूटर की स्पीड बढ गई होगी"...

"हम्म!...यही हुआ होगा"...

"वैसे वो सरदार...तुम्हें मिला कहाँ था?"....

"ब्रिटेनिया के नए वाले पुल के ऊपर"....

"और तुमने उसे छोड़ा कहाँ था?"....

"छोड़ना कहाँ था?...ढलान उतरते ही उसने मुझे कहा कि...बस यही रोक दो"...

"बेवाकूफ!...ये बात पहले नहीं बता सकता था"....

"आप ही ने तो कहा था कि सारी बात सिलसिलेवार ढंग से एक-एक कर के बताऊँ"....

"ओ.के"...

"इसीलिए तो मैँने अपनी बात स्कूटर से शुरू की थी"...

"अच्छा शर्मा जी!...ज़रूरी काम है....मैँ चलता हूँ"...

"कहीं देर ना हो जाए"...

"कहाँ जाना है?"...

"उसी पुल की तरफ...क्या पता फिर मुलाकात हो जाए और पुन: चमत्कार हो जाए"...

"उफ!...तौबा...

"बेवाकूफ के बच्चे!....अभी तक तेरे भेजे में बात नहीं घुसी की कि ऊँचाई से नीचे आते वक्त गाड़ी की स्पीड अपने आप तेज़ हो जाती है"...

"ओह!...लेकिन वो चमत्कार...

"धन्य है तू....और तेरा चमत्कार"...

"ले...देख....तेरे चमत्कार को दण्डवत हो के नमस्कार करता हूँ"....

"अब खुश"....

"जी...बहुत"...

***राजीव तनेजा***

नोट:इस कहानी को लिखने का आईडिया मुझे तब आया जब एक सरदार जी ने मुझसे मेरी 'स्कूटरी'...ऊप्स सॉरी 'स्कूटर' पर लिफ्ट माँगी

Rajiv Taneja

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+919213766753

बरसात पैसों की

***राजीव तनेजा***

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"अरे तनेजा जी!...ये क्या?...मैँने सुना है कि आपकी पत्नि ने आपके ऊपर वित्तीय हिंसा का केस डाल दिया है"....

"हाँ यार!...सही सुना है तुमने"मैँने लम्बी साँस लेते हुए कहा

"आखिर ऐसा हुआ क्या कि नौबत कोर्ट-कचहरी तक की आ गई?"...

"यार!...होना क्या था?..एक दिन बीवी प्यार ही प्यार में मुझसे कहने लगी कि तुम्हें तो ऐसी होनहार....सुन्दर....सुघड़ और घरेलू पत्नि मिली है कि तुम्हें खुश हो कर मुझ पर पैसों की बरसात करनी चाहिए"...

"तो?"...

'"मैँने कहा ठीक है"...

"फिर?"...

"फिर क्या?...एक दिन जैसे ही मैँने देखा कि बीवी नीचे खड़ी सब्ज़ी खरीद रही है...मैँने आव देखा ना ताव और सीधा निशाना साध सिक्कों से भरी पोटली उसके सर पे दे मारी"...

***राजीव तनेजा***

 
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